ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
जिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें । तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥ या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते । बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥ नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता । वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥ अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश । अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर । होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥ वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता । क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥ तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार । वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥ इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा । वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥ अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना । तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥ यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं । वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥ गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण । गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥ ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय । उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५८
अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ गुण-निस्तारसे मोक्ष प्राप्त होता है— निर्गुण ऐसा और जो पार्थ । रहता है उसको निश्चित । जानता वह उसमें नित । बसता ज्ञान ॥ ३०० ॥ अथवा मानो पांडुसुता । पाता है वह मेरी सत्ता । जिस भांति पाती सरिता । सिंधुत्व जैसे ॥ १ ॥ नळिका परसे उड़कर । बसता है शुक डालपर । वैसे वह मूल अहंकार । ओढता है सो ॥ २ ॥ अज्ञानकी नींद जो सोया था । जोरसे खुर्राटे भरता था । पाकर वह स्वरूपावस्था । उठता अर्जुन ॥ ३ ॥ बुद्धि-भेदका जब दर्पण । हाथसे छूटके गिरा जान । तब स्व-मुखाभास दर्शन । होगा कैसे ॥ ४ ॥ देहाभिमानका पवन जब रुकता । चित्तसिंधु पर तरंग नहीं उठता । तरंग-सिंधुका तब जैसे ऐक्य होता । वैसे जीवेशका ॥ ५ ॥ वर्षातमें गगनमें जैसे । लय होते हैं बादल वैसे । पूर्ण होता वह मद्भावसे । पांडुकुमार ॥ ६ ॥ ऐसे वह मद्रूप कर प्राप्त । शरीरमें रहता है सतत । नहीं होता है त्रिगुणमें लिप्त । देह-संभूत जो ॥ ७ ॥ अजी ! कांचका घर जो होता । प्रकाशको रोक न सकता । या वडवानल न बुझता । सिंधु-जलसे ॥ ८ ॥ वैसे ही आवागमन जो गुणोंका । बोध नहीं मिटा सकता उसका । जैसे चंद्र होता जलमें व्योमका । वैसे देहमें रहता वह ॥ ९ ॥ देह कारण ये तीन गुण जो तरता इन्हे । जन्म-मृत्यु जरा दुःख तरके मोक्ष जीतता ॥ २० ॥ ५५९ गुण-निस्तारयोग
