भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 604

अथवा जो अन्यथा ज्ञान । उसकी ज्योति आप जान । करना आपका वर्णन । श्रुतिको भी असाध्य ॥ १० ॥ जब तक न होता तेरा दर्शन । तब तक ही है वेदका वर्णन । दर्शन होने पर होते हैं मौन । हम और वेद ॥ ११ ॥ अजी ! एकार्णव-सिंधू । न जानता एक बिंदु । तभी नदी जाने गंध- । उसका कैसे ॥ १२ ॥ या उदय होते ही भास्वत । बन जाता है चंद्र खद्योत । वैसे ही हम श्रुति-सहित । बनते हैं मौन ॥ १४ ॥ अथवा मिट जाता जहां द्वैत । होता है परा पश्यंतिका अंत । तब होगा किस भांति वर्णित । किस भाषासे ॥ १४ ॥ इसीलिए छोड स्तवन । नम्रतासे होकर मौन । चरणमें करें नमन । यही भला है ॥ १५ ॥ जैसे हैं वैसे श्री गुरुवर । चरणमें करूं नमस्कार । सफल होनेमें वे आधार । ग्रंथ निरूपणमें ॥ १६ ॥ खोलकर अब कृपा-भांडार । मेरी बुध्दिकी झोली भरकर । मुझको काव्य-ज्ञान भी देकर । करें कृतार्थ ॥ १७ ॥ तब मैं विवेक-कर्ण-भूषण । चढाऊंगा संतोंको सुलक्षण । संभाल कर मैं अपने प्राण । तब प्रसादसे ॥ १८ ॥ गीतार्थका जो विधान । निकालेगा मेरा मन । उसे गुरु-कृपांजन । देना स्वामी ॥ १९ ॥ यह शब्द-सृष्टि सकल । दृष्टि देखेगी एक काल । वैसे उदय हो निर्मल । गुरु-कारुण्य बिंब ॥ २० ॥ मेरी प्रज्ञा-लतामें विशाल । लगे सरस काव्य-सु-फळ । वैसे वसंत बन स्नेहळ- । शिरोमणि देव ॥ २१ ॥ मति-गंगा-प्रवाह गंभीर । लेकर बहे प्रमेय-पूर । ऐसे उदार बरसा कर । मेरे स्वामी ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३२