ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ गुण-निस्तारका साधन-- ऐसे जो अव्यभिचार चित्त । भक्ति-योग-रत हो सतत । मेरा सेवन करता पार्थ । लांघता गुण ॥ ७१ ॥ अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन-- तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति । अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति । होना उसकी पूर्ण निश्चिति । अत्यावश्यक ॥ ७२ ॥ तब तू सुन अर्जुन । यहां है मेरा क्या स्थान । रत्नमें तेज जो रत्न । वैसा हूं मैं ॥ ७३ ॥ या द्रवणवत है नीर । या अवकाश है अंबर । या मिठास ही है शक्कर । नहीं भिन्न ॥ ७४ ॥ या अग्नि ही है ज्वाल । दल ही है कमल । वृक्ष जो वही डाल । फलादिक ॥ ७५ ॥ हिम होता जो संघटित । कहलाता वह हिमवंत । या जामन लगा दूध पार्थ । कहलाता दही ॥ ७६ ॥ यहां विश्व है जो अर्जुन । स्वयं मैं हूं वह संपूर्ण । चंद्र-बिंबका तरासना । न होता वैसे ॥ ७७ ॥ अजी ! जमा हुवा घृत । जमकर भी रहता घृत । या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ ७८ ॥ न उघड़ कर भी वस्त्र । स्पष्ट ही रहता सूत्र । जैसे न तोडके भी पात्र । रहती मृत्तिका ॥ ७९ ॥ ———————————————————————— जो एक-निष्ठ भक्तीसे करता मम सेवन । लांघके गुणको सारे पाता ब्रह्मत्व है वह ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६६
इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण । ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व-सह मै हूं ॥ ३८० ॥ इस प्रकार जो मुझको जानना । उसको अव्यभिचारी भक्ति कहना । विश्वमें औ' मुझमें भेद देखना । व्यभिचारी भक्ति ॥ ८१ ॥ इसलिये भेद तज पार्थ । तथा करके अभेद-चित्त । जानना है अपने सहित । मुझको सदैव ॥ ८२ ॥ सोनेपे जैसे सुवर्ण । जडा जाता है अर्जुन । वैसे अपनेसे भिन्न । न मानना मुझे ॥ ८३ ॥ तेजसे जो होता उत्पन्न । तेजोमय होता किरण । तेजसे होता है अभिन्न । ऐसा होना बोध ॥ ८४ ॥ भूतलमें जैसे परमाणु । हिमाचलमें है हिम-कण । वैसे मुझमें कर अर्पण । अपनेको तू ॥ ८५ ॥ तरंग होता छोटा अर्जुन । किंतु न होता सिंधुसे भिन्न । वैसे ईश्वरसे नहीं भिन्न । कुछ भी यहां ॥ ८६ ॥ इसी भांति समरस । दृष्टि रख स-उल्लास । भक्तिका वह निवास । कहते हम ॥ ८७ ॥ ज्ञान और योगका समन्वय, अद्वय-दृष्टि— तथा ज्ञानकी भी अर्जुन । सही दृष्टि यह है जान । तथा योगका है संपूर्ण । सार भी यही ॥ ८८ ॥ सिंधुसे जैसे जल-धर । लेते हैं अखंड जो धार । वैसी वृत्ति पांडुकुमार । बनती तन्मय ॥ ८९ ॥ जैसे कूप मुखका आकाश । सांधा न जाता महाकाश । होता है वैसे परम-रस । ऐक्य-रूप ॥ ३९० ॥ प्रति-बिंब तक बिंबसे । प्रभा-ज्योति होती है जैसे । सोऽहम् वृत्ति होती है वैसे । धनंजय ॥ ९१ ॥ ५६७ : गुण-निस्तारयोग