शरीरमें करते हैं तीनों गुण । अपने सामर्थ्यका घोर नर्तन न भेजता वह करने दर्शन । अपनी अहंताको ॥ ३१० ॥ हृदयमें ऐसा वह धनंजय । रहता है करके दृढ निश्चय । शरीरमें करते क्या गुण-त्रय । यह न जानता वह ॥ ११ ॥ तज कर अंगका खोल । सर्प घुस बैठा पाताल । त्वचाका करेगा संभाल । कौन बाहर ॥ १२ ॥ अथवा पक्व सौरभ जैसा । लय होता आकाशमें वैसा । न आता कभी कमल-कोश । लौटकर जो ॥ १३ ॥ हुवा स्व-रूप समरससे । उसकी जीव-दशा भी वैसे । रहा शरीर-धर्म भी कैसे । जानता नहीं ॥ १४ ॥ तभी जन्म जरा मरण । इत्यादि जो छ हैं लक्षण । रहे ये देहके कारण । इसकी वार्ता नहीं ॥ १५ ॥ घट ही जब टूट गया । खपरा भी है फेंका गया । महदाकाशमें हो लिया । घटाकाश ॥ १६ ॥ देहका भाव जब मिटता । निजका ही स्मरण रहता । तब कहो अन्य क्या रहता । उसके बिन ॥ १७ ॥ ऐसा जो श्रेष्ठ बोध-युक्त । देहमें रहता सतत । तभी मैं उसे गुणातीत । कहता अर्जुन ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णके सुन ये बोल । तुष्ट हुवा पार्थ निर्मल । गरजने पर बादल । मोर होता जैसे ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥ अर्जुनने कहा त्रिगुणातीतके देव कह लक्षण तू मुझे । आचार उसके कैसे कैसे निस्तारता गुण ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६०
अर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?-- उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण । जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥ उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण । कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥ अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण । उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥ विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत । यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥ जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत । होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥ कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है -- किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता । अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥ ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन । करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥ भगवान् उवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥ गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है- जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध । प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥ श्री भगवानने कहा प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक । पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥ (71) ५६१ गुण-निस्तारयोग
तब कर्म-जन्य अभिमान । नहीं आता उसमें अर्जुन । या कर्म रह जानेसे मन । खिन्न नहीं होता ॥ २८ ॥ या सत्व होता है जब अधिक । इंद्रियां होती हैं ज्ञान प्रकाशक । तब न होता सु-विधाका तोष । या अविधाका खेद ॥ २९ ॥ अथवा बढ़ता है जब तम । तब न भासता मोह या भ्रम । या नहीं होता अज्ञानका श्रम । या न करे स्वीकार ॥ ३० ॥ आता जब मोहका अवसर । नहीं चाहता ज्ञान धनुर्धर । या ज्ञानसे कर्म-स्वीकार कर । न होता दुःखी ॥ ३१ ॥ प्रातः माध्यान्ह सायंकाल । गणना करके त्रिकाल । न तपता सूर्य निर्मल । वैसे वह रहता ॥ ३२ ॥ उसको भिन्न क्या प्रकाश । ज्ञानसे मिलाता है शेष । नहीं सुखाती अनावर्षा । जैसे सागरको ॥ ३३ ॥ या करनेसे कर्म-प्रवर्तन । नहीं होगा कर्मका अभिमान । कहो कहींसे होगा क्या कंपन । हिमालयको ॥ ३४ ॥ होनेसे मोहका आगमन । भूल जायेगा क्या वह ज्ञान । घामसे जलेगा क्या अर्जुन । प्रलयाग्नि कभी ॥ ३५ ॥ उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥ गुणोंके जालमें निर्लिप्त और निष्कंप रहता है— गुण और गुणका कार्य । आप है पूर्ण धनंजय । तभी है एकेकका कार्य । न डिगाता उसे ॥ ३६ ॥ करके ऐसी प्रतीति । देहमें मैने की वसति । जैसे राहमें कोई पंथी । मान लेके ॥ ३७ ॥ रहे जैसे उदासीन गुणोंसे जो न कांपता । जानके उनका खेल न डिगे लेश-मात्र भी ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६२
न जिताता या न हराता । स्वयं जीतता या हारता । न गुण होता या कराता । जैसा रण-रंग ॥ ३८ ॥ अथवा शरीर-गत प्राण । घरमें आतिथ्यका ब्राह्मण । या चौराहेपे खडा जो स्थाणु । वैसा उदास ॥ ३९ ॥ तथा गुणोंका आवागमन । उसको नहीं कंपाता जान । मृग-जलोर्मियोंसे अर्जुन । नहीं कांपता मेरू ॥ ४० ॥ इससे अधिक क्या बोलना । वायुसे गगनका हिलना । तमका सूर्यको निगलना । इसी भांति ॥ ४१ ॥ स्वप्न जैसा नहीं मोहता । जगता जो उसको पार्थ । वैसे उसे नहीं बांधता । गुणका जाल ॥ ४२ ॥ गुणमें वह नहीं फंसता । दूरसे वह है देखता । गुण-दोषकी नृत्य-कथा । साक्षी जैसा ॥ ४३ ॥ सात्विक करता सत्कर्म । रज करता रजो कर्म । भ्रम-आलस्यादिमें तम । करता कार्य ॥ ४४ ॥ सुन तू उसकी है सत्ता । होती गुण-क्रिया समस्त । जैसे सम्मुख हो सविता । लौकिकका ॥ ४५ ॥ समुद्र जैसे उमड आता । सोमकांत मणि पसीजता । अथवा है कुमुद खिलता । चंद्रिकासे ॥ ४६ ॥ या पवन बहता रुकता । गगन जैसे निश्चल रहता । वैसे गुणोंका हलचल होता । वह होता निश्चल ॥ ४७ ॥ ये हैं उसके लक्षण । गुणातीतके तू जान । कहता हूं आचरण । उसका मैं ॥ ४८ ॥ समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥ शांत जो स्तुति निंदामें धीर जो सुख दुःखमें । प्रियाप्रिय जिसे तुल्य स्वर्ण पाषाण मृत्तिका ॥ २४ ॥ ५६३ गुण-निस्तारयोग
गुणातीतकी सम-वृत्ति- कपडेके अंदर बाहर । होता है तंतू ही धनुर्धर । वैसे देखता है चराचर । विश्वमें मद्रूप ॥ ४९ ॥ रिपु भक्तमें जैसे समान । रहता है परमात्मा जान । वैसे ही सुख दुःख अर्जुन । एकसे उसको ॥ ३५० ॥ वैसे भी स्वाभाविक । भोगना सुख दुःख । देह-रूप उदक । पाता मीन ॥ ५१ ॥ अब उसने वह छोड़ दिया । अपना स्व-स्वरूप जान लिया । जैसे भूसेसे दाना चुन लिया । खेतीहरने ॥ ५२ ॥ अथवा ओघ छोड़कर गांग । बन गया समुद्रका ही अंग । भूलकर अपना लगभग । कलकल ध्वनि ॥ ५३ ॥ हो गयी जब उसकी निश्चित । आत्म-रूपमें वसति सतत । देहमें तब उसको समस्त । एकसे सुख दुःख ॥ ५४ ॥ रात-दिवस समान । मानता स्तंभ अर्जुन । आत्म रत होता तन । द्वंद्व वैसे ॥ ५५ ॥ जैसे नींदमें रत शरीर । अप्सरा अथवा अजगर । एक मानता है धनुर्धर । वैसे देहके द्वंद्व ॥ ५६ ॥ देखता उसका मन । सुवर्ण रत्न पाषाण । सदैव एक समान । बिना भेदके ॥ ५७ ॥ घरमें उतर आता स्वर्ग । अथवा ऊपर आता बाघ । न होता आत्म-बुद्धिका भंग । उसका कभी ॥ ५८ ॥ जैसे मृत न होता जागृत । या भूना बीज न अंकुरित । वैसी होती है बुद्धि आत्मस्थ । सदा अभंग ॥ ५९ ॥ ब्रह्म है तू ऐसा स्तवन । या निंदा करो नीच मान । जलने बुझनेका ज्ञान । नहीं जानती राख ॥ ३६० ॥ ज्ञानेश्वरी ५६४
