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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

यह आकाश नहीं कहां। कब वह न घुसता कहां । सर्वत्र रहता जहां तहां । किंतु निर्लिप्त ॥ १९ ॥ वैसा सदैव वह शरीरगत । रहता है आत्मा सर्वत्र सतत । किंतु नहीं होता वह कभी लिप्त । क्षेत्र दोषसे ॥ १२० ॥ लक्षण यह पुनः पुनः । जानना सदा सत्य मान । सर्वगत क्षेत्र-विहीन । क्षेत्रज्ञका तू ॥ २१ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ लोहेको चुंबक हिलात । लोहा चुंबक नहीं होता । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका होता । इस भांतिसे ॥ २२ ॥ दीप-ज्योति निरंतर । चलाती घरका व्यापार । इन दोनोंका है अंतर । अमर्याद ॥ २३ ॥ काठमें रहती है आग । किंतु काठ न होता आग । ऐसे दोनों होते अलग । देह और आत्मा ॥ २४ ॥ आकाश और बादल । सूर्य तथा मृगजल । ऐसा भेद तू निश्चल । यदि देखेगा ॥ २५ ॥ जैसा आकाशमें एक । रहता है वह अर्क । प्रकाशता तीन लोक । नित्य नित्य ॥ २६ ॥ ऐसा क्षेत्रज्ञ है एक । क्षेत्र पूर्ण प्रकाशक । न यह संवेद्य-जनक । न प्रक्षेप्यार्थ भी ॥ २७ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यांति ते परम् ॥ ३४ ॥ जैसे है एक ही सूर्य उजळाता भुवनत्रय । वैसे प्रकाशता क्षेत्र क्षेत्रज्ञ पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञका भेद देखते ज्ञान-दृष्टिसे । पाते वे मोक्षका धाम भूत-प्रकृति लांघके ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२६

आत्मानात्म-व्यवस्थाके राजहंस— शब्द-तत्व सारज्ञ । दीखता है जो प्राज्ञ । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ । इनमें भेद ॥ २८ ॥ इन दोनोंका जो अंतर । देखता है वही चतुर । वे ज्ञानियोंका महा-द्वार । रहते नित्य ॥ २९ ॥ इसीलिये जो सुमति । जोड़ते शांति-संपत्ति । शास्त्रोंकी सदा दुभति । पालते घरमें ॥ ११३० ॥ भोगके आकाश पर । साहस युत संचार । करते जो धनुर्धर । इसी आशासे ॥ ३१ ॥ शरीरादि जो समस्त । मानकर तृणवत । लेते संत-सेवा व्रत । जीव-भावसे ॥ ३२ ॥ करके ऐसे प्रकार । अनेक सायास कर । होते हैं चितमें स्थिर । ज्ञान-भावसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो अंतर । देखते रहते निरंतर । करते हैं हम न्योच्छावर । अपना ज्ञान उनपे ॥ ३४ ॥ तथा महा-भूतादिक । प्रभेद लेके अनेक । फैली है अवास्तविक । प्रकृति है जो ॥ ३५ ॥ वह शुक-नलिका-न्यायसे । न चिपके ही चिपकी वैसे । मानता है जो जैसेको वैसे । यह धनुर्धर ॥ ३६ ॥ जैसे माल ही है माल । देखती आंखें निर्मल । सर्प-भ्रमको चंचल । दूर करके ॥ ३७ ॥ अथवा शुक्तिको शुक्ति । करता है सही प्रतीति । छोडकर रजत-भ्रांति । सहज भावसे ॥ ३८ ॥ आत्म-प्रकृतिकी जो है भिन्नता । उसको हृदयसे जो जानना । उसे मैं पर-ब्रह्म ही कहता । पांडुकुमार ॥ ३९ ॥ ५२७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

आकाशसे भी जो महान । अव्यक्तका पैल-तीर मान । पाके उसे साम्या-साम्य-भान । नहीं रहता ॥ ११४० ॥ आकार वहां मिटता । जीवत्व सभी घुलता । द्वैत-नाम भी खो जाता । वह है अद्वय ॥ ४१ ॥ परम-तत्व वे पार्थ । होते हैं वहां सर्वथा । आत्म-अनात्म-व्यवस्था । उसके वे राजहंस ॥ ४२ ॥ तेरहवे अध्यायका उपसंहार— इस भांति यह संपूर्ण । पांडवको वह श्रीकृष्ण । देता ज्ञान हो स-करुण । जीवनका सब ॥ ४३ ॥ एक कलशमें रहता जो जल । दूसरेमें डालते जैसे सकल । वैसे श्रीकृष्णने दिया सकल । ज्ञान पार्थको ॥ ४४ ॥ तथा किसको देगा कौन । वह है नर-नारायण । फिर अर्जुनको श्रीकृष्ण । कहाता मैं यह ॥ ४५ ॥ रहने दो यह सकल । बिना प्रइनके बोल । अपना सर्वस सकल । दिया श्रीहरिने ॥ ४६ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— किंतु मनमें वह अर्जुन । अब तक तृप्ति नहीं मान । अधिकाधिक इच्छा महान । बढाते रहा ॥ ४७ ॥ स्नेहसे भरी ज्योति । जैसे बढते जाती । ऐसे श्रवण-भक्ति । बढी पार्थकी ॥ ४८ ॥ जहां सु-गृहिणी उदार । रसज्ञ औ' भोजनहार । मिले जब बढता कर । उसी भांति ॥ ४९ ॥ उभर आया श्रीकृष्णका मन । देखकर उल्हसित अर्जुन । उमड अया तब प्रवचन । छलकता हुवा ॥ ११५० ॥ सु-वायुसे मेघ उमड़ता । चंद्रमासे सिंधु उमड़ता । वक्तृतामें रस भर आता । श्रोताके आदरसे ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी · ५२८

