ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह खंभा है या मनुष्य । नहीं होता एक निश्चय । होता एक भास अवश्य । वैसे ही पार्थ ॥ ७६ ॥ ऐसी वस्तु होती है वैसे । वैसी नहीं दीखती जैसे । किंतु विपरीत भी वैसे । नहीं दीखती ॥ ७७ ॥ न होती रात या तेज । वह संधि जैसे सांझ । वैसे विरुद्ध ना निज । है यह अज्ञान-रूप ॥ ७८ ॥ अज्ञानावृत प्रकाश ही क्षेत्रज्ञ है-- ऐसी वस्तु होती है एक दशा । उसको कहते अज्ञान ऐसा । उससे लपेट लिया प्रकाश । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७९ ॥ अज्ञानको महत्व देना । अपनेको ही न जानना । उसी रूपको है जानना । क्षेत्रज्ञका ही ॥ ८० ॥ यह है दोनोंका संयोग । जान तू इसको चांग । यह है सत्ता निसर्ग- । स्वभाव जान ॥ ८१ ॥ आप ही अज्ञानत्वसे । वस्तु दीखती है वैसे । किंतु अनेक रूपसे । जानते नहीं ॥ ८२ ॥ जैसा कोई भ्रमता एक । हुवा अब मैं राजा देख । या कहे पाया-स्वर्ग-लोक । कोई भ्रमिष्ठ ॥ ८३ ॥ जब दृष्टि है दृढ जाती । तब जो जो कुछ देखती । तभी हुई है कहलाती । सृष्टि-प्रसूती मुझसे ॥ ८४ ॥ मनुष्य जैसे स्वप्न मोहमें । अपनेको देख नग्न-रूपमें । वैसे आत्म-स्फुरण अभावमें । दीखता सर्व ॥ ८५ ॥ यही मैं दूसरा प्रकार । कहता सुन धनुर्धर । स्वप्न-सा मिथ्या मानकर । दृढ अनुभवसे ॥ ८६ ॥ मेरी यह गृहिणी । अनादि है तरुणी । अनिर्वचन गुणी । है अविद्या ॥ ८७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३८