भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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राह चलते भी यदि गिरता । वहींपे खर्राटे भरता । अमृत मिला तो भी नहीं पीता । जब आती नींद ॥ ८८ ॥ वैसे भी कभी क्रोशावेशमें । निकले कभी किसी व्यापारमें । निकलता जैसे अंधा क्रोधमें । उसी भांति ॥ ८९ ॥ कब कैसे बरतना । किससे कैसे बोलना । साध्य असाध्यका ज्ञान । न होता उसे ॥ १९० ॥ संपूर्ण अग्नि-तेज जैसे । पोंछने अपने पंखसे । उड़ता है पतंग वैसे । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥ ऐसे ही काम उसे रुचता । जो न करना वही है भाता । वैसे वह करता रहता । प्रमाद-साहस ॥ ९२ ॥ एवं निद्रा-आलस्य-प्रमाद । तमके रूप हैं त्रिविध । निरुपाधिकके होते बंध । धनंजय ॥ ९३ ॥ आगसे जब घिरता काठ । तब दीखता आगसा काठ । या आकाशको घिरता घट । कहलाता घटाकाश ॥ ९४ ॥ पानीसे जब ताल भरता । चन्द्र-बिंब उसमें भासता । वैसे गुणमें भी भास होता । आत्म-तत्वका ॥ ९५ ॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ सुखमें जोडता सत्त्व कर्ममें जोडता रज । ढकके ज्ञान संपूर्ण भ्रममें डालता तम ॥ ९ ॥ जीतके अन्य दोनोंको तीसरा करता बल । ऐसा कभी बढे सत्त्व कभी रज कभी तम ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ५४८