भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 622

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ सत्त्वस्थके स्वभाव-धर्म— रज-तम पर पा विजय । सत्व करता देहपे राज्य । तब जो लक्षण धनंजय । दीखते वह सुन ॥ ४ ॥ प्रतिभा मानो शरीरके अंदर । न समानेसे छलकती बाहर । सुगंध जैसे महकती बाहर । वसंतमें कमलसे ॥ ५ ॥ जैसे सभी इन्द्रियोंके अंगनमें । खडा होता विवेक दास रूपमें । उगती हैं आंखें कर-चरणमें । उसके पार्थ ॥ ६ ॥ राजहंसके सम्मुख । रखनेसे क्षीरोदक । उसकी चोंचकी नोक । करता न्याय ॥ ७ ॥ वैसे दोषादोष विवेक । करती हैं इन्द्रियां देख । बनके रहता सेवक । निग्रह वहां ॥ ८ ॥ सुनते नहीं अश्रव्य कान । न देखते कु-दृश्य नयन । न बोलती अवाच्य वचन । वाणी जैसे ॥ ९ ॥ प्रमाद मोह अंधार आलस्य सब ओरसे । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १३ ॥ तजता देहको देही बढता सत्व है जब । जन्मता शुभ लोगोंमें सज्जनोंके समाजमें ॥ १४ ॥ रजमें लीन होता जो जन्मता कर्म-किसमें । डूबता तममें सारा जन्मता मूढ-योनिमें ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५०