ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
खर्च किया आज ऐसा । कलका चलेगा कैसा । इससे बहु बडा-सा । करेगा उद्यम ॥ ६५ ॥ दमडी पर जीवन । दे करके बलिदान । कमाकर एक तृण । मानता धन्य ॥ ६६ ॥ कहता स्वर्गपे जाना । सोचता कहां क्या खाना । यज्ञानुष्ठान करना । इसीलिये ॥ ६७ ॥ सदा व्रत पर व्रत । करता इष्ट प्राप्त्यर्थ । कभी कामना रहित । न करता कुछ ॥ ६८ ॥ जैसा है ग्रीष्मका पवन । न ही जानता शांति-क्षण । रहता वह निशिदिन । ऊधमग्रस्त ॥ ६९ ॥ होता है चंचल मीन । या कामिनी कटाक्ष समान । या बिजलीकी गति मान । रहता प्रवृत्तिमें ॥ १७० ॥ चाहता इसी वेगसे । संसार स्वर्ग भी वैसे । क्रियाकी आगमें वैसे । घुसता वह ॥ ७१ ॥ देहमें या देहसे भिन्न । तृष्णा श्रृंखलाके बंधन । सदा उपद्रुव्याप विभिन्न । गलेमें व्यापारके ॥ ७२ ॥ रजो गुणका यह दारुण । देहमें देहीके है बंधन । सुन तू अब कथा अर्जुन । तमो गुणकी ॥ ७३ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥ तमोगुणके लक्षण- व्यवहारके जो नयन । बंद होते जिससे जान । मोह-रात्रीके हैं जो घन । काले अतिशय ॥ ७४ ॥ मोहता तम देहीको अज्ञानको बढाकर । निद्रा प्रमाद आलस्य इससे घेर बांधता ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४६
उसकी प्रीति अज्ञानसे । केवल इसी कारणसे । भ्रमग्रस्त होकर जैसे । नाचता जीव ॥ ७५ ॥ अविवेक महा-मंत्र । मूढता मद्य-पात्र । इसका है मोहनास्त्र । जीवोंके लिये ॥ ७६ ॥ अर्जुन यह है तम । इसका है यह मर्म । बांधता देह ही आत्म । इस अज्ञानसे ॥ ७७ ॥ ऐसा ही है सब शरीर । मानता सब चराचर । तम बिन अन्य विचार । नहीं है जान ॥ ७८ ॥ सब इंद्रियोंमें जाड्य । मनमें भरा है मौढ्य । दोनोंमें हुवा है धाढर्य । आलस्यका ॥ ७९ ॥ अंगअंग मोडता रहता । किसी काममें नहीं आता । उबासियां लेता रहता । प्रति क्षण ॥ १८० ॥ खुले रख भी नयन । नहीं देखता अर्जुन । कोई बात भी न सुन । जी ! कह उठता ॥ ८१ ॥ पत्थरसा पडा ही रहता । हिलनेकी बात न करता । सदा कुंडली मार बैठता । उठता नहीं ॥ ८२ ॥ धरणी धंसती है पताल । गगन गिरता धरातल । किंतु उठना भी है केवल । उसको नहीं भाता ॥ ८३ ॥ यह उचित या अनुचित । प्रश्न नहीं करता है चित्त । पडा रहना मात्र सतत । जानती बुद्धि ॥ ८४ ॥ उठाके अपने करतल । उससे पकडकर गाल । घुटनोंमें सिकुड सकल । बैठा रहता ॥ ८५ ॥ सोनेमें करता है मन । नींदको स्वर्ग सुख मान । अन्य सब तुच्छ अर्जुन । कहता आप ॥ ८६ ॥ करके ब्रह्मायु प्राप्त । सोया रहता सतत । दूसरी कुछ भी बात । नहीं मनमें ॥ ८७ ॥ ५४७ गुण-निस्तारयोग
राह चलते भी यदि गिरता । वहींपे खर्राटे भरता । अमृत मिला तो भी नहीं पीता । जब आती नींद ॥ ८८ ॥ वैसे भी कभी क्रोशावेशमें । निकले कभी किसी व्यापारमें । निकलता जैसे अंधा क्रोधमें । उसी भांति ॥ ८९ ॥ कब कैसे बरतना । किससे कैसे बोलना । साध्य असाध्यका ज्ञान । न होता उसे ॥ १९० ॥ संपूर्ण अग्नि-तेज जैसे । पोंछने अपने पंखसे । उड़ता है पतंग वैसे । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥ ऐसे ही काम उसे रुचता । जो न करना वही है भाता । वैसे वह करता रहता । प्रमाद-साहस ॥ ९२ ॥ एवं निद्रा-आलस्य-प्रमाद । तमके रूप हैं त्रिविध । निरुपाधिकके होते बंध । धनंजय ॥ ९३ ॥ आगसे जब घिरता काठ । तब दीखता आगसा काठ । या आकाशको घिरता घट । कहलाता घटाकाश ॥ ९४ ॥ पानीसे जब ताल भरता । चन्द्र-बिंब उसमें भासता । वैसे गुणमें भी भास होता । आत्म-तत्वका ॥ ९५ ॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ सुखमें जोडता सत्त्व कर्ममें जोडता रज । ढकके ज्ञान संपूर्ण भ्रममें डालता तम ॥ ९ ॥ जीतके अन्य दोनोंको तीसरा करता बल । ऐसा कभी बढे सत्त्व कभी रज कभी तम ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ५४८