आनंदमय अब संपूर्ण । करेगा जगतको श्रीकृष्ण । राजन् ! करें उसको श्रवण । कहता संजय ॥ ५२ ॥ महाभारतमें इस प्रकार । श्रीव्यासने जो प्रतिभा-सागर । शांति-कथा गायी है जो अमर । भीष्म-पर्वमें ॥ ५३ ॥ वह कृष्णार्जुन संवाद । देश-भाषामें मैं विशद । कह दिखलाऊंगा प्रबंध । ओवी छंदमें ॥ ५४ ॥ केवल वह शांति-कथा । चलेगी शब्दका वाक्पथ । पग रख श्रृंगार माथा- । पर अबिरल ॥ ५५ ॥ देशीके बोल सुंदर । सजायेंगे अलंकार । लजायेंगे जो मधुर । अमृतको यहां ॥ ५६ ॥ उन शब्दोंका जो शांति-गुण । दिखाएगा चंद्रमा है उष्ण । करेगा रसना लुबुधन । नादका लोप ॥ ५७ ॥ इससे पिशाचका भी मन । बनेगा सात्विकताकी खान । श्रवण-मात्रसे है सुमन । पायेगा समाधि ॥ ५८ ॥ वाग्विलास बिस्तार कर । गीतार्थसे विश्वको भर । बांधेंगे विशाल मंदिर । इस जगतका ॥ ५९ ॥ मिटेगी न्यूनता विवेककी । सार्थकता हो कान-मनकी । खुलेगी खान ब्रह्म-विद्याकी । चाहे जिसको ॥ ११६० ॥ पर-तत्त्व देखें नयन । पाये सुख-वसंतोद्यान । आकंठ ब्रह्म रस पान । करे विश्व ॥ ६१ ॥ होगा सब यह साकार । ऐसा बोलूंगा मैं सुंदर । कृपासे किया है स्वीकार । मेरा श्रीगुरुने ॥ ६२ ॥ स्पष्ट शब्दार्थसे तब ऐसे । उपमादिके अधिकतासे । समझाऊं प्रति -पदमैसे । भावार्थ-सार ॥ ६३ ॥ मेरे गुरुवर श्रीमंत । पूर्ण-बोधसे विद्यावंत । किया मुझे हो कृपायुत । श्रीगुरुने ॥ ६४ ॥ ५२९ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग (67)

अबतक उस कृपासे । निकला जो मेरे मुखसे । मान्य हुवा आप सबसे । यहां गीतार्थ ॥ ६५ ॥ फिर आप संत चरण । देते हैं मुझको शरण । न रही है इसी कारण । कोई न्यूनता ॥ ६६ ॥ कभी क्या सरस्वर्तिका मूक । सहज भी होता है बालक । तथा न्यूनता क्या सामुद्रिक । महा-लक्ष्मीको ॥ ६७ ॥ ऐसे आप संतोंके पास । अज्ञानका कैसे वास । तभी मैं अब नव-रस । वर्षा करूंगा ॥ ६८ ॥ क्या कहूं अब गुरुवर । मुझे दे इक अवसर । ज्ञानदेव कहे सुंदर । कहूंगा गीतार्थ ॥ ६९ ॥ गीता श्लोक ३४ ज्ञानेश्वरी ओवी ११६९.