वैसे निंदा अथवा स्तवन । जानता नहीं वह अर्जुन । तम और प्रकाशका ज्ञान । न होता सूर्यको ॥ ६१ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥ ईश्वर-बुद्धिसे किया पूजन । या चोर मानके किया ताडन । वृष-गजसे किया दलन । या दिया राज ॥ ६२ ॥ जैसे पास आये आप्त-मित्र । या घिर आये शत्रु-सर्वत्र । किंतु न जानता सूर्य रात्र । अथवा दिवस ॥ ६३ ॥ सभी ऋतुमें जैसे गगन । निर्लिप्त रहता है अर्जुन । ऐसा वैषम्य रहित मन । होता उसका ॥ ६४ ॥ वैसे ही उसका एक आचार । कहता हूं तुझे पांडुकुमार । नहीं होता कभी कोई व्यापार । वहां प्रारंभ ॥ ६५ ॥ सर्वारंभ वहां समाप्त । प्रवृत्तिका होता है अस्त । जले हैं कर्म-फल पार्थ । सभी वहां ॥ ६६ ॥ दृष्ट्यादृष्ट्य भोगकी पार्थ । नहीं होती चाह जागृत । प्रारब्धसे होता जो प्राप्त । पाता वह सहज ॥ ६७ ॥ सुख या दुखमें जैसे । पाषाण रहता वैसे । त्याग-स्वीकार मनसे । मिट गया है ॥ ६८ ॥ कितना करना विस्तार । जिसका है ऐसा आचार । उसे मान तू धनुर्धर । गुणातीत ॥ ६९ ॥ गुणोंका अतिक्रमण । करनेका क्या साधन । कहता वह श्रीकृष्ण । सुनिये अब ॥ ३७० ॥ मानापमानमें जैसे समान शत्रु-मित्रमें । गुणातीत वही मान आरंभ जिसने तजा ॥ २५ ॥ ५६५ गुण-निस्तारयोग
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ गुण-निस्तारका साधन-- ऐसे जो अव्यभिचार चित्त । भक्ति-योग-रत हो सतत । मेरा सेवन करता पार्थ । लांघता गुण ॥ ७१ ॥ अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन-- तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति । अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति । होना उसकी पूर्ण निश्चिति । अत्यावश्यक ॥ ७२ ॥ तब तू सुन अर्जुन । यहां है मेरा क्या स्थान । रत्नमें तेज जो रत्न । वैसा हूं मैं ॥ ७३ ॥ या द्रवणवत है नीर । या अवकाश है अंबर । या मिठास ही है शक्कर । नहीं भिन्न ॥ ७४ ॥ या अग्नि ही है ज्वाल । दल ही है कमल । वृक्ष जो वही डाल । फलादिक ॥ ७५ ॥ हिम होता जो संघटित । कहलाता वह हिमवंत । या जामन लगा दूध पार्थ । कहलाता दही ॥ ७६ ॥ यहां विश्व है जो अर्जुन । स्वयं मैं हूं वह संपूर्ण । चंद्र-बिंबका तरासना । न होता वैसे ॥ ७७ ॥ अजी ! जमा हुवा घृत । जमकर भी रहता घृत । या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ ७८ ॥ न उघड़ कर भी वस्त्र । स्पष्ट ही रहता सूत्र । जैसे न तोडके भी पात्र । रहती मृत्तिका ॥ ७९ ॥ ———————————————————————— जो एक-निष्ठ भक्तीसे करता मम सेवन । लांघके गुणको सारे पाता ब्रह्मत्व है वह ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६६
इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण । ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व-सह मै हूं ॥ ३८० ॥ इस प्रकार जो मुझको जानना । उसको अव्यभिचारी भक्ति कहना । विश्वमें औ' मुझमें भेद देखना । व्यभिचारी भक्ति ॥ ८१ ॥ इसलिये भेद तज पार्थ । तथा करके अभेद-चित्त । जानना है अपने सहित । मुझको सदैव ॥ ८२ ॥ सोनेपे जैसे सुवर्ण । जडा जाता है अर्जुन । वैसे अपनेसे भिन्न । न मानना मुझे ॥ ८३ ॥ तेजसे जो होता उत्पन्न । तेजोमय होता किरण । तेजसे होता है अभिन्न । ऐसा होना बोध ॥ ८४ ॥ भूतलमें जैसे परमाणु । हिमाचलमें है हिम-कण । वैसे मुझमें कर अर्पण । अपनेको तू ॥ ८५ ॥ तरंग होता छोटा अर्जुन । किंतु न होता सिंधुसे भिन्न । वैसे ईश्वरसे नहीं भिन्न । कुछ भी यहां ॥ ८६ ॥ इसी भांति समरस । दृष्टि रख स-उल्लास । भक्तिका वह निवास । कहते हम ॥ ८७ ॥ ज्ञान और योगका समन्वय, अद्वय-दृष्टि— तथा ज्ञानकी भी अर्जुन । सही दृष्टि यह है जान । तथा योगका है संपूर्ण । सार भी यही ॥ ८८ ॥ सिंधुसे जैसे जल-धर । लेते हैं अखंड जो धार । वैसी वृत्ति पांडुकुमार । बनती तन्मय ॥ ८९ ॥ जैसे कूप मुखका आकाश । सांधा न जाता महाकाश । होता है वैसे परम-रस । ऐक्य-रूप ॥ ३९० ॥ प्रति-बिंब तक बिंबसे । प्रभा-ज्योति होती है जैसे । सोऽहम् वृत्ति होती है वैसे । धनंजय ॥ ९१ ॥ ५६७ : गुण-निस्तारयोग
