भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे निंदा अथवा स्तवन । जानता नहीं वह अर्जुन । तम और प्रकाशका ज्ञान । न होता सूर्यको ॥ ६१ ॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥ ईश्वर-बुद्धिसे किया पूजन । या चोर मानके किया ताडन । वृष-गजसे किया दलन । या दिया राज ॥ ६२ ॥ जैसे पास आये आप्त-मित्र । या घिर आये शत्रु-सर्वत्र । किंतु न जानता सूर्य रात्र । अथवा दिवस ॥ ६३ ॥ सभी ऋतुमें जैसे गगन । निर्लिप्त रहता है अर्जुन । ऐसा वैषम्य रहित मन । होता उसका ॥ ६४ ॥ वैसे ही उसका एक आचार । कहता हूं तुझे पांडुकुमार । नहीं होता कभी कोई व्यापार । वहां प्रारंभ ॥ ६५ ॥ सर्वारंभ वहां समाप्त । प्रवृत्तिका होता है अस्त । जले हैं कर्म-फल पार्थ । सभी वहां ॥ ६६ ॥ दृष्ट्यादृष्ट्य भोगकी पार्थ । नहीं होती चाह जागृत । प्रारब्धसे होता जो प्राप्त । पाता वह सहज ॥ ६७ ॥ सुख या दुखमें जैसे । पाषाण रहता वैसे । त्याग-स्वीकार मनसे । मिट गया है ॥ ६८ ॥ कितना करना विस्तार । जिसका है ऐसा आचार । उसे मान तू धनुर्धर । गुणातीत ॥ ६९ ॥ गुणोंका अतिक्रमण । करनेका क्या साधन । कहता वह श्रीकृष्ण । सुनिये अब ॥ ३७० ॥ मानापमानमें जैसे समान शत्रु-मित्रमें । गुणातीत वही मान आरंभ जिसने तजा ॥ २५ ॥ ५६५ गुण-निस्तारयोग