ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ गुण-निस्तारसे मोक्ष प्राप्त होता है— निर्गुण ऐसा और जो पार्थ । रहता है उसको निश्चित । जानता वह उसमें नित । बसता ज्ञान ॥ ३०० ॥ अथवा मानो पांडुसुता । पाता है वह मेरी सत्ता । जिस भांति पाती सरिता । सिंधुत्व जैसे ॥ १ ॥ नळिका परसे उड़कर । बसता है शुक डालपर । वैसे वह मूल अहंकार । ओढता है सो ॥ २ ॥ अज्ञानकी नींद जो सोया था । जोरसे खुर्राटे भरता था । पाकर वह स्वरूपावस्था । उठता अर्जुन ॥ ३ ॥ बुद्धि-भेदका जब दर्पण । हाथसे छूटके गिरा जान । तब स्व-मुखाभास दर्शन । होगा कैसे ॥ ४ ॥ देहाभिमानका पवन जब रुकता । चित्तसिंधु पर तरंग नहीं उठता । तरंग-सिंधुका तब जैसे ऐक्य होता । वैसे जीवेशका ॥ ५ ॥ वर्षातमें गगनमें जैसे । लय होते हैं बादल वैसे । पूर्ण होता वह मद्भावसे । पांडुकुमार ॥ ६ ॥ ऐसे वह मद्रूप कर प्राप्त । शरीरमें रहता है सतत । नहीं होता है त्रिगुणमें लिप्त । देह-संभूत जो ॥ ७ ॥ अजी ! कांचका घर जो होता । प्रकाशको रोक न सकता । या वडवानल न बुझता । सिंधु-जलसे ॥ ८ ॥ वैसे ही आवागमन जो गुणोंका । बोध नहीं मिटा सकता उसका । जैसे चंद्र होता जलमें व्योमका । वैसे देहमें रहता वह ॥ ९ ॥ देह कारण ये तीन गुण जो तरता इन्हे । जन्म-मृत्यु जरा दुःख तरके मोक्ष जीतता ॥ २० ॥ ५५९ गुण-निस्तारयोग