१४ गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग आचार्य वंदना— जय जय आचार्य । समस्त गुरुवर्य । प्रज्ञा-प्रभात सूर्य । सुखोदय ॥ १ ॥ जय जय सर्व-विश्राम-स्थान । सोऽहं-भाव बोध-दाता महान । अनेक लोक-तरंग निदान । महा-समुद्र तू ॥ २ ॥ सुनिये आर्त-बंधू । सदा कारुण्य-सिंधू । विशद-विद्या- वधू । वल्लभाजी ॥ ३ ॥ जिनसे तू अदृश्य होता । उनको तू विश्व दिखाता । जिनसे तू प्रकट होता । तू ही सर्वस्व ॥ ४ ॥ कोई अन्योंकी दृष्टि चुराता । किंतु अपनेको है दीखता । तेरे लाघवकी कौतुकता । आपही अदृश्य ॥ ५ ॥ विश्वका सर्वस्व तू महान । किसे ज्ञान औ' किसे अज्ञान । ऐसा सहज लाघव-स्थान । नमन तुझको ॥ ६ ॥ विश्वमें जो सलिल द्रवित । तेरे द्रवसे है प्रवाहित । तुझसे ही सहन समर्थ । हुई पृथ्वी ॥ ७ ॥ रवि-चंद्रादि सिकता-कण । विश्वको दे प्रकाश-दान । तेरी ही दीप्तिके कारण । तेजका तेज तू ॥ ८ ॥ अनिलकी जो दृढ चल । उसकी नींव तेरा बल । गगनका जो चला खेल । तुझमें ही देव ॥ ९ ॥

अथवा जो अन्यथा ज्ञान । उसकी ज्योति आप जान । करना आपका वर्णन । श्रुतिको भी असाध्य ॥ १० ॥ जब तक न होता तेरा दर्शन । तब तक ही है वेदका वर्णन । दर्शन होने पर होते हैं मौन । हम और वेद ॥ ११ ॥ अजी ! एकार्णव-सिंधू । न जानता एक बिंदु । तभी नदी जाने गंध- । उसका कैसे ॥ १२ ॥ या उदय होते ही भास्वत । बन जाता है चंद्र खद्योत । वैसे ही हम श्रुति-सहित । बनते हैं मौन ॥ १४ ॥ अथवा मिट जाता जहां द्वैत । होता है परा पश्यंतिका अंत । तब होगा किस भांति वर्णित । किस भाषासे ॥ १४ ॥ इसीलिए छोड स्तवन । नम्रतासे होकर मौन । चरणमें करें नमन । यही भला है ॥ १५ ॥ जैसे हैं वैसे श्री गुरुवर । चरणमें करूं नमस्कार । सफल होनेमें वे आधार । ग्रंथ निरूपणमें ॥ १६ ॥ खोलकर अब कृपा-भांडार । मेरी बुध्दिकी झोली भरकर । मुझको काव्य-ज्ञान भी देकर । करें कृतार्थ ॥ १७ ॥ तब मैं विवेक-कर्ण-भूषण । चढाऊंगा संतोंको सुलक्षण । संभाल कर मैं अपने प्राण । तब प्रसादसे ॥ १८ ॥ गीतार्थका जो विधान । निकालेगा मेरा मन । उसे गुरु-कृपांजन । देना स्वामी ॥ १९ ॥ यह शब्द-सृष्टि सकल । दृष्टि देखेगी एक काल । वैसे उदय हो निर्मल । गुरु-कारुण्य बिंब ॥ २० ॥ मेरी प्रज्ञा-लतामें विशाल । लगे सरस काव्य-सु-फळ । वैसे वसंत बन स्नेहळ- । शिरोमणि देव ॥ २१ ॥ मति-गंगा-प्रवाह गंभीर । लेकर बहे प्रमेय-पूर । ऐसे उदार बरसा कर । मेरे स्वामी ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३२

अजी ! हे विश्वैक धाम । तेरा प्रसाद चंद्रमा । करें मुझको पूर्णिमा । उदय होके ॥ २३ ॥ करेंगे आप यदि अवलोकन । उन्मेष-सागरमें नित-नवीन । आयेगा रस-वृत्तिमें उफान । स्फूर्तिमय जो ॥ २४ ॥ श्री गुरु तब हो मुदित । तूने किया है स्तवनार्थ । विनीत भावसे है द्वैत । बोले ऐसे ॥ २५ ॥ छोड दे यह व्यर्थके बोल । गीतार्थ कह तू अनमोल । श्रोताओंकी इच्छा जो निर्मल । न कर व्यर्थ ॥ २६ ॥ अजी ! हां श्रीगुरुदेव । मेरा भी यही था भाव । श्रीमुखसे कहे देव । कहो ग्रंथ ॥ २७ ॥ दूर्वांकुरकी मूलिका । अमर जो स्वाभाविक । उस पर पीयूषका । आया पूर ॥ २८ ॥ अजी ! श्रीगुरु-प्रसादसे । वर्णूंगा अभी विस्तारसे । मूल शास्त्रको चातुर्यसे । आपके समक्ष ॥ २९ ॥ जिससे जीवके अंतर्गत । नांव जो है संशय-भरित । डूबकर वह सुनिश्चित । बढेगी श्रवणेच्छा ॥ ३० ॥ वाणीमें उतरे माधुर्य । गुरु-गृहका भिक्षा-चर्य । वास्तविक जो है सौंदर्य । गुरु-कृपासे ॥ ३१ ॥ त्रयोदशमें श्रीकृष्ण । बोले हैं यह वचन । सुन तू वह अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ३२ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोगसे । बनता है जगत जैसे । औ' होता है गुण-संगसे । आत्मा संसारी ॥ ३३ ॥ तथा यह प्रकृतिगत । सुखदुःख भोगके हित । अथवा रहा गुणातीत । होकर केवल ॥ ३४ ॥ हुवा है कैसे असंगको संग । कैसे यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-योग । अथवा कैसे सुख-दुख भोग । होता है उसे ॥ ३५ ॥ ५३३ गुण-निस्तारयोग

