ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुण हैं कितने औ' कैसे । बांधते है उनको कैसे । या वह गुणातीत कैसे । उसके लक्षण क्या ? ॥ ३६ ॥ करने इसका स्पष्टीकरण । इस चतुर्दशका है कथन । कहता है सविस्तर श्रीकृष्ण । अर्जुनसे यहां ॥ ३७ ॥ अब यहां यह ऐसा । प्रस्तुत करेगा कैसा । साभिप्राय जो विश्वेश । बैकुंठका ॥ ३८ ॥ कहता है वह अर्जुन । अवधानकी सर्व सेना । लाकर है अब भिड़ाना । ज्ञानसे यहां ॥ ३९ ॥ कहा तुझे कई प्रकारसे । करके युक्ति-वाद जिससे । किंतु तू उस प्रतीतिसे । भरा नहीं ॥ ४० ॥ भगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वामुनयः सर्वे परां सिद्धिमितोगताः ॥ १ ॥ इस समयमें अर्जुन । तुझसे कहता हूं सुन । कहा है जो महान-ज्ञान । श्रुतिने सर्वत्र ॥ ४१ ॥ ज्ञान मनुष्यके हृदयमें ही होता है— वैसे ज्ञान है रूप अपना । पर उसका है जो फैलना । भव स्वर्गादिक जब जाना । इससे हुवा पराया ॥ ४२ ॥ अजी ! केवल इसी कारण । अन्य ज्ञान सब मानो तृण । शेष है यह अग्नि-समान । कहता हूं मैं ॥ ४३ ॥ भव स्वर्गको जो जानते । यज्ञको ही भला कहते । तथा द्वैतको है मानते । भली भांति ॥ ४४ ॥ श्री भगवानने कहा जो सभी ज्ञानमें श्रेष्ठ ज्ञान मैं कहता तुझे । इसको जानके मोक्ष पाये हैं सब ही मुनि ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३४