ऐसे ही फिर परस्पर । सोऽहम् वृत्तिका अवतार । वह भी मिटती फिर । अपने आप ॥ ९२ ॥ जैसे नूनका एक कण । समुद्रमें पिघला जान । गलना भी फिर अर्जुन । भूलता जैसे ॥ ९३ ॥ अथवा जलकर तृण । बुझ जाता है अग्नि-कण । भेद-नाशका वैसे ज्ञान । मिटता आप ॥ ९४ ॥ रहता हूं मैं उस पार । भक्त रहता इस पार । यह दोनों ही मिटकर । रहता अनादि ऐक्य ॥ ९५ ॥ गुणोंको है वह लांघता । यह भी अब न रहता । न रहती एक वाक्यता । एकत्वकी भी ॥ ९६ ॥ इसीको ब्रह्मत्व कहते हैं जो मेरी एक-निष्ठ भक्तिसे मिलता है— यह जो है ऐसी स्थिति । ब्रह्मत्व है कहलाती । मेरी अव्यभिचारी भक्ति । देती है यह ॥ ९७ ॥ तथा ऐसे लक्षण-युक्त । जगतमें मेरा जो भक्त । ब्रह्मत्व उससे संयुक्त । पतिव्रता जैसे ॥ ९८ ॥ पानी जो गंगामें बहता । सिंधुसे निश्चित मिलता । इसमें नहीं है अन्यथा । उसी भांति ॥ ९९ ॥ ज्ञान-दृष्टिसे जो अर्जुन । करता है मेरा सेवन । होता है वह जुडा रत्न । ब्रह्म-पदका ॥ ४०० ॥ ऐसे ब्रह्म-पदका पार्थ । सायुज्य ऐसी व्यवस्था । उसीका नाम है चौथा । पुरुषार्थ जो ॥ १ ॥ किंतु मेरा यह आराधन । होता है ब्रह्मत्वका सोपान । इससे मैं इसका साधन । मानेगा तू ॥ २ ॥ यदि एसा है तेरा मन । करता कल्पना अर्जुन । नहीं है अन्य मेरे बिन । कोई ब्रह्म ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६८
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥ सबका मूल आधार मैं हूं-- ब्रह्म नामका आधार । मैं हूं यहां धनुर्धर । औ' अन्य शब्दका सार । वह भी मैं हूं ॥ ४ ॥ जैसा मंडल औ' चंद्रमा । अभेद होते हैं जान मर्म । वैसे ही मैं और हे ब्रह्म । एक-रूप ॥ ५ ॥ तथा नित्य जो निष्कंप । अनावृत्त धर्मरूप । सुख-रूप जो अमाप । अद्वितीय ॥ ६ ॥ विवेक अपना काम । करके मिलता धाम । निष्कर्षका है निःसीम । वह भी मैं हूं ॥ ७ ॥ विजय गया अब दूर- अजी ! कीजिये यह श्रवण । अनन्य भक्त-प्रिय श्रीकृष्ण । करता है पार्थसे कथन । कहता संजय ॥ ८ ॥ धृतराष्ट्र कहता यह सुन । तुझसे यह पूछता है कौन । बिन पूछे ही व्यर्थका भाषण । करता क्यों तू ? ॥ ९ ॥ विजयकी वार्ता तू कहकर । हमारी व्यग्रता .दूर कर । कहता है "विजय गया दूर" । संजय मनमें ॥ ४१० ॥ संजय है मनमें विस्मित । वैसे ही है अतिशय त्रस्त । किस भांति यह द्वेश-रस । श्रीकृष्णसे है ॥ ११ ॥ फिर भी वह कृपालु हो तुष्ट । इन्हें करें आत्म-विवेक पुष्ट । जिससे हो इनका रोग नष्ट । महा-मोहका ॥ १२ ॥ आधार ब्रह्मका मैं हूं वैसे ही अमृतत्वका । शाश्वत धर्मका भी मैं तथा निस्सीम सुखका ॥ २७ ॥ (72) ५६९ गुण-निस्तारयोग
करता है संजय ऐसा चिंतन । तथा करता संवादका श्रवण । जिससे उमडकर आता मन । हर्षातिरेकसे ॥ १३ ॥ ऐसा हो वह उत्साहित । अब श्रीकृष्णार्जुनकी बात । कहेगा तो देकर चित्त । सुनियेगा ॥ १४ ॥ उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठांव । कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १५ ॥ गीता श्लोक २७ ज्ञानेश्वरी ओवी ४१५.