गुण हैं कितने औ' कैसे । बांधते है उनको कैसे । या वह गुणातीत कैसे । उसके लक्षण क्या ? ॥ ३६ ॥ करने इसका स्पष्टीकरण । इस चतुर्दशका है कथन । कहता है सविस्तर श्रीकृष्ण । अर्जुनसे यहां ॥ ३७ ॥ अब यहां यह ऐसा । प्रस्तुत करेगा कैसा । साभिप्राय जो विश्वेश । बैकुंठका ॥ ३८ ॥ कहता है वह अर्जुन । अवधानकी सर्व सेना । लाकर है अब भिड़ाना । ज्ञानसे यहां ॥ ३९ ॥ कहा तुझे कई प्रकारसे । करके युक्ति-वाद जिससे । किंतु तू उस प्रतीतिसे । भरा नहीं ॥ ४० ॥ भगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वामुनयः सर्वे परां सिद्धिमितोगताः ॥ १ ॥ इस समयमें अर्जुन । तुझसे कहता हूं सुन । कहा है जो महान-ज्ञान । श्रुतिने सर्वत्र ॥ ४१ ॥ ज्ञान मनुष्यके हृदयमें ही होता है— वैसे ज्ञान है रूप अपना । पर उसका है जो फैलना । भव स्वर्गादिक जब जाना । इससे हुवा पराया ॥ ४२ ॥ अजी ! केवल इसी कारण । अन्य ज्ञान सब मानो तृण । शेष है यह अग्नि-समान । कहता हूं मैं ॥ ४३ ॥ भव स्वर्गको जो जानते । यज्ञको ही भला कहते । तथा द्वैतको है मानते । भली भांति ॥ ४४ ॥ श्री भगवानने कहा जो सभी ज्ञानमें श्रेष्ठ ज्ञान मैं कहता तुझे । इसको जानके मोक्ष पाये हैं सब ही मुनि ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३४

इससे वे सभी ज्ञान । किये हैं स्वप्न-समान । वातोर्मियोंको गगन । निगलता जैसे ॥ ४५ ॥ अथवा उदित रश्मि-राज । छिपाता है चंद्रबिका तेज । अथवा नाना प्रलयांबुज । नदी नदादिको ॥ ४५ ॥ वैसे इसके होते ही उदय । अन्य सभी ज्ञान होते हैं लय । इसीलिये कहा है धनंजय । मैंने यह उत्तम ॥ ४७ ॥ अनादिसे जो मुक्त । स्थिति है पांडुसुत । होती है हस्तगत । इसी ज्ञानसे ॥ ४८ ॥ अंतर्मुख दृष्टिसे वह ज्ञान प्राप्त होता है-- जिसको कर प्रतीत । विचार-वीर समस्त । संसारको हैं सतत । दबाते जो ॥ ४९ ॥ मनसे पीछे हटाके मन । लेता है जहां विश्रांति तन । तब अनुभवता तन । तन-भाव ऐसा ॥ ५० ॥ फिर कर वे देह पार । दोनों ही जो एक ही बार । वे तोलमें पांडुकुमार । होते मेरे सम ॥ ५१ ॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥ इस ज्ञानसे मेरे समान होते हैं - जो है मेरी नित्यता । उसीको वह पाता । परि-पूर्ण पूर्णता । मेरी उसको ॥ ५२ ॥ जैसे मैं आनंदानंद । सत्य-सिंधु हूं अगाध । नहीं है हममें भेद । रहा कोई ॥ ५३ ॥ हुए वे मुझ जैसे ही इसी ज्ञान-प्रतीतिसे । आना जाना उन्हे एक वे अभंग सदा सम ॥ २ ॥ ५३५ गुण-निस्तारयोग