तीनों गुण समय समय पर बदलते रहते हैं— पीछे कर कफ वात । आगे आता जब पित्त । होता है तब संतप्त । जिस भांति ॥ ९६ ॥ आतप वर्षाको जीतकर । प्रकट होता शीत-लहर । आकाश तब जिस प्रकार । होता है शीत ॥ ९७ ॥ अथवा नाना स्वप्न-जागृति । मिटके आती सुषुप्ति । क्षण भर चित्त-वृत्ति । होती जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे रज-तमको पराजित । करके सत्व होता प्रकाशित । जीव कहता है हो प्रमुदित । सुखी हूं मैं ॥ ९९ ॥ वैसे ही जब सत्व और रज । मिटाकर होता तमका राज । प्रवृत्ति होती है तब सहज । प्रमादकी ॥ २०० ॥ उसी भांति पांडुकुमार । सत्व-तमको हटाकर । उठाता है अपना शिर । रजोगुण ॥ १ ॥ कर्मके बिन अन्य कहीं । सुंदर कुछ भी है नहीं । इस भांति मानता देही । शरीरस्थ ॥ २ ॥ त्रिगुण वृद्धिका निरूपण । किया हैं श्लोकोंमें यहां तीन । सत्वादि गुण-वृद्धि लक्षण । सुनो अब ॥ ३ ॥ सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ प्रज्ञाका इंद्रियों-द्वारा प्रकाश सब ओर जो । देहमें फैलता सारा जानना सत्व है बढ़ा ॥ ११ ॥ प्रवृत्ति लालसा लोभ कर्मारंभ अशांतता । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १२ ॥ ५४९ गुण-निस्तारयोग
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ सत्त्वस्थके स्वभाव-धर्म— रज-तम पर पा विजय । सत्व करता देहपे राज्य । तब जो लक्षण धनंजय । दीखते वह सुन ॥ ४ ॥ प्रतिभा मानो शरीरके अंदर । न समानेसे छलकती बाहर । सुगंध जैसे महकती बाहर । वसंतमें कमलसे ॥ ५ ॥ जैसे सभी इन्द्रियोंके अंगनमें । खडा होता विवेक दास रूपमें । उगती हैं आंखें कर-चरणमें । उसके पार्थ ॥ ६ ॥ राजहंसके सम्मुख । रखनेसे क्षीरोदक । उसकी चोंचकी नोक । करता न्याय ॥ ७ ॥ वैसे दोषादोष विवेक । करती हैं इन्द्रियां देख । बनके रहता सेवक । निग्रह वहां ॥ ८ ॥ सुनते नहीं अश्रव्य कान । न देखते कु-दृश्य नयन । न बोलती अवाच्य वचन । वाणी जैसे ॥ ९ ॥ प्रमाद मोह अंधार आलस्य सब ओरसे । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १३ ॥ तजता देहको देही बढता सत्व है जब । जन्मता शुभ लोगोंमें सज्जनोंके समाजमें ॥ १४ ॥ रजमें लीन होता जो जन्मता कर्म-किसमें । डूबता तममें सारा जन्मता मूढ-योनिमें ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५०
दीपकके सम्मुख अंधार । भागते जाता जैसे सत्वर । नहीं आते निषिद्ध आचार । इन्द्रियोंके सम्मुख ॥ २१० ॥ अजी ! वर्षा-ऋतुमें जैसे । नदियां उमड़ती वैसे । फैल जाती है बुद्धि वैसे । सब शास्त्रोंमें ॥ ११ ॥ जैसे पूर्णमासीका दिवस । चांदनीसे भरता आकाश । शास्त्रमें फैलती तत्सदृश । वृत्ति सदैव ॥ १२ ॥ एकत्र होती वासना । प्रवृत्तिका संयमन । विषयों परसे मन । हठ जाता है ॥ १३ ॥ जब सत्व बढता । यह चिन्ह दीखता । यदि निधन होता । ऐसे समय ॥ १४ ॥ जैसे है घरकी संपत्ति । वैसे औदार्य धैर्य-वृत्ति । तब इह परमें कीर्ति । क्यों न फैलेगी ॥ १५ ॥ अथवा आया है अति सुकाल । चला संतर्पण अति-मंगल । अतिथि आप्त आया उसी पल । कहना क्या तब ॥ १६ ॥ इससे क्या है तब सुंदर । वैसे सत्वमें जाना शरीर । सत्व-स्वभावको छोड और । जायेगा कहां ॥ १७ ॥ सत्व-गुणमें जो उद्भट । तज सत्व-गुण श्रेष्ठ । चलता है छोडके कोपट । भोग-क्षम जो ॥ १८ ॥ अकस्मात जो ऐसा मरता । सत्वका ही नया बनता । या ज्ञानियोंमें जन्म लेता । यह निश्चय ॥ १९ ॥ कह तू यह धनुर्धर । राजा राजत्वमें डोंगर । चढता है तब अधूरा । होता है क्या ॥ २२० ॥ अथवा यहांका जो दिया । पडोसके गांवमें गया । वहां पर क्या धनंजय । न रहता दीप ॥ २१ ॥ वैसी यह सत्व-शुद्धि । होती ज्ञान सह वृद्धि । तैरने लगती बुद्धि । विवेक पर ॥ २२ ॥ ५५१ गुण-निस्तारयोग
महदादिककी परंपरा । विचार कर तदनंतर । विलीन हो जाते स-विचार । उसके उदरमें ॥ २३ ॥ छत्तीसमें सैंतीसवां । चौबीसमें पच्चीसवां । तीनों पर स्वभाव । चौदह जिसका ॥ २४ ॥ ऐसा सर्व जो सर्वोत्तम । होता है जिसको सुगम । ऐसे कुलमें निरुपम । मिलता है देह ॥ २५ ॥ रजोगुणीका स्वभाव-धर्म- इसी भांति हे तू देख । सत्व तम अधोमुख । तथा होता ऊर्ध्व-मुख । जब रजोगुण ॥ २६ ॥ तब वह अपने कार्यका पार्थ । शरीर-ग्राममें है धूम मचाता । देहमें तब लक्षणोंका करता । उदय ऐसा ॥ २७ ॥ अजी ! फैला हुवा बवंडर । करता है वस्तुओंका ढेर । वैसे होता विषयोंका ठौर । वह देह ॥ २८ ॥ प्रसंग जैसे पर-दारादिकका । न सोचता शास्त्र-विरुद्ध होनेका । इंद्रियोंको देता चारा विषयोंका । भेडोंके समान ॥ २९ ॥ यहां तक होता इनका लोभ । स्वैर वृत्तिका रहता सदा रोभ । लूटनेमें अशक्य जो अलाभ । इन लोगोंका ॥ २३० ॥ आता जब उद्यमका प्रसंग । नहीं लेता है कभी पीछे पग । बढाती है प्रवृत्ति पग-पग । अपनी सदैव ॥ ३१ ॥ या खडा करना कोई प्रासाद । या करना है यज्ञ-अश्वमेध । ऐसे होते मनमें बडे छंद । उसके सदैव ॥ ३२ ॥ नगरोंको रचाना । जलाशय बांधना । महावन लगाना । नानाविध ॥ ३३ ॥ ऐसे ऐसे महान कर्म । समारोहोंका उपक्रम । इस परके सभी काम- । भोग करना मेरे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५२
महा-सागर भी खायेगा मात । अग्नि भी होगा पूरा पराजित । बढती है इतनी असीमित । अभिलाषा उसकी ॥ ३५ ॥ आशा जो बढती जाती । मनके आगे दौडती । विश्वको भी जो गिनती । पद्-तलमें ॥ ३६ ॥ बढता है रज जब । दीखते ये चिन्ह सब । शरीर पडता तब । यदि इसका ॥ ३७ ॥ यह सब होते जहां । वह जन्मता है वहां । किंतु होती योनि वहां । मनुष्यकी ही ॥ ३८ ॥ यदि कोई एक भिक्षुक । राज-गृहमें बैठा देख । उससे वह राजा एक । बनेगा क्या ॥ ३९ ॥ बैलको जोतकर गाडीमें । ले गये धनीके बारातमें । इससे चूकेगा क्या गोठेमें । खाना घास ॥ २४० ॥ इसीलिये व्यापारमें दिन रात । जुते रहते जो अविश्रांत । ऐसे कुलमें उसे निश्चित । मिलता जन्म ॥ ४१ ॥ जन्मता है कर्म-जडोंमें । अथवा ऐसे ही देहमें । जहां रजोत्कर्ष-गर्तमें । डूबता वह ॥ ४२ ॥ तमो-गुणीका स्वभाव-धर्म— और अर्जुन उसी भांति । जहां रज-सत्वकी वृत्ति । निगलकर हो उन्नति । तमोगुणकी ॥ ४३ ॥ कहते हम लक्षण । अंतर्बाह्य तन-मन । कहता सुन अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ४४ ॥ उसका होता ऐसा मन । जैसे सूर्य-चन्द्र विहीन । होता है रातका गगन । अमावसका ॥ ४५ ॥ ऐसा उसका अंतःकरण । सदैव स्फूर्ति-हीन विरान । विचारका स्पर्श भी अर्जुन । नहीं होता ॥ ४६ ॥ ५५३ गुण-निस्तारयोग (70)
