ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपकके सम्मुख अंधार । भागते जाता जैसे सत्वर । नहीं आते निषिद्ध आचार । इन्द्रियोंके सम्मुख ॥ २१० ॥ अजी ! वर्षा-ऋतुमें जैसे । नदियां उमड़ती वैसे । फैल जाती है बुद्धि वैसे । सब शास्त्रोंमें ॥ ११ ॥ जैसे पूर्णमासीका दिवस । चांदनीसे भरता आकाश । शास्त्रमें फैलती तत्सदृश । वृत्ति सदैव ॥ १२ ॥ एकत्र होती वासना । प्रवृत्तिका संयमन । विषयों परसे मन । हठ जाता है ॥ १३ ॥ जब सत्व बढता । यह चिन्ह दीखता । यदि निधन होता । ऐसे समय ॥ १४ ॥ जैसे है घरकी संपत्ति । वैसे औदार्य धैर्य-वृत्ति । तब इह परमें कीर्ति । क्यों न फैलेगी ॥ १५ ॥ अथवा आया है अति सुकाल । चला संतर्पण अति-मंगल । अतिथि आप्त आया उसी पल । कहना क्या तब ॥ १६ ॥ इससे क्या है तब सुंदर । वैसे सत्वमें जाना शरीर । सत्व-स्वभावको छोड और । जायेगा कहां ॥ १७ ॥ सत्व-गुणमें जो उद्भट । तज सत्व-गुण श्रेष्ठ । चलता है छोडके कोपट । भोग-क्षम जो ॥ १८ ॥ अकस्मात जो ऐसा मरता । सत्वका ही नया बनता । या ज्ञानियोंमें जन्म लेता । यह निश्चय ॥ १९ ॥ कह तू यह धनुर्धर । राजा राजत्वमें डोंगर । चढता है तब अधूरा । होता है क्या ॥ २२० ॥ अथवा यहांका जो दिया । पडोसके गांवमें गया । वहां पर क्या धनंजय । न रहता दीप ॥ २१ ॥ वैसी यह सत्व-शुद्धि । होती ज्ञान सह वृद्धि । तैरने लगती बुद्धि । विवेक पर ॥ २२ ॥ ५५१ गुण-निस्तारयोग