१५ पुरुषोत्तम-दर्शनयोग श्रीसद्गुरुकी मानस-पूजा— अपना यह अंतःकरण । बना करके श्रीसिंहासन । उस पर रखेंगे चरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥ ऐक्य भावकी अंजली । इंद्रिय-कमल-कली । भरकर पुष्पांजली । देंगे अर्घ्य ॥ २ ॥ अनन्यता-उदक शुद्ध । संस्कार निष्ठाका सु-सिद्ध । लगावें अनामिका गंध । चंदन-तिलक ॥ ३ ॥ स्वर्णिम प्रेमके नूपुर । श्रीचरणमें सुकुमार चढायें समर्पित कर । विशुद्धतासे ॥ ४ ॥ अनन्यतासे जो है दृढ । अव्यभिचारका निचोड़ । बनाके चरणोंके जोड़ । चढ़ायेंगे ॥ ५ ॥ आनंद-मोद बहुल । सात्विकताके मुकुल । खिले हुए अष्ट-दल । चढायें पदपे ॥ ६ ॥ जलायें अहंका धूप । उतारें नाहंका दीप । समरस होके आप । मिले निरंतर ॥ ७ ॥ बनाके मेरे तन औ' प्राण । चढाऊं पादुका श्रीचरण । करूं भोग-मोक्षका निंब-लोण । उन चरणों पर ॥ ८ ॥ इन गुरु-चरणोंकी सेवा । देती सकल पुरुषार्थ मेवा । प्राप्त हो हम वह सुदैव । ऐसा करें हम ॥ ९ ॥
देता अंतिम-विश्रांति-स्थान । वहां तक खिलता जो ज्ञान । बनाता सुधा-सिंधु महान । वाचाका वह ॥ १० ॥ असंख्य पूर्ण-सुधाकर । करें जिसपे न्योच्छावर । होता है वक्तृत्व मधुर । जिस दैवसे ॥ ११ ॥ सूर्य उदय जो पूर्व-दिशा । देती है जगतको प्रकाश । करती दीवाली ज्ञान-दशा । वैसे श्रोताओंकी ॥ १२ ॥ जिससे स्फुरता है व्याख्यान । लगता नाद-ब्रह्म भी बौना । मोक्ष-धाम भी है शोभा-हीन । उसके सम्मुख ॥ १३ ॥ मंडपमें श्रवण सुखके । जगतको वसंत ऋतुके । सुख मिले व्याख्यान-वल्लीके । ऐसा बहार आता ॥ १४ ॥ नहीं लगनेसे जिसकी थाह । लौटती है वाचा मनके सह । उसके शब्दमें आता है वह । कितना आश्चर्य ॥ १५ ॥ ज्ञान जिसे नहीं जानता । ध्यानमें भी जो नहीं आता । वह है अगोचर रमता । उसकी गोष्ठियोंमें ॥ १६ ॥ इतना बड़ा जो सौभग । बनता है वाचाका अंग । गुरु-पद-पद्म-पराग । प्राप्त होता ॥ १७ ॥ ऐसा यह भाग्य है नहीं । मेरे बिन अन्यको कहीं । कहता है आपसे यहीं । ज्ञानदेव ॥ १८ ॥ रहा हूं अबोध बालक । श्रीगुरुका इकलौता एक । इसी लिए कृपा स्वाभाविक । मिली मुझको मात्र ॥ १९ ॥ मेघमाला जैसे संपूर्ण । देती है चातकको प्राण । मेरे लिए गुरु-चरण । बने वैसे ॥ २० ॥ तभी मेरा रीता ही मुख । करने लगा बकबक । किंतु निकला स्वाभाविक । गीता तत्व मधुर ॥ २१ ॥ होता है जब दैव अनुकूल । रेती बनते मोति अनमोल । शत्रु भी बन जाते हैं सकल । ऐश्वर्य सह मित्र ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७२