पत्थरको हराती जड़ता । मृदुता वह नहीं जानता । स्मरण-शक्तिका अता-पता । नहीं होता उसको ॥ ४७ ॥ अविवेक उसका साज । अंतर्बाह्य मौढ्यका बाज । लेन-देन होता सहज । मूर्खताका ॥ ४८ ॥ आचार-हीनता अमंगल । दबोचती उसको प्रबल । मृत्यु-तक उसका चंगुल । कसता जाता ॥ ४९ ॥ कहता हूं और एक लक्षण । दुष्टतामें चित्त विलक्षण । जैसे काली रातमें सुलक्षण । देखता उल्लू ॥ २५० ॥ निषिद्ध-कर्मके नामसे । खिल जाता तन-मनसे । दौड़ती अनिर्बंध जैसे । इंद्रियां सारी ॥ ५१ ॥ बिन मदिराके वह झूमता । बिन सन्निपातके बकता । बिन प्रेमके वह भूलता । पागल जैसे ॥ ५२ ॥ रहता नहीं उसका चित्त । किंतु उन्नति नहीं निश्चित । भ्रम-वश हुवा है उन्मत्त । तमो-गुणी वह ॥ ५३ ॥ या इन गुणोंकी होती । जहां संपूर्ण प्रतीति । जानो तमकी उन्नति । हुई सांग ॥ ५४ ॥ और ऐसे ही प्रसंग । तजता है यदि अंग । लेके यही गुण संग । जन्मता वह ॥ ५५ ॥ राईपन अपने बीजमें । छोड़ जाती है राई अंतमें । अंकुरेगा राईके रूपमें । राईपन जैसे ॥ ५६ ॥ तज कर अग्नि जब दीप । बुझता यदि अपने आप । जैसे जहां लगा वह दीप । आग ही आग ॥ ५७ ॥ ऐसे तमो गुणके साथ । संकल्प बांधकर पार्थ । बुझती है जीवन जोत । जन्मती तम-रूप ॥ ५८ ॥ इससे अधिक क्या कहना । तम-वृद्धिमें देह तजना । पशु-पक्षी कृमि हो जन्मना । या उगना हो पेड ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५४
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥ तीनों गुणोंका परिणाम-- श्रुतिका यह निरूपण । बन जाता है सत्व-गुण । सुकृत-कर्मका कारण । धनुर्धर ॥ २६० ॥ इसीलिये है निर्मल । सुकृतका जो सरल । देता सुख ज्ञान फल । सात्विक ॥ ६१ ॥ फिर है जो रजकी प्रक्रिया । इंद्रवणिका फल पकाया । सुख चितार अंतमें दिया । दुःख अपार ॥ ६२ ॥ अथवा जैसे निंबोणीका फल । बाहर मृदु अंदर गरल । वैसे होते राजस-क्रिया-फल । यहां अर्जुन ॥ ६३ ॥ जैसे है विषका अंकुर । देता विष फल आखर । वैसे है रूप भयंकर । फलता तम ॥ ६४ ॥ सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥ इसीलिये हे अर्जुन । सत्वका हेतु है ज्ञान । जैसे मानो दिनमान । होता सूर्यका ॥ ६५ ॥ तथा वैसे ही यह जान । लोभका है रज कारण । जैसे स्वरूप विस्तारण । जीव-दशाका ॥ ६६ ॥ मोह अज्ञान प्रमाद । यहां है ये दोष-वृन्द । आगे जो बढता प्रबुद्ध । तमका मूल ॥ ६७ ॥ फल सात्विक कर्मोंका पुण्य निर्मल है कहा । रजका फल है दुःख तमका ज्ञान-शून्यता ॥ १६ ॥ सत्वसे फैलता ज्ञान रजसे जान लालसा । प्रमाद मोह अज्ञान होते हैं तमके गुण ॥ १७ ॥ ५५५ गुण-निस्तारयोग
ऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न । दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥ रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण । सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥ इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति । सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ गुण-बद्धोंके स्थान— जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष । तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥ ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते । वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥ सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें । फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥ तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति । पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥ इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित । करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥ वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें । देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥ राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें । जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥ सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस । अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५६
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ये जो गुण-वृत्ति भेद । दृष्टि तज दी तो शुद्ध । वस्तु आप ॥ ७८ ॥ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥ गुण-निस्तारका विवेचन— रहने दे अब यह विषय । कहने दे पीछेका जो विषय । इसे विषयांतर धनंजय । नहीं मान तू ॥ ७९ ॥ मानो यह तीन जो गुण । अपने सामर्थ्यसे जान । होते जैसे देह अर्जुन । गुण ही आप ॥ ८० ॥ जैसे ईंधनका आधार । अग्नि होता है धनुर्धर । या उगता है तरुवर । भूमिका रस ॥ ८१ ॥ या दधि-घृतके रूपमें जैसे । होता है केवल दूध ही वैसे । या लेता है ईखका रस जैसे । गूडका रूप ॥ ८२ ॥ ऐसे हैं ये सांतःकरण । देह बनते तीन गुण । तभी होते बंध-कारण । धनंजय ॥ ८३ ॥ किंतु आश्चर्य धनुर्धर । यह बंधका जो गुब्बार । मुक्त दशामें संसार । कभी नहीं ॥ ८४ ॥ यदि गुण ये अपने धर्मानुसार । होते हैं शरीरके आगे पीछे स्वैर । आत्माके गुणातीतावस्थामें अंतर । नहीं आता ॥ ८५ ॥ ऐसी मुक्ति होती है सहज । तुझको कहता हूं मैं आज । स्वभावसे तू ज्ञान-पुंज । अमर अर्जुन ॥ ८६ ॥ चैतन्य होता है गुणमें । न होता गुणके पाशमें । कहा यह त्रयोदशमें । मैंने तुझको ॥ ८७ ॥ गुणोंको तजके कर्त्ता आत्मा जो उस पार है । देखता जानता ऐसा होता मेरा स्वरूप सो ॥ १९ ॥ ५५७ गुण-निस्तारयोग
जिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें । तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥ या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते । बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥ नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता । वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥ अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश । अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर । होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥ वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता । क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥ तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार । वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥ इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा । वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥ अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना । तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥ यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं । वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥ गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण । गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥ ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय । उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५८
अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ गुण-निस्तारसे मोक्ष प्राप्त होता है— निर्गुण ऐसा और जो पार्थ । रहता है उसको निश्चित । जानता वह उसमें नित । बसता ज्ञान ॥ ३०० ॥ अथवा मानो पांडुसुता । पाता है वह मेरी सत्ता । जिस भांति पाती सरिता । सिंधुत्व जैसे ॥ १ ॥ नळिका परसे उड़कर । बसता है शुक डालपर । वैसे वह मूल अहंकार । ओढता है सो ॥ २ ॥ अज्ञानकी नींद जो सोया था । जोरसे खुर्राटे भरता था । पाकर वह स्वरूपावस्था । उठता अर्जुन ॥ ३ ॥ बुद्धि-भेदका जब दर्पण । हाथसे छूटके गिरा जान । तब स्व-मुखाभास दर्शन । होगा कैसे ॥ ४ ॥ देहाभिमानका पवन जब रुकता । चित्तसिंधु पर तरंग नहीं उठता । तरंग-सिंधुका तब जैसे ऐक्य होता । वैसे जीवेशका ॥ ५ ॥ वर्षातमें गगनमें जैसे । लय होते हैं बादल वैसे । पूर्ण होता वह मद्भावसे । पांडुकुमार ॥ ६ ॥ ऐसे वह मद्रूप कर प्राप्त । शरीरमें रहता है सतत । नहीं होता है त्रिगुणमें लिप्त । देह-संभूत जो ॥ ७ ॥ अजी ! कांचका घर जो होता । प्रकाशको रोक न सकता । या वडवानल न बुझता । सिंधु-जलसे ॥ ८ ॥ वैसे ही आवागमन जो गुणोंका । बोध नहीं मिटा सकता उसका । जैसे चंद्र होता जलमें व्योमका । वैसे देहमें रहता वह ॥ ९ ॥ देह कारण ये तीन गुण जो तरता इन्हे । जन्म-मृत्यु जरा दुःख तरके मोक्ष जीतता ॥ २० ॥ ५५९ गुण-निस्तारयोग
शरीरमें करते हैं तीनों गुण । अपने सामर्थ्यका घोर नर्तन न भेजता वह करने दर्शन । अपनी अहंताको ॥ ३१० ॥ हृदयमें ऐसा वह धनंजय । रहता है करके दृढ निश्चय । शरीरमें करते क्या गुण-त्रय । यह न जानता वह ॥ ११ ॥ तज कर अंगका खोल । सर्प घुस बैठा पाताल । त्वचाका करेगा संभाल । कौन बाहर ॥ १२ ॥ अथवा पक्व सौरभ जैसा । लय होता आकाशमें वैसा । न आता कभी कमल-कोश । लौटकर जो ॥ १३ ॥ हुवा स्व-रूप समरससे । उसकी जीव-दशा भी वैसे । रहा शरीर-धर्म भी कैसे । जानता नहीं ॥ १४ ॥ तभी जन्म जरा मरण । इत्यादि जो छ हैं लक्षण । रहे ये देहके कारण । इसकी वार्ता नहीं ॥ १५ ॥ घट ही जब टूट गया । खपरा भी है फेंका गया । महदाकाशमें हो लिया । घटाकाश ॥ १६ ॥ देहका भाव जब मिटता । निजका ही स्मरण रहता । तब कहो अन्य क्या रहता । उसके बिन ॥ १७ ॥ ऐसा जो श्रेष्ठ बोध-युक्त । देहमें रहता सतत । तभी मैं उसे गुणातीत । कहता अर्जुन ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णके सुन ये बोल । तुष्ट हुवा पार्थ निर्मल । गरजने पर बादल । मोर होता जैसे ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥ अर्जुनने कहा त्रिगुणातीतके देव कह लक्षण तू मुझे । आचार उसके कैसे कैसे निस्तारता गुण ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६०