क्योंकि मैं हूं जैसा जितना । वह भी है वैसा उतना । घट-संगसे है गगन । होता घटाकाश जैसे ॥ ५४ ॥ नहीं हो तो दीप-मूल है एक । उसमें मिली शाखायें अनेक । किंतु वास्तवमें है वह एक । इसी प्रकार ॥ ५५ ॥ इसी प्रकार हे अर्जुन । द्वैत अनुभवके बिन । नामार्थ रूपमें हो लीन । हुए एक ॥ ५६ ॥ यही है जो एक कारण । होती जब सृष्टि निर्माण । तब भी है जन्म-धारण । नहीं उसको ॥ ५७ ॥ होती है जब सृष्टि निर्माण । तब न जिसे देह-धारण । आया उसको कहां मरण । प्रलय-कालमें ॥ ५८ ॥ इसीलिये जन्म-क्षय । अतीत है वे धनंजय । मद्रूप हुये निश्चय । मेरे ज्ञानसे ॥ ५९ ॥ ऐसा जो महत्व ज्ञानका । प्रिय विषय श्रीकृष्णका । बढाने रस अर्जुनका । बखानता है ॥ ६० ॥ स्वरूप-विस्मरण ही अज्ञान है-- तब मानो वह अर्जुन । बना लेता सर्वांग कान । अथवा होता अवधान- । मूर्ति केवल ॥ ६१ ॥ तब श्रीकृष्णका व्याख्यान । कर सका है आकलन । तथा वह हुवा निरूपण । गगनसे विशाल ॥ ६२ ॥ तब कहता है हे प्रज्ञा-कांत । उजली है आज जो वक्तृता उसके समान ही जो श्रोता । मिला आज ॥ ६४ ॥ अजी ! यदि मैं हूं एक । देह-पाशमें अनेक । पकडा जाता हूं देख । गुणोंसे कैसे ॥ ६४ ॥ कैसा क्षेत्रका संग करता । कैसे जगतको मैं प्रसवता । इसीको मैं तुझसे कहता । सुन तू अब ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३६

तभी यह क्षेत्र कहलाता । इसमें मत्संगसे पकता । नाना प्राणि लेके विचित्रता । पांडुकुमार ॥ ६६ ॥ मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥ वैसे है यह महद्ब्रह्म । तभी यह इसका नाम । महदादिका जो विश्राम- । धाम है यह ॥ ६७ ॥ बढाता है यह बहु विचार । इसीलिये है पांडुकुमार । कहते हैं इसे सरासर । महद्ब्रह्म ॥ ६८ ॥ अव्यक्त वादका मत । कहता इसे अव्यक्त । सांख्य करते प्रतीत । प्रकृति है यह ॥ ६९ ॥ वेदांति इसको माया । कहते हैं प्रज्ञा-राया । वैसे ही इसे बताया । यह है अज्ञान ॥ ७० ॥ अपनेको है अपना । रहता है विस्मरण । यही रूप है अर्जुन । इस अज्ञानका ॥ ७१ ॥ अज्ञानका रूप विवेचन— इसका होता है एक ऐसा । विचारमें न दीखता जैसा । दीपकके प्रकाशमें जैसा । रहता अंधःकार ॥ ७२ ॥ अथवा हिलता है जब क्षीर । न दीखती मलाई किसी ओर । किंतु जब होता है दूध स्थिर । तब वह दीखती ॥ ७३ ॥ अथवा न जागृति न स्वप्न । नहीं है स्वरूप अवस्थान । अथवा सुषुप्ति है जो घन । वैसी होती ॥ ७४ ॥ जब वायुको न प्रसवता । आकाश बांझ होता है रीता । वैसी होती है वह अवस्था । अज्ञानकी ॥ ७५ ॥ प्रकृति क्षेत्र है मेरा देता हूं बीज मैं उसे । उसमेंसे सभी भूत होते उत्पन्न भारत ॥ ३ ॥ ५३७ · गुण-निस्तारयोग (68)

यह खंभा है या मनुष्य । नहीं होता एक निश्चय । होता एक भास अवश्य । वैसे ही पार्थ ॥ ७६ ॥ ऐसी वस्तु होती है वैसे । वैसी नहीं दीखती जैसे । किंतु विपरीत भी वैसे । नहीं दीखती ॥ ७७ ॥ न होती रात या तेज । वह संधि जैसे सांझ । वैसे विरुद्ध ना निज । है यह अज्ञान-रूप ॥ ७८ ॥ अज्ञानावृत प्रकाश ही क्षेत्रज्ञ है-- ऐसी वस्तु होती है एक दशा । उसको कहते अज्ञान ऐसा । उससे लपेट लिया प्रकाश । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७९ ॥ अज्ञानको महत्व देना । अपनेको ही न जानना । उसी रूपको है जानना । क्षेत्रज्ञका ही ॥ ८० ॥ यह है दोनोंका संयोग । जान तू इसको चांग । यह है सत्ता निसर्ग- । स्वभाव जान ॥ ८१ ॥ आप ही अज्ञानत्वसे । वस्तु दीखती है वैसे । किंतु अनेक रूपसे । जानते नहीं ॥ ८२ ॥ जैसा कोई भ्रमता एक । हुवा अब मैं राजा देख । या कहे पाया-स्वर्ग-लोक । कोई भ्रमिष्ठ ॥ ८३ ॥ जब दृष्टि है दृढ जाती । तब जो जो कुछ देखती । तभी हुई है कहलाती । सृष्टि-प्रसूती मुझसे ॥ ८४ ॥ मनुष्य जैसे स्वप्न मोहमें । अपनेको देख नग्न-रूपमें । वैसे आत्म-स्फुरण अभावमें । दीखता सर्व ॥ ८५ ॥ यही मैं दूसरा प्रकार । कहता सुन धनुर्धर । स्वप्न-सा मिथ्या मानकर । दृढ अनुभवसे ॥ ८६ ॥ मेरी यह गृहिणी । अनादि है तरुणी । अनिर्वचन गुणी । है अविद्या ॥ ८७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३८