चुल्हेपे चढाये हुए हरल । पक जाते अमृतसे चावल । भूखेका रखना यदि काल । जगन्नाथको ॥ २३ ॥ ऐसे ही जिसे श्रीगुरुवर । करते हैं जब अंगीकार । बन जाता है सारा संसार । मोक्षधाम ॥ २४ ॥ देखो कैसे नारायण । पांडवोंके अवगुण । बना देते हैं पुराण । विश्व-वंद्य ॥ २५ ॥ ऐसे श्री निवृत्तिराज । मुझ अज्ञानिमें आज । लाते हैं ज्ञानका ओज । स्व-कृपासे ॥ २६ ॥ रहने दे यह गुरु-गुण वर्णन । वर्णनसे होती है महिमा मलीन । गुरुवर्णनका मुझमें कहां ज्ञान । इसीलिए ॥ २७ ॥ उनकी कृपासे सदय । कहते गीता साभिप्राय । धोता हूं मैं आपके पूज्य । अब श्री चरण ॥ २८ ॥ करता चौदहका अंत । कह कर यह सिद्धांत । अर्जुनसे श्री भगवंत । कैवल्य पति जो ॥ २९ ॥ ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है— करता जो ज्ञान हस्तगत । मोक्ष पाता है वही समर्थ । होता इंद्रपद हस्तगत । जैसे शत-मखसे ॥ ३० ॥ अथवा लेकर शत जन्म । करता सतत ब्रह्म-कर्म । वही बनता अंतमें ब्रह्म । अन्य नहीं कोई ॥ ३१ ॥ या करता है सूर्य दर्शन । केवल मात्र एक नयन । वैसे केवल ज्ञानसे मान । मोक्ष प्राप्त ॥ ३२ ॥ ऐसे ज्ञान के लिए कौन । होता यहां सामर्थ्यवान । खो जानेसे हुवा दर्शन । अकेलेका ॥ ३३ ॥ पातालमें भी जो है निधान । दिखाएगा लगाके अंजन । इसके लिए होना लोचन । पाव्जके ही ॥ ३४ ॥ वैसे ही मोक्ष देगा ज्ञान । यहां बात नहीं भिन्न । इसके लिए होना मन । परम-शुद्ध ॥ ३५ ॥ ५७३ पुरुषोत्तमयोग
ज्ञानके लिए वैराग्य आवश्यक— तब विरक्तिके बिन । टिकता नहीं ज्ञान । निर्णय है यह जान । हरि चित्तका ॥ ३६ ॥ विरक्तिका कौनसा प्रकार । करेगा मनका अंगीकार । कर रखा यह भी विचार । सर्वज्ञ हरिने ॥ ३७ ॥ यह है विष मिश्रित अन्न । अतिथिको हो इसका ज्ञान । छोड़ उठता वह भोजन । इसी भांति ॥ ३८ ॥ अनित्य यह सब संसार । जानता है जो इसका सार । वह करता विरक्ति दूर । तो भी वह चिपकती ॥ ३९ ॥ पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका— अनिश्चितताका रूप निश्चित । वृक्ष-रूपकसे है जगन्नाथ । सुनायेंगे सुने सब यथार्थ । पंद्रहवेंमें ॥ ४० ॥ सहज पडा जो हो उन्मूलन । डाली जड़ उलट कर जान । सूखेगा वह जैसे क्षण क्षण । वैसे नहीं यह ॥ ४१ ॥ मिटाते हैं ऐसा दिखाकर । रूपकका भला चमत्कार । जन्म-मरणका जो चक्कर । संसारका ॥ ४२ ॥ दिखाके संसारका अनित्यत्व । स्वरूपमें अहंताका लयत्व । कहा जायेगा अब सार-तत्व । पंद्रहवेंमें ॥ ४३ ॥ अब यहीं ग्रंथ हृद्गत । कहेंगे सिद्धांत विस्तृत । सुने आप देकर चित्त । श्रोतृ-वृंद ॥ ४४ ॥ वह ब्रह्मानंद समुद्र । जो पूर्ण-पूर्णिमाका चंद्र । तथा द्वारकाका नरेंद्र । कहता ऐसा ॥ ४५ ॥ अजी ! सुन तू पांडुकुमार । आते हुए स्वरूपके घर । रुकावट करता समीर । विश्वाभासका ॥ ४६ ॥ वह जो जगडंबर । नहीं है यहां संसार । जान महा तरुवर । पड़ा है यहां ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी : ५७४
