भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसे ही फिर परस्पर । सोऽहम् वृत्तिका अवतार । वह भी मिटती फिर । अपने आप ॥ ९२ ॥ जैसे नूनका एक कण । समुद्रमें पिघला जान । गलना भी फिर अर्जुन । भूलता जैसे ॥ ९३ ॥ अथवा जलकर तृण । बुझ जाता है अग्नि-कण । भेद-नाशका वैसे ज्ञान । मिटता आप ॥ ९४ ॥ रहता हूं मैं उस पार । भक्त रहता इस पार । यह दोनों ही मिटकर । रहता अनादि ऐक्य ॥ ९५ ॥ गुणोंको है वह लांघता । यह भी अब न रहता । न रहती एक वाक्यता । एकत्वकी भी ॥ ९६ ॥ इसीको ब्रह्मत्व कहते हैं जो मेरी एक-निष्ठ भक्तिसे मिलता है— यह जो है ऐसी स्थिति । ब्रह्मत्व है कहलाती । मेरी अव्यभिचारी भक्ति । देती है यह ॥ ९७ ॥ तथा ऐसे लक्षण-युक्त । जगतमें मेरा जो भक्त । ब्रह्मत्व उससे संयुक्त । पतिव्रता जैसे ॥ ९८ ॥ पानी जो गंगामें बहता । सिंधुसे निश्चित मिलता । इसमें नहीं है अन्यथा । उसी भांति ॥ ९९ ॥ ज्ञान-दृष्टिसे जो अर्जुन । करता है मेरा सेवन । होता है वह जुडा रत्न । ब्रह्म-पदका ॥ ४०० ॥ ऐसे ब्रह्म-पदका पार्थ । सायुज्य ऐसी व्यवस्था । उसीका नाम है चौथा । पुरुषार्थ जो ॥ १ ॥ किंतु मेरा यह आराधन । होता है ब्रह्मत्वका सोपान । इससे मैं इसका साधन । मानेगा तू ॥ २ ॥ यदि एसा है तेरा मन । करता कल्पना अर्जुन । नहीं है अन्य मेरे बिन । कोई ब्रह्म ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६८

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