न होना इसका रूप । व्याप्ति है इसकी अमाप । निद्रस्तके यह समीप । जगते ही दूर ॥ ८८॥ मैं सोता तब यह जगती । ब्रह्मांड उदरमें रखती । सत्ता-संभोगसे है बनती । गर्भवती यह ॥ ८९॥ प्रकृतिके आठ विकारोंकी सहायतासे अनेक ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं— इसी महद्ब्रह्मका उदर । प्रकृतिके आठ ही विकार । गर्भ अभिवृद्धि धनुर्धर । करता जगद्रूप ॥ ९० ॥ उभय संगसे प्रथम । बुद्धि तत्वका हुवा जन्म । रजस वह भरा सम । बनता मन ॥ ९१ ॥ ममता तरुणी तब भनकी । रचना करती अहंकारकी । उसने की पंच-महाभूतोंकी । अभिव्यक्ति ॥ ९२ ॥ विषयेंद्रिय जो स्वभावता । रहती भूतोंके अंतर्गत । जिससे वे भी भूतोंके साथ । लेते आकार ॥ ९३ ॥ बने हुए विचार-क्षोभसे । पीछे त्रिगुण खडे होनेसे । तब जीव वासना गर्भसे । जाता स्थान स्थानपे ॥ ९४ ॥ जैसे बीजका एक कण । पानीसे कर संघटण । वृक्षका रूप सुलक्षण । लेता अपनेमें ॥ ९५ ॥ वैसे मेरे ही संग । अविद्या नाना जग । नित ले आता डग । अंकुर रूप ॥ ९६ ॥ अजी ! फिर वह गर्भ-गोल । जैसे रूप ले आता सकल । वह तू सुन अब निर्मल । चित्त देकर ॥ ९७ ॥ मणिज स्वेदज । उद्बिज जारज । उगते सहज । अवयव ॥ ९८ ॥ व्योम वायु-वश । बढा गर्भ-रस । मणिज ले खास । अवयव ॥ ९९ ॥ ५३९ गुण-निस्तारयोग

पेटमें सोते तम-रज । उसमें आया आप-तेज उससे सहज स्वेदज । उत्पन्न होते ॥ १०० ॥ आप पृथ्वी उत्कट । तम-मात्र निकृष्ट । स्थिर होता प्रकट । उद्बीज रूप ॥ १ ॥ पांच ही जब एकत्र होते । मन-बुद्धि साथ पाते । जारजका हेतु बनते । तब ये पार्थ ॥ २ ॥ ब्रह्मांडका पूर्ण रूप— ऐसे ये चार सरल । कर चरण तल । महा-प्रकृति मूल । बनता शिर ॥ ३ ॥ प्रवृत्ति उसका पेट । निवृत्ति सरल पीट । सुर-योनि अंग आठ । उर्ध्व भागके ॥ ४ ॥ कंठ उल्हसित स्वर्ग । मृत्यु-लोक मध्य-अंग । पाताल है अधो-भाग । त्रिलोकका ॥ ५ ॥ ऐसा बालक एक । जन्म दिया है देख । जिसके तीनों लोक । है विकास ॥ ६ ॥ चौरासी लक्ष जो योनी । इसके जोडोंके मणी । बढता है क्षण-क्षण । यह बालक ॥ ७ ॥ शरीरके सभी अंग पर । डालती नामके अलंकार । बढाती मोह-स्तन्य देकर । नित्य-नवीन ॥ ८ ॥ नाना सृष्टि इस बालककी । उंगलियां कर-चरणकी । भिन्नाभिमान उंगुलियोंकी । मुंदरियां अनेक ॥ ९ ॥ इकलौता यह चराचर । अविचारित अति सुंदर । बालकको जो जन्म-देकर । बनी महान ॥ ११० ॥ ब्रह्मा इसका प्रातःकाल । विष्णु रहा मध्यान्ह काल । सदाशिव है सायंकाल । इस बालकका ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४०

