ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशरीरमें करते हैं तीनों गुण । अपने सामर्थ्यका घोर नर्तन न भेजता वह करने दर्शन । अपनी अहंताको ॥ ३१० ॥ हृदयमें ऐसा वह धनंजय । रहता है करके दृढ निश्चय । शरीरमें करते क्या गुण-त्रय । यह न जानता वह ॥ ११ ॥ तज कर अंगका खोल । सर्प घुस बैठा पाताल । त्वचाका करेगा संभाल । कौन बाहर ॥ १२ ॥ अथवा पक्व सौरभ जैसा । लय होता आकाशमें वैसा । न आता कभी कमल-कोश । लौटकर जो ॥ १३ ॥ हुवा स्व-रूप समरससे । उसकी जीव-दशा भी वैसे । रहा शरीर-धर्म भी कैसे । जानता नहीं ॥ १४ ॥ तभी जन्म जरा मरण । इत्यादि जो छ हैं लक्षण । रहे ये देहके कारण । इसकी वार्ता नहीं ॥ १५ ॥ घट ही जब टूट गया । खपरा भी है फेंका गया । महदाकाशमें हो लिया । घटाकाश ॥ १६ ॥ देहका भाव जब मिटता । निजका ही स्मरण रहता । तब कहो अन्य क्या रहता । उसके बिन ॥ १७ ॥ ऐसा जो श्रेष्ठ बोध-युक्त । देहमें रहता सतत । तभी मैं उसे गुणातीत । कहता अर्जुन ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णके सुन ये बोल । तुष्ट हुवा पार्थ निर्मल । गरजने पर बादल । मोर होता जैसे ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥ अर्जुनने कहा त्रिगुणातीतके देव कह लक्षण तू मुझे । आचार उसके कैसे कैसे निस्तारता गुण ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६०