ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन जिताता या न हराता । स्वयं जीतता या हारता । न गुण होता या कराता । जैसा रण-रंग ॥ ३८ ॥ अथवा शरीर-गत प्राण । घरमें आतिथ्यका ब्राह्मण । या चौराहेपे खडा जो स्थाणु । वैसा उदास ॥ ३९ ॥ तथा गुणोंका आवागमन । उसको नहीं कंपाता जान । मृग-जलोर्मियोंसे अर्जुन । नहीं कांपता मेरू ॥ ४० ॥ इससे अधिक क्या बोलना । वायुसे गगनका हिलना । तमका सूर्यको निगलना । इसी भांति ॥ ४१ ॥ स्वप्न जैसा नहीं मोहता । जगता जो उसको पार्थ । वैसे उसे नहीं बांधता । गुणका जाल ॥ ४२ ॥ गुणमें वह नहीं फंसता । दूरसे वह है देखता । गुण-दोषकी नृत्य-कथा । साक्षी जैसा ॥ ४३ ॥ सात्विक करता सत्कर्म । रज करता रजो कर्म । भ्रम-आलस्यादिमें तम । करता कार्य ॥ ४४ ॥ सुन तू उसकी है सत्ता । होती गुण-क्रिया समस्त । जैसे सम्मुख हो सविता । लौकिकका ॥ ४५ ॥ समुद्र जैसे उमड आता । सोमकांत मणि पसीजता । अथवा है कुमुद खिलता । चंद्रिकासे ॥ ४६ ॥ या पवन बहता रुकता । गगन जैसे निश्चल रहता । वैसे गुणोंका हलचल होता । वह होता निश्चल ॥ ४७ ॥ ये हैं उसके लक्षण । गुणातीतके तू जान । कहता हूं आचरण । उसका मैं ॥ ४८ ॥ समदुःखसुखःस्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥ शांत जो स्तुति निंदामें धीर जो सुख दुःखमें । प्रियाप्रिय जिसे तुल्य स्वर्ण पाषाण मृत्तिका ॥ २४ ॥ ५६३ गुण-निस्तारयोग