ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग आचार्य वंदना— जय जय आचार्य । समस्त गुरुवर्य । प्रज्ञा-प्रभात सूर्य । सुखोदय ॥ १ ॥ जय जय सर्व-विश्राम-स्थान । सोऽहं-भाव बोध-दाता महान । अनेक लोक-तरंग निदान । महा-समुद्र तू ॥ २ ॥ सुनिये आर्त-बंधू । सदा कारुण्य-सिंधू । विशद-विद्या- वधू । वल्लभाजी ॥ ३ ॥ जिनसे तू अदृश्य होता । उनको तू विश्व दिखाता । जिनसे तू प्रकट होता । तू ही सर्वस्व ॥ ४ ॥ कोई अन्योंकी दृष्टि चुराता । किंतु अपनेको है दीखता । तेरे लाघवकी कौतुकता । आपही अदृश्य ॥ ५ ॥ विश्वका सर्वस्व तू महान । किसे ज्ञान औ' किसे अज्ञान । ऐसा सहज लाघव-स्थान । नमन तुझको ॥ ६ ॥ विश्वमें जो सलिल द्रवित । तेरे द्रवसे है प्रवाहित । तुझसे ही सहन समर्थ । हुई पृथ्वी ॥ ७ ॥ रवि-चंद्रादि सिकता-कण । विश्वको दे प्रकाश-दान । तेरी ही दीप्तिके कारण । तेजका तेज तू ॥ ८ ॥ अनिलकी जो दृढ चल । उसकी नींव तेरा बल । गगनका जो चला खेल । तुझमें ही देव ॥ ९ ॥