महा-प्रलय शैय्यापर सोता । जब यह खेल करके आता । कल्पोदयमें यह है उठता । विषम-ज्ञानसे ॥ १२ ॥ इस प्रकार अर्जुन । मिथ्या दृष्टिका सदन । युगानुवृत्ति चरण । रखता स-कौतुक ॥ १३ ॥ संकल्प है इसका इष्ट । अहंकार साथी विनट । इसका अंत है निकट । आता ज्ञानसे ॥ १४ ॥ रहने दो बखान बहुत । यह विश्व है मायासे जात । मेरी सत्ता है आधारभूत । इस कार्यमें ॥ १५ ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥ इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ओतप्रोत भरा हूं— इसीलिये मैं पिता । महद्ब्रह्म है माता । आपत्य पांडुसुता । जगडंबर ॥ १६ ॥ शरीर है सो अब बहुत । देखके चित्तमें न हो द्वैत । मन बुद्धि आदि जो हैं भूत । एक ही यहां ॥ १७ ॥ जैसे शरीरमें एक । अवयव होते अनेक । कैसे विचित्र विश्व देख । एक ही यहां ॥ १८ ॥ ऊंची नीची विविध प्रकार । होती डालियां विविध आकार । होता है उसका जो आधार । बीज एक ॥ १९ ॥ संबंध है वह भी कैसा । घट माटीका पुत्र जैसा । या कपासका पुत्र जैसा । वस्त्रत्व होता है ॥ १२० ॥ अनेक लहरोंकी परंपरा । सिंधु-संतति जिस प्रकार । सब चराचरका औ' हमारा । संबंध भी ऐसा ॥ २१ ॥ किसी भी योनिमें मूर्ति जन्मती है कहीं कभी । उन्हें प्रकृति है माता पिता मैं बीज रोपता ॥ ४ ॥ ५४१ गुण-निस्तारयोग

तभी है अग्नि और ज्वाल । दोनों ही हैं अग्नि केवल । उसी भांति मेरा है सकल । संबंध वैसा ॥ २२ ॥ निर्मित जगसे यदि मैं छिपता । तब जगत्वसे है कौन दीखता । मानव-तेजसे क्या छिपता । कभी माणिक्य ॥ २३ ॥ जब अलंकारका रूप लिया । तब क्या उसका स्वर्णत्व गया । या मानो कमल खिल गया । मिटा क्या कमलत्व ॥ २४ ॥ अभी कह यह तू पार्थ । अवयवसे आच्छादित । या उसीसे है प्रकटित । अवयवी यहां ॥ २५ ॥ अविमें बोया गया एक दाना । बढ़कर होता है बहुगुना । या व्यर्थ गया है वह अर्जुन । उसी प्रकार ॥ २६ ॥ तभी विश्वके उस पार । देखना पट कर दूर । तब सर्वत्र धनुर्धर । केवल मैं हूं ॥ २७ ॥ तू यह साक्षात्कार । सदा हृदयमें भर । दृढ़तासे तू आदर । जीवनमें इसे ॥ २८ ॥ जब मैं मुझमें प्रकाशता । देहमें भिन्न दीखता । तब मैं गुणोंसे बंधा जाता । दीखता ऐसे ॥ २९ ॥ स्वप्नमें आप ही कल्पनासे । आत्म-मरण जगाते जैसे । तथा आप ही भोगते जैसे । पांडुकुमार ॥ १३० ॥ कामलमें जैसे नयन । करके पीला प्रकाशन । देते हैं कामलका ज्ञान । उनको ही ॥ ३१ ॥ अथवा सूर्यका प्रकाश । कराता बादलका भास । लोपसे देता है प्रकाश । सूर्य ही तब ॥ ३२ ॥ आनेसे ही जन्म जिसका । छाया होती कारण भयका । किंतु अपनेसे है छायाका । सदा अभिन्नत्व ॥ ३३ ॥ वैसे करके प्रकाशन । अनेक देहमें समान । दिखाता गुणका बंधन । वह मैं ही ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४२

