भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तीनों गुण समय समय पर बदलते रहते हैं— पीछे कर कफ वात । आगे आता जब पित्त । होता है तब संतप्त । जिस भांति ॥ ९६ ॥ आतप वर्षाको जीतकर । प्रकट होता शीत-लहर । आकाश तब जिस प्रकार । होता है शीत ॥ ९७ ॥ अथवा नाना स्वप्न-जागृति । मिटके आती सुषुप्ति । क्षण भर चित्त-वृत्ति । होती जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे रज-तमको पराजित । करके सत्व होता प्रकाशित । जीव कहता है हो प्रमुदित । सुखी हूं मैं ॥ ९९ ॥ वैसे ही जब सत्व और रज । मिटाकर होता तमका राज । प्रवृत्ति होती है तब सहज । प्रमादकी ॥ २०० ॥ उसी भांति पांडुकुमार । सत्व-तमको हटाकर । उठाता है अपना शिर । रजोगुण ॥ १ ॥ कर्मके बिन अन्य कहीं । सुंदर कुछ भी है नहीं । इस भांति मानता देही । शरीरस्थ ॥ २ ॥ त्रिगुण वृद्धिका निरूपण । किया हैं श्लोकोंमें यहां तीन । सत्वादि गुण-वृद्धि लक्षण । सुनो अब ॥ ३ ॥ सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ प्रज्ञाका इंद्रियों-द्वारा प्रकाश सब ओर जो । देहमें फैलता सारा जानना सत्व है बढ़ा ॥ ११ ॥ प्रवृत्ति लालसा लोभ कर्मारंभ अशांतता । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १२ ॥ ५४९ गुण-निस्तारयोग