अर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?-- उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण । जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥ उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण । कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥ अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण । उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥ विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत । यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥ जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत । होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥ कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है -- किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता । अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥ ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन । करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥ भगवान् उवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥ गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है- जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध । प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥ श्री भगवानने कहा प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक । पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥ (71) ५६१ गुण-निस्तारयोग
तब कर्म-जन्य अभिमान । नहीं आता उसमें अर्जुन । या कर्म रह जानेसे मन । खिन्न नहीं होता ॥ २८ ॥ या सत्व होता है जब अधिक । इंद्रियां होती हैं ज्ञान प्रकाशक । तब न होता सु-विधाका तोष । या अविधाका खेद ॥ २९ ॥ अथवा बढ़ता है जब तम । तब न भासता मोह या भ्रम । या नहीं होता अज्ञानका श्रम । या न करे स्वीकार ॥ ३० ॥ आता जब मोहका अवसर । नहीं चाहता ज्ञान धनुर्धर । या ज्ञानसे कर्म-स्वीकार कर । न होता दुःखी ॥ ३१ ॥ प्रातः माध्यान्ह सायंकाल । गणना करके त्रिकाल । न तपता सूर्य निर्मल । वैसे वह रहता ॥ ३२ ॥ उसको भिन्न क्या प्रकाश । ज्ञानसे मिलाता है शेष । नहीं सुखाती अनावर्षा । जैसे सागरको ॥ ३३ ॥ या करनेसे कर्म-प्रवर्तन । नहीं होगा कर्मका अभिमान । कहो कहींसे होगा क्या कंपन । हिमालयको ॥ ३४ ॥ होनेसे मोहका आगमन । भूल जायेगा क्या वह ज्ञान । घामसे जलेगा क्या अर्जुन । प्रलयाग्नि कभी ॥ ३५ ॥ उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥ गुणोंके जालमें निर्लिप्त और निष्कंप रहता है— गुण और गुणका कार्य । आप है पूर्ण धनंजय । तभी है एकेकका कार्य । न डिगाता उसे ॥ ३६ ॥ करके ऐसी प्रतीति । देहमें मैने की वसति । जैसे राहमें कोई पंथी । मान लेके ॥ ३७ ॥ रहे जैसे उदासीन गुणोंसे जो न कांपता । जानके उनका खेल न डिगे लेश-मात्र भी ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६२
न जिताता या न हराता । स्वयं जीतता या हारता । न गुण होता या कराता । जैसा रण-रंग ॥ ३८ ॥ अथवा शरीर-गत प्राण । घरमें आतिथ्यका ब्राह्मण । या चौराहेपे खडा जो स्थाणु । वैसा उदास ॥ ३९ ॥ तथा गुणोंका आवागमन । उसको नहीं कंपाता जान । मृग-जलोर्मियोंसे अर्जुन । नहीं कांपता मेरू ॥ ४० ॥ इससे अधिक क्या बोलना । वायुसे गगनका हिलना । तमका सूर्यको निगलना । इसी भांति ॥ ४१ ॥ स्वप्न जैसा नहीं मोहता । जगता जो उसको पार्थ । वैसे उसे नहीं बांधता । गुणका जाल ॥ ४२ ॥ गुणमें वह नहीं फंसता । दूरसे वह है देखता । गुण-दोषकी नृत्य-कथा । साक्षी जैसा ॥ ४३ ॥ सात्विक करता सत्कर्म । रज करता रजो कर्म । भ्रम-आलस्यादिमें तम । करता कार्य ॥ ४४ ॥ सुन तू उसकी है सत्ता । होती गुण-क्रिया समस्त । जैसे सम्मुख हो सविता । लौकिकका ॥ ४५ ॥ समुद्र जैसे उमड आता । सोमकांत मणि पसीजता । अथवा है कुमुद खिलता । चंद्रिकासे ॥ ४६ ॥ या पवन बहता रुकता । गगन जैसे निश्चल रहता । वैसे गुणोंका हलचल होता । वह होता निश्चल ॥ ४७ ॥ ये हैं उसके लक्षण । गुणातीतके तू जान । कहता हूं आचरण । उसका मैं ॥ ४८ ॥ समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥ शांत जो स्तुति निंदामें धीर जो सुख दुःखमें । प्रियाप्रिय जिसे तुल्य स्वर्ण पाषाण मृत्तिका ॥ २४ ॥ ५६३ गुण-निस्तारयोग
गुणातीतकी सम-वृत्ति- कपडेके अंदर बाहर । होता है तंतू ही धनुर्धर । वैसे देखता है चराचर । विश्वमें मद्रूप ॥ ४९ ॥ रिपु भक्तमें जैसे समान । रहता है परमात्मा जान । वैसे ही सुख दुःख अर्जुन । एकसे उसको ॥ ३५० ॥ वैसे भी स्वाभाविक । भोगना सुख दुःख । देह-रूप उदक । पाता मीन ॥ ५१ ॥ अब उसने वह छोड़ दिया । अपना स्व-स्वरूप जान लिया । जैसे भूसेसे दाना चुन लिया । खेतीहरने ॥ ५२ ॥ अथवा ओघ छोड़कर गांग । बन गया समुद्रका ही अंग । भूलकर अपना लगभग । कलकल ध्वनि ॥ ५३ ॥ हो गयी जब उसकी निश्चित । आत्म-रूपमें वसति सतत । देहमें तब उसको समस्त । एकसे सुख दुःख ॥ ५४ ॥ रात-दिवस समान । मानता स्तंभ अर्जुन । आत्म रत होता तन । द्वंद्व वैसे ॥ ५५ ॥ जैसे नींदमें रत शरीर । अप्सरा अथवा अजगर । एक मानता है धनुर्धर । वैसे देहके द्वंद्व ॥ ५६ ॥ देखता उसका मन । सुवर्ण रत्न पाषाण । सदैव एक समान । बिना भेदके ॥ ५७ ॥ घरमें उतर आता स्वर्ग । अथवा ऊपर आता बाघ । न होता आत्म-बुद्धिका भंग । उसका कभी ॥ ५८ ॥ जैसे मृत न होता जागृत । या भूना बीज न अंकुरित । वैसी होती है बुद्धि आत्मस्थ । सदा अभंग ॥ ५९ ॥ ब्रह्म है तू ऐसा स्तवन । या निंदा करो नीच मान । जलने बुझनेका ज्ञान । नहीं जानती राख ॥ ३६० ॥ ज्ञानेश्वरी ५६४
वैसे निंदा अथवा स्तवन । जानता नहीं वह अर्जुन । तम और प्रकाशका ज्ञान । न होता सूर्यको ॥ ६१ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥ ईश्वर-बुद्धिसे किया पूजन । या चोर मानके किया ताडन । वृष-गजसे किया दलन । या दिया राज ॥ ६२ ॥ जैसे पास आये आप्त-मित्र । या घिर आये शत्रु-सर्वत्र । किंतु न जानता सूर्य रात्र । अथवा दिवस ॥ ६३ ॥ सभी ऋतुमें जैसे गगन । निर्लिप्त रहता है अर्जुन । ऐसा वैषम्य रहित मन । होता उसका ॥ ६४ ॥ वैसे ही उसका एक आचार । कहता हूं तुझे पांडुकुमार । नहीं होता कभी कोई व्यापार । वहां प्रारंभ ॥ ६५ ॥ सर्वारंभ वहां समाप्त । प्रवृत्तिका होता है अस्त । जले हैं कर्म-फल पार्थ । सभी वहां ॥ ६६ ॥ दृष्ट्यादृष्ट्य भोगकी पार्थ । नहीं होती चाह जागृत । प्रारब्धसे होता जो प्राप्त । पाता वह सहज ॥ ६७ ॥ सुख या दुखमें जैसे । पाषाण रहता वैसे । त्याग-स्वीकार मनसे । मिट गया है ॥ ६८ ॥ कितना करना विस्तार । जिसका है ऐसा आचार । उसे मान तू धनुर्धर । गुणातीत ॥ ६९ ॥ गुणोंका अतिक्रमण । करनेका क्या साधन । कहता वह श्रीकृष्ण । सुनिये अब ॥ ३७० ॥ मानापमानमें जैसे समान शत्रु-मित्रमें । गुणातीत वही मान आरंभ जिसने तजा ॥ २५ ॥ ५६५ गुण-निस्तारयोग