भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ गुण-निस्तारका साधन-- ऐसे जो अव्यभिचार चित्त । भक्ति-योग-रत हो सतत । मेरा सेवन करता पार्थ । लांघता गुण ॥ ७१ ॥ अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन-- तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति । अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति । होना उसकी पूर्ण निश्चिति । अत्यावश्यक ॥ ७२ ॥ तब तू सुन अर्जुन । यहां है मेरा क्या स्थान । रत्नमें तेज जो रत्न । वैसा हूं मैं ॥ ७३ ॥ या द्रवणवत है नीर । या अवकाश है अंबर । या मिठास ही है शक्कर । नहीं भिन्न ॥ ७४ ॥ या अग्नि ही है ज्वाल । दल ही है कमल । वृक्ष जो वही डाल । फलादिक ॥ ७५ ॥ हिम होता जो संघटित । कहलाता वह हिमवंत । या जामन लगा दूध पार्थ । कहलाता दही ॥ ७६ ॥ यहां विश्व है जो अर्जुन । स्वयं मैं हूं वह संपूर्ण । चंद्र-बिंबका तरासना । न होता वैसे ॥ ७७ ॥ अजी ! जमा हुवा घृत । जमकर भी रहता घृत । या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ ७८ ॥ न उघड़ कर भी वस्त्र । स्पष्ट ही रहता सूत्र । जैसे न तोडके भी पात्र । रहती मृत्तिका ॥ ७९ ॥ ———————————————————————— जो एक-निष्ठ भक्तीसे करता मम सेवन । लांघके गुणको सारे पाता ब्रह्मत्व है वह ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६६

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