ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥ तीनों गुणोंका परिणाम-- श्रुतिका यह निरूपण । बन जाता है सत्व-गुण । सुकृत-कर्मका कारण । धनुर्धर ॥ २६० ॥ इसीलिये है निर्मल । सुकृतका जो सरल । देता सुख ज्ञान फल । सात्विक ॥ ६१ ॥ फिर है जो रजकी प्रक्रिया । इंद्रवणिका फल पकाया । सुख चितार अंतमें दिया । दुःख अपार ॥ ६२ ॥ अथवा जैसे निंबोणीका फल । बाहर मृदु अंदर गरल । वैसे होते राजस-क्रिया-फल । यहां अर्जुन ॥ ६३ ॥ जैसे है विषका अंकुर । देता विष फल आखर । वैसे है रूप भयंकर । फलता तम ॥ ६४ ॥ सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥ इसीलिये हे अर्जुन । सत्वका हेतु है ज्ञान । जैसे मानो दिनमान । होता सूर्यका ॥ ६५ ॥ तथा वैसे ही यह जान । लोभका है रज कारण । जैसे स्वरूप विस्तारण । जीव-दशाका ॥ ६६ ॥ मोह अज्ञान प्रमाद । यहां है ये दोष-वृन्द । आगे जो बढता प्रबुद्ध । तमका मूल ॥ ६७ ॥ फल सात्विक कर्मोंका पुण्य निर्मल है कहा । रजका फल है दुःख तमका ज्ञान-शून्यता ॥ १६ ॥ सत्वसे फैलता ज्ञान रजसे जान लालसा । प्रमाद मोह अज्ञान होते हैं तमके गुण ॥ १७ ॥ ५५५ गुण-निस्तारयोग