भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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महा-सागर भी खायेगा मात । अग्नि भी होगा पूरा पराजित । बढती है इतनी असीमित । अभिलाषा उसकी ॥ ३५ ॥ आशा जो बढती जाती । मनके आगे दौडती । विश्वको भी जो गिनती । पद्-तलमें ॥ ३६ ॥ बढता है रज जब । दीखते ये चिन्ह सब । शरीर पडता तब । यदि इसका ॥ ३७ ॥ यह सब होते जहां । वह जन्मता है वहां । किंतु होती योनि वहां । मनुष्यकी ही ॥ ३८ ॥ यदि कोई एक भिक्षुक । राज-गृहमें बैठा देख । उससे वह राजा एक । बनेगा क्या ॥ ३९ ॥ बैलको जोतकर गाडीमें । ले गये धनीके बारातमें । इससे चूकेगा क्या गोठेमें । खाना घास ॥ २४० ॥ इसीलिये व्यापारमें दिन रात । जुते रहते जो अविश्रांत । ऐसे कुलमें उसे निश्चित । मिलता जन्म ॥ ४१ ॥ जन्मता है कर्म-जडोंमें । अथवा ऐसे ही देहमें । जहां रजोत्कर्ष-गर्तमें । डूबता वह ॥ ४२ ॥ तमो-गुणीका स्वभाव-धर्म— और अर्जुन उसी भांति । जहां रज-सत्वकी वृत्ति । निगलकर हो उन्नति । तमोगुणकी ॥ ४३ ॥ कहते हम लक्षण । अंतर्बाह्य तन-मन । कहता सुन अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ४४ ॥ उसका होता ऐसा मन । जैसे सूर्य-चन्द्र विहीन । होता है रातका गगन । अमावसका ॥ ४५ ॥ ऐसा उसका अंतःकरण । सदैव स्फूर्ति-हीन विरान । विचारका स्पर्श भी अर्जुन । नहीं होता ॥ ४६ ॥ ५५३ गुण-निस्तारयोग (70)