ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण । ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व-सह मै हूं ॥ ३८० ॥ इस प्रकार जो मुझको जानना । उसको अव्यभिचारी भक्ति कहना । विश्वमें औ' मुझमें भेद देखना । व्यभिचारी भक्ति ॥ ८१ ॥ इसलिये भेद तज पार्थ । तथा करके अभेद-चित्त । जानना है अपने सहित । मुझको सदैव ॥ ८२ ॥ सोनेपे जैसे सुवर्ण । जडा जाता है अर्जुन । वैसे अपनेसे भिन्न । न मानना मुझे ॥ ८३ ॥ तेजसे जो होता उत्पन्न । तेजोमय होता किरण । तेजसे होता है अभिन्न । ऐसा होना बोध ॥ ८४ ॥ भूतलमें जैसे परमाणु । हिमाचलमें है हिम-कण । वैसे मुझमें कर अर्पण । अपनेको तू ॥ ८५ ॥ तरंग होता छोटा अर्जुन । किंतु न होता सिंधुसे भिन्न । वैसे ईश्वरसे नहीं भिन्न । कुछ भी यहां ॥ ८६ ॥ इसी भांति समरस । दृष्टि रख स-उल्लास । भक्तिका वह निवास । कहते हम ॥ ८७ ॥ ज्ञान और योगका समन्वय, अद्वय-दृष्टि— तथा ज्ञानकी भी अर्जुन । सही दृष्टि यह है जान । तथा योगका है संपूर्ण । सार भी यही ॥ ८८ ॥ सिंधुसे जैसे जल-धर । लेते हैं अखंड जो धार । वैसी वृत्ति पांडुकुमार । बनती तन्मय ॥ ८९ ॥ जैसे कूप मुखका आकाश । सांधा न जाता महाकाश । होता है वैसे परम-रस । ऐक्य-रूप ॥ ३९० ॥ प्रति-बिंब तक बिंबसे । प्रभा-ज्योति होती है जैसे । सोऽहम् वृत्ति होती है वैसे । धनंजय ॥ ९१ ॥ ५६७ : गुण-निस्तारयोग