बंध क्यों नहीं बांधता । मुझे मैं सही जानता । अज्ञान कारण होता । बंधका वहां ॥ ३५ ॥ मुझको ये बंधन ऐसे । किन गुणसे दीखे वैसे । कहता हूं शांत चित्तसे । सुन तू इसको ॥ ३६ ॥ सत्व रज तम इन तीन गुणोंके कारण पुनर्जन्म होता है— कितने गुण है या धर्म । उसका क्या रूप औ' नाम । कहां हुए इसका मर्म । कहता हूं सुन ॥ ३७ ॥ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥ सुन सत्व रज तम । यहां तीनोंके ये नाम । तथा प्रकृतिसे जन्म । पाते हैं ये ॥ ३८ ॥ यहां है सत्व उत्तम । तथा रज है मध्यम । तीनोंमें है यह तम । कनिष्ट सहज ॥ ३९ ॥ जैसे एक ही शरीरमें तीन । अवस्थायें होती हैं भासमान । एक अंतःकरणमें त्रिगुण । होते हैं भास ॥ १४० ॥ जैसे जैसे कस-हीन । होता सोनेमें मिलन । बढ़ स्वर्णका वजन । होता अवमूल्य ॥ ४१ ॥ सावधानता जैसे जैसे । दूर होती है आलससे । जकड़ती है निद्रा वैसे । दृढ मूल हो ॥ ४२ ॥ अज्ञान अंगीकार कर । उठती है वृत्ति ऊपर । वह है सत्व रज द्वारा । तममें भी जाती ॥ ४३ ॥ यह तू जान अर्जुन । इनका नाम है गुण । अब करना दर्शन । बद्धताका ॥ ४४ ॥ प्रकृतिसे बने हैं ये गुण सत्व रजस्तम । वे निर्विकार आत्माको जोतते मान देहमें ॥ ५ ॥ ५४३    गुण-निस्तारयोग

जब क्षेत्रज्ञ-दशा । आत्मा छू लेता जैसा । यह देह मैं ऐसा । कहने लगता ॥ ४५ ॥ जन्मसे मरण पर्यंत । देहके धर्ममें समस्त । यह जो ममत्वका है सूत । पिरोता है ॥ ४६ ॥ मीनके मुखमें जैसे । अमिष पहुंचनेसे । झटका देता कांटेसे । जल पारधी ॥ ४७ ॥ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥ गुणोंके लक्षण, सत्व गुण— तभी है जो लुब्धक । सुख-ज्ञानका पाश फेंक । खींचता है मृग-शावक । सुख-ज्ञानमें ॥ ४८ ॥ ज्ञानसे फिर तडपता । विद्वताके पैर झाडता । आत्म-सुखको है गंवाता । अपने ही हाथसे ॥ ४९ ॥ विद्या-मानसे तब तोषता । किसी लाभ-मात्रसे हर्षाता । स्व-संतोषमें धन्य मानता । अपने आप ॥ १५० ॥ कहता भाग्य है मेरा । नहीं है ऐसा दूसरा । विकाराष्टकसे भरा । फूलता वह ॥ ५१ ॥ मानो इतना नहीं पूरा । बंधन लगे दूसरा । विद्वत्ताका भूत संवार । चढता सिरपे ॥ ५२ ॥ मैं हूं स्वयं ज्ञान-स्वरूप । खोनेका दुःख ना अमाप । विषय-ज्ञान-लीन आप । चढा गगन ॥ ५३ ॥ जैसे राजा स्वप्नमें । रंक बन भिक्षामें । दाना पाके सुखमें । मानता इंद्र ॥ ५४ ॥ इनमें शुचि जो सत्व ज्ञान आरोग्य दायक । सुखी मैं और मैं ज्ञानी इससे बांधता नित ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४४

वैसे वह देहातीत । बनकर देहवंत । बहलता पांडुसुत । बाह्य-ज्ञानसे ॥ ५५ ॥ प्रवृत्ति-शास्त्र सूझता । यज्ञ-ज्ञान जूझता । स्वर्ग भी है दीखता । और क्या रहा ॥ ५६ ॥ मैं हूं महा-ज्ञानवान । मुझसे नहीं विद्वान । मेरा चित्त है गगन । या सूर्य-चंद्रका ॥ ५७ ॥ ऐसे ही सत्व-सुख-ज्ञानका । जीवमें लगे बागडोरका । बलसे देता जाता झटका । जुते हुये बैलकासा ॥ ५८ ॥ ऐसे ही यह रजो गुणसे । शरीरमें बंधा जाता कैसे । कहता हूं मैं तू सुन इसे । पांडुकुमार ॥ ५९ ॥ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥ रजोगुणके लक्षण— तभी यह रज कहलाता । जीवनका रंजन जानता । यौवन नित बना रहता । अभिलाषाका ॥ १६० ॥ रजका जब स्पर्श होता । जीव काम-मदमें आता । हवा पर सवार होता । चिंतनके यह ॥ ६१ ॥ अग्नि-कुंडमें घृत सिंचन किया । विद्युताग्निने उसका साथ दिया कहो अधिक कम क्या रह गया । कहेंगे तब ॥ ६२ ॥ इच्छा दाह तब भडकता । क्लेश-सह मधुर लगता । इंद्रैश्वर्य भी ओछा लगता । ऐसे समय ॥ ६३ ॥ इच्छा दाह अब बढता । मेरु भी हाथमें लगता । फिर भी वह है चाहता । और भी बडा ॥ ६४ ॥ रज है वासना-रूप तृष्णा आसक्ति-वर्धक । आत्माको कर्मके साथ बांधता बल-पूर्वक ॥ ७ ॥ ५४५ गुण-निस्तारयोग (69)