ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 611, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंन होना इसका रूप । व्याप्ति है इसकी अमाप । निद्रस्तके यह समीप । जगते ही दूर ॥ ८८॥ मैं सोता तब यह जगती । ब्रह्मांड उदरमें रखती । सत्ता-संभोगसे है बनती । गर्भवती यह ॥ ८९॥ प्रकृतिके आठ विकारोंकी सहायतासे अनेक ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं— इसी महद्ब्रह्मका उदर । प्रकृतिके आठ ही विकार । गर्भ अभिवृद्धि धनुर्धर । करता जगद्रूप ॥ ९० ॥ उभय संगसे प्रथम । बुद्धि तत्वका हुवा जन्म । रजस वह भरा सम । बनता मन ॥ ९१ ॥ ममता तरुणी तब भनकी । रचना करती अहंकारकी । उसने की पंच-महाभूतोंकी । अभिव्यक्ति ॥ ९२ ॥ विषयेंद्रिय जो स्वभावता । रहती भूतोंके अंतर्गत । जिससे वे भी भूतोंके साथ । लेते आकार ॥ ९३ ॥ बने हुए विचार-क्षोभसे । पीछे त्रिगुण खडे होनेसे । तब जीव वासना गर्भसे । जाता स्थान स्थानपे ॥ ९४ ॥ जैसे बीजका एक कण । पानीसे कर संघटण । वृक्षका रूप सुलक्षण । लेता अपनेमें ॥ ९५ ॥ वैसे मेरे ही संग । अविद्या नाना जग । नित ले आता डग । अंकुर रूप ॥ ९६ ॥ अजी ! फिर वह गर्भ-गोल । जैसे रूप ले आता सकल । वह तू सुन अब निर्मल । चित्त देकर ॥ ९७ ॥ मणिज स्वेदज । उद्बिज जारज । उगते सहज । अवयव ॥ ९८ ॥ व्योम वायु-वश । बढा गर्भ-रस । मणिज ले खास । अवयव ॥ ९९ ॥ ५३९ गुण-निस्तारयोग