ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥ सबका मूल आधार मैं हूं-- ब्रह्म नामका आधार । मैं हूं यहां धनुर्धर । औ' अन्य शब्दका सार । वह भी मैं हूं ॥ ४ ॥ जैसा मंडल औ' चंद्रमा । अभेद होते हैं जान मर्म । वैसे ही मैं और हे ब्रह्म । एक-रूप ॥ ५ ॥ तथा नित्य जो निष्कंप । अनावृत्त धर्मरूप । सुख-रूप जो अमाप । अद्वितीय ॥ ६ ॥ विवेक अपना काम । करके मिलता धाम । निष्कर्षका है निःसीम । वह भी मैं हूं ॥ ७ ॥ विजय गया अब दूर- अजी ! कीजिये यह श्रवण । अनन्य भक्त-प्रिय श्रीकृष्ण । करता है पार्थसे कथन । कहता संजय ॥ ८ ॥ धृतराष्ट्र कहता यह सुन । तुझसे यह पूछता है कौन । बिन पूछे ही व्यर्थका भाषण । करता क्यों तू ? ॥ ९ ॥ विजयकी वार्ता तू कहकर । हमारी व्यग्रता .दूर कर । कहता है "विजय गया दूर" । संजय मनमें ॥ ४१० ॥ संजय है मनमें विस्मित । वैसे ही है अतिशय त्रस्त । किस भांति यह द्वेश-रस । श्रीकृष्णसे है ॥ ११ ॥ फिर भी वह कृपालु हो तुष्ट । इन्हें करें आत्म-विवेक पुष्ट । जिससे हो इनका रोग नष्ट । महा-मोहका ॥ १२ ॥ आधार ब्रह्मका मैं हूं वैसे ही अमृतत्वका । शाश्वत धर्मका भी मैं तथा निस्सीम सुखका ॥ २७ ॥ (72) ५६९ गुण-निस्तारयोग