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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अजी ! हे विश्वैक धाम । तेरा प्रसाद चंद्रमा । करें मुझको पूर्णिमा । उदय होके ॥ २३ ॥ करेंगे आप यदि अवलोकन । उन्मेष-सागरमें नित-नवीन । आयेगा रस-वृत्तिमें उफान । स्फूर्तिमय जो ॥ २४ ॥ श्री गुरु तब हो मुदित । तूने किया है स्तवनार्थ । विनीत भावसे है द्वैत । बोले ऐसे ॥ २५ ॥ छोड दे यह व्यर्थके बोल । गीतार्थ कह तू अनमोल । श्रोताओंकी इच्छा जो निर्मल । न कर व्यर्थ ॥ २६ ॥ अजी ! हां श्रीगुरुदेव । मेरा भी यही था भाव । श्रीमुखसे कहे देव । कहो ग्रंथ ॥ २७ ॥ दूर्वांकुरकी मूलिका । अमर जो स्वाभाविक । उस पर पीयूषका । आया पूर ॥ २८ ॥ अजी ! श्रीगुरु-प्रसादसे । वर्णूंगा अभी विस्तारसे । मूल शास्त्रको चातुर्यसे । आपके समक्ष ॥ २९ ॥ जिससे जीवके अंतर्गत । नांव जो है संशय-भरित । डूबकर वह सुनिश्चित । बढेगी श्रवणेच्छा ॥ ३० ॥ वाणीमें उतरे माधुर्य । गुरु-गृहका भिक्षा-चर्य । वास्तविक जो है सौंदर्य । गुरु-कृपासे ॥ ३१ ॥ त्रयोदशमें श्रीकृष्ण । बोले हैं यह वचन । सुन तू वह अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ३२ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोगसे । बनता है जगत जैसे । औ' होता है गुण-संगसे । आत्मा संसारी ॥ ३३ ॥ तथा यह प्रकृतिगत । सुखदुःख भोगके हित । अथवा रहा गुणातीत । होकर केवल ॥ ३४ ॥ हुवा है कैसे असंगको संग । कैसे यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-योग । अथवा कैसे सुख-दुख भोग । होता है उसे ॥ ३५ ॥ ५३३ गुण-निस्तारयोग

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