ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें । तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥ या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते । बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥ नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता । वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥ अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश । अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर । होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥ वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता । क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥ तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार । वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥ इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा । वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥ अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना । तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥ यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं । वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥ गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण । गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥ ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय । उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५८