ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 608, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्योंकि मैं हूं जैसा जितना । वह भी है वैसा उतना । घट-संगसे है गगन । होता घटाकाश जैसे ॥ ५४ ॥ नहीं हो तो दीप-मूल है एक । उसमें मिली शाखायें अनेक । किंतु वास्तवमें है वह एक । इसी प्रकार ॥ ५५ ॥ इसी प्रकार हे अर्जुन । द्वैत अनुभवके बिन । नामार्थ रूपमें हो लीन । हुए एक ॥ ५६ ॥ यही है जो एक कारण । होती जब सृष्टि निर्माण । तब भी है जन्म-धारण । नहीं उसको ॥ ५७ ॥ होती है जब सृष्टि निर्माण । तब न जिसे देह-धारण । आया उसको कहां मरण । प्रलय-कालमें ॥ ५८ ॥ इसीलिये जन्म-क्षय । अतीत है वे धनंजय । मद्रूप हुये निश्चय । मेरे ज्ञानसे ॥ ५९ ॥ ऐसा जो महत्व ज्ञानका । प्रिय विषय श्रीकृष्णका । बढाने रस अर्जुनका । बखानता है ॥ ६० ॥ स्वरूप-विस्मरण ही अज्ञान है-- तब मानो वह अर्जुन । बना लेता सर्वांग कान । अथवा होता अवधान- । मूर्ति केवल ॥ ६१ ॥ तब श्रीकृष्णका व्याख्यान । कर सका है आकलन । तथा वह हुवा निरूपण । गगनसे विशाल ॥ ६२ ॥ तब कहता है हे प्रज्ञा-कांत । उजली है आज जो वक्तृता उसके समान ही जो श्रोता । मिला आज ॥ ६४ ॥ अजी ! यदि मैं हूं एक । देह-पाशमें अनेक । पकडा जाता हूं देख । गुणोंसे कैसे ॥ ६४ ॥ कैसा क्षेत्रका संग करता । कैसे जगतको मैं प्रसवता । इसीको मैं तुझसे कहता । सुन तू अब ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३६