भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 628

ऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न । दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥ रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण । सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥ इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति । सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ गुण-बद्धोंके स्थान— जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष । तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥ ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते । वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥ सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें । फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥ तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति । पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥ इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित । करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥ वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें । देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥ राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें । जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥ सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस । अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५६