किंतु अन्य वृक्ष सरीखा । नीचे मूल ऊपर शाखा । ऐसा नहीं जान इसका । अंत न लगता ॥ ४८ ॥ आग अथवा यदि कुठार । पड़ती जिसके मूल पर । वह पड़ता है टूटकर । कितना ही बड़ा हो ॥ ४९ ॥ मूल सब जब वृक्ष टूटता । शाखाओं सह वह है गिरता । किंतु इसका ऐसा नहीं होता । यह न है सहज ॥ ५० ॥ संसार वृक्षकी कल्पना-- इसका है अर्जुन ! कौतुक । कहनेमें यह अलौकिक । बढ़ता जाता है अधोमुख । यह वृक्ष ॥ ५१ ॥ जैसे सूर्यकी ऊंची नहीं जानता । उसका रश्मि-जाल नीचे फैलता । वैसे ही यह है आश्चर्य दिखाता । संसार-वृक्ष ॥ ५२ ॥ जैसे कल्पांतका उदक । फैलता है आकाश तक । वैसे यह संसार रुख । घेरता सर्वस्व ॥ ५३ ॥ अथवा होता रविका अस्त । तमसे घिरती सारी रात । यह वृक्ष ऐसा होता व्याप्त । आकाश सारा ॥ ५४ ॥ खाना चाहे तो नहीं फलता । सूंघना चाहे तो नहीं फूलता । जैसे हो यह वृक्ष रहता । केवल वृक्ष ॥ ५५ ॥ मूल जमा है इसका ऊपर । शाखयें फैली हैं नीचेकी ओर । किंतु नहीं पड़ा टूटकर । रहता खिला हुवा ॥ ५६ ॥ तथा ऊर्ध्व-मूल ऐसे । कहा है स्पष्ट रूपसे । किंतु फैलते नीचेसे । इसकी जड़ ॥ ५७ ॥ बढनेमें है जैसे शेवाल । ऊपर वट हो या पीपल । अंकुरमें फूटते हैं डाल । इसके सब ॥ ५८ ॥ इस भांति सुनो पार्थ । संसार-वृक्षके साथ । नीचे ही है डाल पात । ऐसे भी नहीं ॥ ५९ ॥ ५७५ पुरुषोत्तमयोग
वैसे ही ऊर्ध्वकी ओर । शाखाओंके ढेर ढेर । दिखाई देते अपार । फैले हुए ॥ ६० ॥ या फैला हो वृक्ष रूपसे गगन । या वृक्ष रूपसे वायु-प्रसरण । या अवस्था-त्रयका विस्तार मान । हुवा वृक्ष रूपसे ॥ ६१ ॥ ऐसा है यह ऊर्ध्व-मूल । फैला है सर्वत्र बहुल । विश्वाकार लेके सकल । जान तू यह ॥ ६२ ॥ अब है इसका ऊर्ध्व-भाग कौन । इसके ऊर्ध्व-मूलके क्या कारण । इसके अधो-वृद्धिके क्या लक्षण । औ' डालियां हैं कैसी ॥ ६३ ॥ अथवा इस वृक्षकी । जड कैसी है नीचेकी । डालियाँ कैसी ऊर्ध्वकी । सुनो आब ॥ ६४ ॥ तथा यह अश्वत्थ है ऐसे । प्रसिद्धिके कारण क्या कैसे । आत्म-विद्या-विदोंने है ऐसे । किया क्यों निर्णय ॥ ६५ ॥ यह सब तू अर्जुन । अनुभवेगा जो ज्ञान । ऐसे करूंगा कथन । सुन तू अब ॥ ६६ ॥ तेरा ही यह है सौभाग्य । इसके लिए है तू योग्य । आया है सुन यह भाग्य । सर्वांगके कान कर ॥ ६७ ॥ प्रेम-रसका ऐसे हो स्फुरण । यदु-पति बोला जब श्रीकृष्ण । प्रकट हुवा तब अवधान । अर्जुनके रूपमें ॥ ६८ ॥ अति व्यापक जो कृष्ण-कथन । किंतु फैला पार्थका अवधान । जैसे घेरती दिशायें महान । आकाशको जैसे ॥ ६९ ॥ अजी ! श्रीकृष्ण वचन सागर । प्राशन करता है धनुर्धर । मानो है अगस्ति ऋषि दूसरा । एक घोंटमें ॥ ७० ॥ फूट पडी ऐसी श्रवणाशा निर्मळ । पार्थमें प्रतीत कर कृष्ण सरळ । करता है देव वह सुख सकल । न्योच्छावर पार्थपै ॥ ७१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७६
