ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब कर्म-जन्य अभिमान । नहीं आता उसमें अर्जुन । या कर्म रह जानेसे मन । खिन्न नहीं होता ॥ २८ ॥ या सत्व होता है जब अधिक । इंद्रियां होती हैं ज्ञान प्रकाशक । तब न होता सु-विधाका तोष । या अविधाका खेद ॥ २९ ॥ अथवा बढ़ता है जब तम । तब न भासता मोह या भ्रम । या नहीं होता अज्ञानका श्रम । या न करे स्वीकार ॥ ३० ॥ आता जब मोहका अवसर । नहीं चाहता ज्ञान धनुर्धर । या ज्ञानसे कर्म-स्वीकार कर । न होता दुःखी ॥ ३१ ॥ प्रातः माध्यान्ह सायंकाल । गणना करके त्रिकाल । न तपता सूर्य निर्मल । वैसे वह रहता ॥ ३२ ॥ उसको भिन्न क्या प्रकाश । ज्ञानसे मिलाता है शेष । नहीं सुखाती अनावर्षा । जैसे सागरको ॥ ३३ ॥ या करनेसे कर्म-प्रवर्तन । नहीं होगा कर्मका अभिमान । कहो कहींसे होगा क्या कंपन । हिमालयको ॥ ३४ ॥ होनेसे मोहका आगमन । भूल जायेगा क्या वह ज्ञान । घामसे जलेगा क्या अर्जुन । प्रलयाग्नि कभी ॥ ३५ ॥ उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥ गुणोंके जालमें निर्लिप्त और निष्कंप रहता है— गुण और गुणका कार्य । आप है पूर्ण धनंजय । तभी है एकेकका कार्य । न डिगाता उसे ॥ ३६ ॥ करके ऐसी प्रतीति । देहमें मैने की वसति । जैसे राहमें कोई पंथी । मान लेके ॥ ३७ ॥ रहे जैसे उदासीन गुणोंसे जो न कांपता । जानके उनका खेल न डिगे लेश-मात्र भी ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६२