ऐसे ही फिर परस्पर । सोऽहम् वृत्तिका अवतार । वह भी मिटती फिर । अपने आप ॥ ९२ ॥ जैसे नूनका एक कण । समुद्रमें पिघला जान । गलना भी फिर अर्जुन । भूलता जैसे ॥ ९३ ॥ अथवा जलकर तृण । बुझ जाता है अग्नि-कण । भेद-नाशका वैसे ज्ञान । मिटता आप ॥ ९४ ॥ रहता हूं मैं उस पार । भक्त रहता इस पार । यह दोनों ही मिटकर । रहता अनादि ऐक्य ॥ ९५ ॥ गुणोंको है वह लांघता । यह भी अब न रहता । न रहती एक वाक्यता । एकत्वकी भी ॥ ९६ ॥ इसीको ब्रह्मत्व कहते हैं जो मेरी एक-निष्ठ भक्तिसे मिलता है— यह जो है ऐसी स्थिति । ब्रह्मत्व है कहलाती । मेरी अव्यभिचारी भक्ति । देती है यह ॥ ९७ ॥ तथा ऐसे लक्षण-युक्त । जगतमें मेरा जो भक्त । ब्रह्मत्व उससे संयुक्त । पतिव्रता जैसे ॥ ९८ ॥ पानी जो गंगामें बहता । सिंधुसे निश्चित मिलता । इसमें नहीं है अन्यथा । उसी भांति ॥ ९९ ॥ ज्ञान-दृष्टिसे जो अर्जुन । करता है मेरा सेवन । होता है वह जुडा रत्न । ब्रह्म-पदका ॥ ४०० ॥ ऐसे ब्रह्म-पदका पार्थ । सायुज्य ऐसी व्यवस्था । उसीका नाम है चौथा । पुरुषार्थ जो ॥ १ ॥ किंतु मेरा यह आराधन । होता है ब्रह्मत्वका सोपान । इससे मैं इसका साधन । मानेगा तू ॥ २ ॥ यदि एसा है तेरा मन । करता कल्पना अर्जुन । नहीं है अन्य मेरे बिन । कोई ब्रह्म ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६८
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥ सबका मूल आधार मैं हूं-- ब्रह्म नामका आधार । मैं हूं यहां धनुर्धर । औ' अन्य शब्दका सार । वह भी मैं हूं ॥ ४ ॥ जैसा मंडल औ' चंद्रमा । अभेद होते हैं जान मर्म । वैसे ही मैं और हे ब्रह्म । एक-रूप ॥ ५ ॥ तथा नित्य जो निष्कंप । अनावृत्त धर्मरूप । सुख-रूप जो अमाप । अद्वितीय ॥ ६ ॥ विवेक अपना काम । करके मिलता धाम । निष्कर्षका है निःसीम । वह भी मैं हूं ॥ ७ ॥ विजय गया अब दूर- अजी ! कीजिये यह श्रवण । अनन्य भक्त-प्रिय श्रीकृष्ण । करता है पार्थसे कथन । कहता संजय ॥ ८ ॥ धृतराष्ट्र कहता यह सुन । तुझसे यह पूछता है कौन । बिन पूछे ही व्यर्थका भाषण । करता क्यों तू ? ॥ ९ ॥ विजयकी वार्ता तू कहकर । हमारी व्यग्रता .दूर कर । कहता है "विजय गया दूर" । संजय मनमें ॥ ४१० ॥ संजय है मनमें विस्मित । वैसे ही है अतिशय त्रस्त । किस भांति यह द्वेश-रस । श्रीकृष्णसे है ॥ ११ ॥ फिर भी वह कृपालु हो तुष्ट । इन्हें करें आत्म-विवेक पुष्ट । जिससे हो इनका रोग नष्ट । महा-मोहका ॥ १२ ॥ आधार ब्रह्मका मैं हूं वैसे ही अमृतत्वका । शाश्वत धर्मका भी मैं तथा निस्सीम सुखका ॥ २७ ॥ (72) ५६९ गुण-निस्तारयोग
करता है संजय ऐसा चिंतन । तथा करता संवादका श्रवण । जिससे उमडकर आता मन । हर्षातिरेकसे ॥ १३ ॥ ऐसा हो वह उत्साहित । अब श्रीकृष्णार्जुनकी बात । कहेगा तो देकर चित्त । सुनियेगा ॥ १४ ॥ उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठांव । कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १५ ॥ गीता श्लोक २७ ज्ञानेश्वरी ओवी ४१५.