भगवान उवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥ ऊर्ध्व-मूल ब्रह्मका वर्णन— फिर कहता है पांडव । इस तरुका है जो ऊर्ध्व । वृक्षके कारण सदैव । दीखता सहज ॥ ७२ ॥ वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ऐसा नहीं जहां भेद । कहते हो एकवद् । उस अद्वयका ॥ ७३ ॥ वह है अश्रवणीय नाद । तथा असौरभ्य मकरंद । तथा जो निरालंब आनंद । बिना रतिका ॥ ७४ ॥ जिसको जो आर-पार । तथा आगे-पीछेकी ओर । दृश्यादृश्यसे अगोचर । देखना है ॥ ७५ ॥ उपाधिका जो दूसरा । फैलानेसे है पसारा । नाम-रूपका संसार । होता जहां ॥ ७६ ॥ ज्ञाता ज्ञेयसे विहीन । केवल मात्र जो ज्ञान । सुखसे भरे गगन- । से चूता है ॥ ७७ ॥ नहीं है जो कार्य अथवा कारण । या अन्यसे आया जो अकेलापन । जिसको अपनेमें ही आप जान । भली भांति ॥ ७८ ॥ संसार-वृक्षका बीज और जड़— ऐसी सत्य-वस्तु जिसकी । जड़ है ऊपर इसकी । वहांसे निकली इसकी । कोंपल ऐसे ॥ ७९ ॥ श्री भगवानने कहा ऊंचे मूल तले शाख नित्य अश्वत्थ है कहा । उसके दलमें वेद पढे जो वेद जानता ॥ १ ॥ (73) ५७७ पुरुषोत्तमयोग
अजी ! माया ऐसी ख्याति । चलती है जो है नास्ति । जैसे वंध्याकी संतति । बातोंमें ही ॥ ८० ॥ वह होती अथवा नहीं होती । विचारका नाम नहीं सहती । यहां वह अनादि कहलाती । इस प्रकारकी ॥ ८१ ॥ यह है भव-द्रुम बीजिका । या प्रपंचकी भूमिका । औ, विपरीतज्ञान-दीपिका । प्रज्वलित है जो ॥ ८२ ॥ अनेक शक्तियोंकी पेटिका । आकाश मानो विश्वदभ्रका । वस्त्र है जो आकार मात्रका । तह किया हुवा ॥ ८३ ॥ माया साथ ही है ब्रह्मके । होकर भी जैसे नहींके । प्रकट होती है वस्तुके । प्रकाश रूप जो ॥ ८४ ॥ अपनेको आती है जब नींद । करती तब अपनेको मुग्ध । कजली करती प्रकाश मंद । दीपकका जैसे ॥ ८५ ॥ प्रियके साथ तरुणांगी स्वप्नमें । सोई हुई उठकर शीघ्रातमें । आलिंगनके बिना आलिंगनमें । करती सकाम ॥ ८६ ॥ ऐसे स्वरूपमें हुई जो माया । स्वाश्रयमें अज्ञान धनंजय । वही इस भव-तरुका भया । पहला मूल ॥ ८७ ॥ वस्तुका अपना जो अबोध । ऊपर वह बांधता कंद । वेदांतमें भी यही प्रसिद्ध । कहा बीज-भाव ॥ ८८ ॥ घना अज्ञान भाव जो सुषुप्ति । बीजांकुर-भाव सुभद्रापति । अन्य दो जो स्वप्न और जागृति । उसका फल भाव ॥ ८९ ॥ ऐसा वेदांत प्रतिपादन । संज्ञा है ये प्रसिद्ध तू जान । रहने दो यहां है अर्जुन । अज्ञान मूल ॥ ९० ॥ उस अतीत आत्माको निर्मळ । अधोर्ध्व सूचित करके मूल । तथा चारों ओर बना वर्तुळ । माया-योगका ॥ ९१ ॥ फिर हो अनेक देहांतर । छूटते हैं उसके अपार । सभी ओरसे बना अंकुर । गहरे उतरते ॥ ९२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५७८
