भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पत्थरको हराती जड़ता । मृदुता वह नहीं जानता । स्मरण-शक्तिका अता-पता । नहीं होता उसको ॥ ४७ ॥ अविवेक उसका साज । अंतर्बाह्य मौढ्यका बाज । लेन-देन होता सहज । मूर्खताका ॥ ४८ ॥ आचार-हीनता अमंगल । दबोचती उसको प्रबल । मृत्यु-तक उसका चंगुल । कसता जाता ॥ ४९ ॥ कहता हूं और एक लक्षण । दुष्टतामें चित्त विलक्षण । जैसे काली रातमें सुलक्षण । देखता उल्लू ॥ २५० ॥ निषिद्ध-कर्मके नामसे । खिल जाता तन-मनसे । दौड़ती अनिर्बंध जैसे । इंद्रियां सारी ॥ ५१ ॥ बिन मदिराके वह झूमता । बिन सन्निपातके बकता । बिन प्रेमके वह भूलता । पागल जैसे ॥ ५२ ॥ रहता नहीं उसका चित्त । किंतु उन्नति नहीं निश्चित । भ्रम-वश हुवा है उन्मत्त । तमो-गुणी वह ॥ ५३ ॥ या इन गुणोंकी होती । जहां संपूर्ण प्रतीति । जानो तमकी उन्नति । हुई सांग ॥ ५४ ॥ और ऐसे ही प्रसंग । तजता है यदि अंग । लेके यही गुण संग । जन्मता वह ॥ ५५ ॥ राईपन अपने बीजमें । छोड़ जाती है राई अंतमें । अंकुरेगा राईके रूपमें । राईपन जैसे ॥ ५६ ॥ तज कर अग्नि जब दीप । बुझता यदि अपने आप । जैसे जहां लगा वह दीप । आग ही आग ॥ ५७ ॥ ऐसे तमो गुणके साथ । संकल्प बांधकर पार्थ । बुझती है जीवन जोत । जन्मती तम-रूप ॥ ५८ ॥ इससे अधिक क्या कहना । तम-वृद्धिमें देह तजना । पशु-पक्षी कृमि हो जन्मना । या उगना हो पेड ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५४