१५ पुरुषोत्तम-दर्शनयोग श्रीसद्गुरुकी मानस-पूजा— अपना यह अंतःकरण । बना करके श्रीसिंहासन । उस पर रखेंगे चरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥ ऐक्य भावकी अंजली । इंद्रिय-कमल-कली । भरकर पुष्पांजली । देंगे अर्घ्य ॥ २ ॥ अनन्यता-उदक शुद्ध । संस्कार निष्ठाका सु-सिद्ध । लगावें अनामिका गंध । चंदन-तिलक ॥ ३ ॥ स्वर्णिम प्रेमके नूपुर । श्रीचरणमें सुकुमार चढायें समर्पित कर । विशुद्धतासे ॥ ४ ॥ अनन्यतासे जो है दृढ । अव्यभिचारका निचोड़ । बनाके चरणोंके जोड़ । चढ़ायेंगे ॥ ५ ॥ आनंद-मोद बहुल । सात्विकताके मुकुल । खिले हुए अष्ट-दल । चढायें पदपे ॥ ६ ॥ जलायें अहंका धूप । उतारें नाहंका दीप । समरस होके आप । मिले निरंतर ॥ ७ ॥ बनाके मेरे तन औ' प्राण । चढाऊं पादुका श्रीचरण । करूं भोग-मोक्षका निंब-लोण । उन चरणों पर ॥ ८ ॥ इन गुरु-चरणोंकी सेवा । देती सकल पुरुषार्थ मेवा । प्राप्त हो हम वह सुदैव । ऐसा करें हम ॥ ९ ॥
देता अंतिम-विश्रांति-स्थान । वहां तक खिलता जो ज्ञान । बनाता सुधा-सिंधु महान । वाचाका वह ॥ १० ॥ असंख्य पूर्ण-सुधाकर । करें जिसपे न्योच्छावर । होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ ११ ॥ सूर्य उदय जो पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश । करती दीवाली ज्ञान-दशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १२ ॥ जिससे स्फुरता है व्याख्यान । लगता नाद-ब्रह्म भी बौना । मोक्ष-धाम भी है शोभा-हीन । उसके सम्मुख ॥ १३ ॥ मंडपमें श्रवण सुखके । जगतको वसंत ऋतुके । सुख मिले व्याख्यान-वल्लीके । ऐसा बहार आता ॥ १४ ॥ नहीं लगनेसे जिसकी थाह । लौटती है वाचा मनके सह । उसके शब्दमें आता है वह । कितना आश्चर्य ॥ १५ ॥ ज्ञान जिसे नहीं जानता । ध्यानमें भी जो नहीं आता । वह है अगोचर रमता । उसकी गोष्ठियोंमें ॥ १६ ॥ इतना बड़ा जो सौभग । बनता है वाचाका अंग । गुरु-पद-पद्म-पराग । प्राप्त होता ॥ १७ ॥ ऐसा यह भाग्य है नहीं । मेरे बिन अन्यको कहीं । कहता है आपसे यहीं । ज्ञानदेव ॥ १८ ॥ रहा हूं अबोध बालक । श्रीगुरुका इकलौता एक । इसी लिए कृपा स्वाभाविक । मिली मुझको मात्र ॥ १९ ॥ मेघमाला जैसे संपूर्ण । देती है चातकको प्राण । मेरे लिए गुरु-चरण । बने वैसे ॥ २० ॥ तभी मेरा रीता ही मुख । करने लगा बकबक । किंतु निकला स्वाभाविक । गीता तत्व मधुर ॥ २१ ॥ होता है जब दैव अनुकूल । रेती बनते मोति अनमोल । शत्रु भी बन जाते हैं सकल । ऐश्वर्य सह मित्र ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७२
चुल्हेपे चढाये हुए हरल । पक जाते अमृतसे चावल । भूखेका रखना यदि काल । जगन्नाथको ॥ २३ ॥ ऐसे ही जिसे श्रीगुरुवर । करते हैं जब अंगीकार । बन जाता है सारा संसार । मोक्षधाम ॥ २४ ॥ देखो कैसे नारायण । पांडवोंके अवगुण । बना देते हैं पुराण । विश्व-वंद्य ॥ २५ ॥ ऐसे श्री निवृत्तिराज । मुझ अज्ञानिमें आज । लाते हैं ज्ञानका ओज । स्व-कृपासे ॥ २६ ॥ रहने दे यह गुरु-गुण वर्णन । वर्णनसे होती है महिमा मलीन । गुरुवर्णनका मुझमें कहां ज्ञान । इसीलिए ॥ २७ ॥ उनकी कृपासे सदय । कहते गीता साभिप्राय । धोता हूं मैं आपके पूज्य । अब श्री चरण ॥ २८ ॥ करता चौदहका अंत । कह कर यह सिद्धांत । अर्जुनसे श्री भगवंत । कैवल्य पति जो ॥ २९ ॥ ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है— करता जो ज्ञान हस्तगत । मोक्ष पाता है वही समर्थ । होता इंद्रपद हस्तगत । जैसे शत-मखसे ॥ ३० ॥ अथवा लेकर शत जन्म । करता सतत ब्रह्म-कर्म । वही बनता अंतमें ब्रह्म । अन्य नहीं कोई ॥ ३१ ॥ या करता है सूर्य दर्शन । केवल मात्र एक नयन । वैसे केवल ज्ञानसे मान । मोक्ष प्राप्त ॥ ३२ ॥ ऐसे ज्ञान के लिए कौन । होता यहां सामर्थ्यवान । खो जानेसे हुवा दर्शन । अकेलेका ॥ ३३ ॥ पातालमें भी जो है निधान । दिखाएगा लगाके अंजन । इसके लिए होना लोचन । पाव्जके ही ॥ ३४ ॥ वैसे ही मोक्ष देगा ज्ञान । यहां बात नहीं भिन्न । इसके लिए होना मन । परम-शुद्ध ॥ ३५ ॥ ५७३ पुरुषोत्तमयोग
ज्ञानके लिए वैराग्य आवश्यक— तब विरक्तिके बिन । टिकता नहीं ज्ञान । निर्णय है यह जान । हरि चित्तका ॥ ३६ ॥ विरक्तिका कौनसा प्रकार । करेगा मनका अंगीकार । कर रखा यह भी विचार । सर्वज्ञ हरिने ॥ ३७ ॥ यह है विष मिश्रित अन्न । अतिथिको हो इसका ज्ञान । छोड़ उठता वह भोजन । इसी भांति ॥ ३८ ॥ अनित्य यह सब संसार । जानता है जो इसका सार । वह करता विरक्ति दूर । तो भी वह चिपकती ॥ ३९ ॥ पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका— अनिश्चितताका रूप निश्चित । वृक्ष-रूपकसे है जगन्नाथ । सुनायेंगे सुने सब यथार्थ । पंद्रहवेंमें ॥ ४० ॥ सहज पडा जो हो उन्मूलन । डाली जड़ उलट कर जान । सूखेगा वह जैसे क्षण क्षण । वैसे नहीं यह ॥ ४१ ॥ मिटाते हैं ऐसा दिखाकर । रूपकका भला चमत्कार । जन्म-मरणका जो चक्कर । संसारका ॥ ४२ ॥ दिखाके संसारका अनित्यत्व । स्वरूपमें अहंताका लयत्व । कहा जायेगा अब सार-तत्व । पंद्रहवेंमें ॥ ४३ ॥ अब यहीं ग्रंथ हृद्गत । कहेंगे सिद्धांत विस्तृत । सुने आप देकर चित्त । श्रोतृ-वृंद ॥ ४४ ॥ वह ब्रह्मानंद समुद्र । जो पूर्ण-पूर्णिमाका चंद्र । तथा द्वारकाका नरेंद्र । कहता ऐसा ॥ ४५ ॥ अजी ! सुन तू पांडुकुमार । आते हुए स्वरूपके घर । रुकावट करता समीर । विश्वाभासका ॥ ४६ ॥ वह जो जगडंबर । नहीं है यहां संसार । जान महा तरुवर । पड़ा है यहां ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी : ५७४
किंतु अन्य वृक्ष सरीखा । नीचे मूल ऊपर शाखा । ऐसा नहीं जान इसका । अंत न लगता ॥ ४८ ॥ आग अथवा यदि कुठार । पड़ती जिसके मूल पर । वह पड़ता है टूटकर । कितना ही बड़ा हो ॥ ४९ ॥ मूल सब जब वृक्ष टूटता । शाखाओं सह वह है गिरता । किंतु इसका ऐसा नहीं होता । यह न है सहज ॥ ५० ॥ संसार वृक्षकी कल्पना-- इसका है अर्जुन ! कौतुक । कहनेमें यह अलौकिक । बढ़ता जाता है अधोमुख । यह वृक्ष ॥ ५१ ॥ जैसे सूर्यकी ऊंची नहीं जानता । उसका रश्मि-जाल नीचे फैलता । वैसे ही यह है आश्चर्य दिखाता । संसार-वृक्ष ॥ ५२ ॥ जैसे कल्पांतका उदक । फैलता है आकाश तक । वैसे यह संसार रुख । घेरता सर्वस्व ॥ ५३ ॥ अथवा होता रविका अस्त । तमसे घिरती सारी रात । यह वृक्ष ऐसा होता व्याप्त । आकाश सारा ॥ ५४ ॥ खाना चाहे तो नहीं फलता । सूंघना चाहे तो नहीं फूलता । जैसे हो यह वृक्ष रहता । केवल वृक्ष ॥ ५५ ॥ मूल जमा है इसका ऊपर । शाखयें फैली हैं नीचेकी ओर । किंतु नहीं पड़ा टूटकर । रहता खिला हुवा ॥ ५६ ॥ तथा ऊर्ध्व-मूल ऐसे । कहा है स्पष्ट रूपसे । किंतु फैलते नीचेसे । इसकी जड़ ॥ ५७ ॥ बढनेमें है जैसे शेवाल । ऊपर वट हो या पीपल । अंकुरमें फूटते हैं डाल । इसके सब ॥ ५८ ॥ इस भांति सुनो पार्थ । संसार-वृक्षके साथ । नीचे ही है डाल पात । ऐसे भी नहीं ॥ ५९ ॥ ५७५ पुरुषोत्तमयोग
वैसे ही ऊर्ध्वकी ओर । शाखाओंके ढेर ढेर । दिखाई देते अपार । फैले हुए ॥ ६० ॥ या फैला हो वृक्ष रूपसे गगन । या वृक्ष रूपसे वायु-प्रसरण । या अवस्था-त्रयका विस्तार मान । हुवा वृक्ष रूपसे ॥ ६१ ॥ ऐसा है यह ऊर्ध्व-मूल । फैला है सर्वत्र बहुल । विश्वाकार लेके सकल । जान तू यह ॥ ६२ ॥ अब है इसका ऊर्ध्व-भाग कौन । इसके ऊर्ध्व-मूलके क्या कारण । इसके अधो-वृद्धिके क्या लक्षण । औ' डालियां हैं कैसी ॥ ६३ ॥ अथवा इस वृक्षकी । जड कैसी है नीचेकी । डालियाँ कैसी ऊर्ध्वकी । सुनो आब ॥ ६४ ॥ तथा यह अश्वत्थ है ऐसे । प्रसिद्धिके कारण क्या कैसे । आत्म-विद्या-विदोंने है ऐसे । किया क्यों निर्णय ॥ ६५ ॥ यह सब तू अर्जुन । अनुभवेगा जो ज्ञान । ऐसे करूंगा कथन । सुन तू अब ॥ ६६ ॥ तेरा ही यह है सौभाग्य । इसके लिए है तू योग्य । आया है सुन यह भाग्य । सर्वांगके कान कर ॥ ६७ ॥ प्रेम-रसका ऐसे हो स्फुरण । यदु-पति बोला जब श्रीकृष्ण । प्रकट हुवा तब अवधान । अर्जुनके रूपमें ॥ ६८ ॥ अति व्यापक जो कृष्ण-कथन । किंतु फैला पार्थका अवधान । जैसे घेरती दिशायें महान । आकाशको जैसे ॥ ६९ ॥ अजी ! श्रीकृष्ण वचन सागर । प्राशन करता है धनुर्धर । मानो है अगस्ति ऋषि दूसरा । एक घोंटमें ॥ ७० ॥ फूट पडी ऐसी श्रवणाशा निर्मळ । पार्थमें प्रतीत कर कृष्ण सरळ । करता है देव वह सुख सकल । न्योच्छावर पार्थपै ॥ ७१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७६
भगवान उवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ ऊर्ध्व-मूल ब्रह्मका वर्णन— फिर कहता है पांडव । इस तरुका है जो ऊर्ध्व । वृक्षके कारण सदैव । दीखता सहज ॥ ७२ ॥ वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ऐसा नहीं जहां भेद । कहते हो एकवद् । उस अद्वयका ॥ ७३ ॥ वह है अश्रवणीय नाद । तथा असौरभ्य मकरंद । तथा जो निरालंब आनंद । बिना रतिका ॥ ७४ ॥ जिसको जो आर-पार । तथा आगे-पीछेकी ओर । दृश्यादृश्यसे अगोचर । देखना है ॥ ७५ ॥ उपाधिका जो दूसरा । फैलानेसे है पसारा । नाम-रूपका संसार । होता जहां ॥ ७६ ॥ ज्ञाता ज्ञेयसे विहीन । केवल मात्र जो ज्ञान । सुखसे भरे गगन- । से चूता है ॥ ७७ ॥ नहीं है जो कार्य अथवा कारण । या अन्यसे आया जो अकेलापन । जिसको अपनेमें ही आप जान । भली भांति ॥ ७८ ॥ संसार-वृक्षका बीज और जड़— ऐसी सत्य-वस्तु जिसकी । जड़ है ऊपर इसकी । वहांसे निकली इसकी । कोंपल ऐसे ॥ ७९ ॥ श्री भगवानने कहा ऊंचे मूल तले शाख नित्य अश्वत्थ है कहा । उसके दलमें वेद पढे जो वेद जानता ॥ १ ॥ (73) ५७७ पुरुषोत्तमयोग