भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 609

तभी यह क्षेत्र कहलाता । इसमें मत्संगसे पकता । नाना प्राणि लेके विचित्रता । पांडुकुमार ॥ ६६ ॥ मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥ वैसे है यह महद्ब्रह्म । तभी यह इसका नाम । महदादिका जो विश्राम- । धाम है यह ॥ ६७ ॥ बढाता है यह बहु विचार । इसीलिये है पांडुकुमार । कहते हैं इसे सरासर । महद्ब्रह्म ॥ ६८ ॥ अव्यक्त वादका मत । कहता इसे अव्यक्त । सांख्य करते प्रतीत । प्रकृति है यह ॥ ६९ ॥ वेदांति इसको माया । कहते हैं प्रज्ञा-राया । वैसे ही इसे बताया । यह है अज्ञान ॥ ७० ॥ अपनेको है अपना । रहता है विस्मरण । यही रूप है अर्जुन । इस अज्ञानका ॥ ७१ ॥ अज्ञानका रूप विवेचन— इसका होता है एक ऐसा । विचारमें न दीखता जैसा । दीपकके प्रकाशमें जैसा । रहता अंधःकार ॥ ७२ ॥ अथवा हिलता है जब क्षीर । न दीखती मलाई किसी ओर । किंतु जब होता है दूध स्थिर । तब वह दीखती ॥ ७३ ॥ अथवा न जागृति न स्वप्न । नहीं है स्वरूप अवस्थान । अथवा सुषुप्ति है जो घन । वैसी होती ॥ ७४ ॥ जब वायुको न प्रसवता । आकाश बांझ होता है रीता । वैसी होती है वह अवस्था । अज्ञानकी ॥ ७५ ॥ प्रकृति क्षेत्र है मेरा देता हूं बीज मैं उसे । उसमेंसे सभी भूत होते उत्पन्न भारत ॥ ३ ॥ ५३७ · गुण-निस्तारयोग (68)