ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुणातीतकी सम-वृत्ति- कपडेके अंदर बाहर । होता है तंतू ही धनुर्धर । वैसे देखता है चराचर । विश्वमें मद्रूप ॥ ४९ ॥ रिपु भक्तमें जैसे समान । रहता है परमात्मा जान । वैसे ही सुख दुःख अर्जुन । एकसे उसको ॥ ३५० ॥ वैसे भी स्वाभाविक । भोगना सुख दुःख । देह-रूप उदक । पाता मीन ॥ ५१ ॥ अब उसने वह छोड़ दिया । अपना स्व-स्वरूप जान लिया । जैसे भूसेसे दाना चुन लिया । खेतीहरने ॥ ५२ ॥ अथवा ओघ छोड़कर गांग । बन गया समुद्रका ही अंग । भूलकर अपना लगभग । कलकल ध्वनि ॥ ५३ ॥ हो गयी जब उसकी निश्चित । आत्म-रूपमें वसति सतत । देहमें तब उसको समस्त । एकसे सुख दुःख ॥ ५४ ॥ रात-दिवस समान । मानता स्तंभ अर्जुन । आत्म रत होता तन । द्वंद्व वैसे ॥ ५५ ॥ जैसे नींदमें रत शरीर । अप्सरा अथवा अजगर । एक मानता है धनुर्धर । वैसे देहके द्वंद्व ॥ ५६ ॥ देखता उसका मन । सुवर्ण रत्न पाषाण । सदैव एक समान । बिना भेदके ॥ ५७ ॥ घरमें उतर आता स्वर्ग । अथवा ऊपर आता बाघ । न होता आत्म-बुद्धिका भंग । उसका कभी ॥ ५८ ॥ जैसे मृत न होता जागृत । या भूना बीज न अंकुरित । वैसी होती है बुद्धि आत्मस्थ । सदा अभंग ॥ ५९ ॥ ब्रह्म है तू ऐसा स्तवन । या निंदा करो नीच मान । जलने बुझनेका ज्ञान । नहीं जानती राख ॥ ३६० ॥ ज्ञानेश्वरी ५६४