ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहदादिककी परंपरा । विचार कर तदनंतर । विलीन हो जाते स-विचार । उसके उदरमें ॥ २३ ॥ छत्तीसमें सैंतीसवां । चौबीसमें पच्चीसवां । तीनों पर स्वभाव । चौदह जिसका ॥ २४ ॥ ऐसा सर्व जो सर्वोत्तम । होता है जिसको सुगम । ऐसे कुलमें निरुपम । मिलता है देह ॥ २५ ॥ रजोगुणीका स्वभाव-धर्म- इसी भांति हे तू देख । सत्व तम अधोमुख । तथा होता ऊर्ध्व-मुख । जब रजोगुण ॥ २६ ॥ तब वह अपने कार्यका पार्थ । शरीर-ग्राममें है धूम मचाता । देहमें तब लक्षणोंका करता । उदय ऐसा ॥ २७ ॥ अजी ! फैला हुवा बवंडर । करता है वस्तुओंका ढेर । वैसे होता विषयोंका ठौर । वह देह ॥ २८ ॥ प्रसंग जैसे पर-दारादिकका । न सोचता शास्त्र-विरुद्ध होनेका । इंद्रियोंको देता चारा विषयोंका । भेडोंके समान ॥ २९ ॥ यहां तक होता इनका लोभ । स्वैर वृत्तिका रहता सदा रोभ । लूटनेमें अशक्य जो अलाभ । इन लोगोंका ॥ २३० ॥ आता जब उद्यमका प्रसंग । नहीं लेता है कभी पीछे पग । बढाती है प्रवृत्ति पग-पग । अपनी सदैव ॥ ३१ ॥ या खडा करना कोई प्रासाद । या करना है यज्ञ-अश्वमेध । ऐसे होते मनमें बडे छंद । उसके सदैव ॥ ३२ ॥ नगरोंको रचाना । जलाशय बांधना । महावन लगाना । नानाविध ॥ ३३ ॥ ऐसे ऐसे महान कर्म । समारोहोंका उपक्रम । इस परके सभी काम- । भोग करना मेरे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५२