ऐसा भव-द्रुमका मूल । ऊपर पाकरके बल । उसके हैं दलके दल । उतरते नीचे ॥ ९३॥ संसार-वृक्षका पहला पल्लव— वहां चिद्वृत्तिके पहला । महतत्व कोंपल खिला । पल्लव जो हरा निकला । कोंपल एक ॥ ९४ ॥ फिर सत्व-रज-तमात्मक । त्रिविध अहंकार जो एक । वह तिगुना हो अधोमुख । फूटी डाल ॥ ९५ ॥ बुद्धिका लेकर अंकुर । बढ़ाता भेदको अपार । तन मनकी डाल सुंदर । बढ़ने लगती ॥ ९६ ॥ ऐसे ले कर मूलकी दृढता । विकल्प रसकी जो कोमलता । चित्त-चतुष्टयकी विविधता । फूटते पल्लव ॥ ९७ ॥ भवद्रुमका विस्तार— आकाश वायु द्योतक । और है पृथ्वी उदक । फूटती ये पांच शाख । उसमें जोरसे ॥ ९८ ॥ वैसे ही श्रोत्रादि तन्मात्रा । उसके अंगभूत पत्र । जो हैं अति चित्र विचित्र । फूटते रहते ॥ ९९ ॥ तब शब्दांकुर पर्यंत । होते हैं श्रोत्र विकसित । आकांक्षाके नूतन पार्थ । चढती डालियां ॥ १०० ॥ अंग-त्वचाका जो लता पल्लव । स्पर्शांकुर तक होते फैलाव । वहां बढते हैं नित नव । विकार विविध ॥ १ ॥ तब रूप-पत्रके दलके दल । दूर तक फैलाती हैं आंखें सरल । फैलता है तब बड़ा भ्रम-जाल । सविस्तृत ॥ २ ॥ और रसनाका शाखा खंड । वेगसे बढता है उदंड । जिव्हा चापल्यके जो प्रचंड । फूटते शाख ॥ ३ ॥ वैसे ही गंधकी जो कोंपल । घ्राणेंद्रियको करती प्रबल । तब गंध-लोभ फैलाता विपुल । आनंद पल्लव ॥ ४ ॥ ५७९ पुरुषोत्तमयोग
ऐसी जो महदहं-बुद्धि । मन महाभूत संसृष्टि । इस संसारकी अवधि । बना लेते हैं ॥ ५ ॥ भव-द्रुमका स्वरूप — अजी ! यह इन्ही आठ अंगसे । फैलता जाता है अति वेगसे । किंतु है रजत-रूपसे जैसे । दीखती सीप ॥ ६ ॥ या सागरका जितना विस्तार । उतना ही तरंगत्व संचार । वैसे है ब्रह्म ही वृक्ष-आकार । अज्ञान मूल ॥ ७ ॥ यही अब इसका विस्तार । और इसका है यही प्रसार । स्वप्नमें अपना परिवार । होता जैसे एकका ही ॥ ८ ॥ रहने दो अब यह वर्णन । इस भांति यह बढ़ता जान । महदादि बोझसे है अर्जुन । अधोशाख ॥ ९ ॥ इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं— इसको अश्वत्थ ऐसे । कहते हैं जो क्यों कैसे । वह भी सुन तू इसे । कहता हूं मैं ॥ ११० ॥ अजी ! श्वः कहा तो कल । तब तक प्रति पल । रहना नहीं निश्चल । इसका कभी ॥ ११ ॥ जैसे है बीतता है क्षण । मेघ बदलता नाना वर्ण । या बिजली न होती संपूर्ण । निमिष एक ॥ १२ ॥ या कांपता हुआ पद्म-दलं । उस पर पड़ा हुआ जल । या चित्त जैसे होता व्याकुल । मनुष्यका ॥ १३ ॥ वैसे ही है इसकी स्थिति । नासता जाता क्षण प्रति । इसीलिये हे शुद्ध-मति । कहते अश्वत्थ ॥ १४ ॥ तथा अश्वत्थ ऐसी संज्ञा । पीपलको पड़ी सुविज्ञा । नहीं वह भाव सर्वज्ञ - । श्रीहरिका यहां ॥ १५ ॥ वैसे पीपल कहा तो एक । मैंने मान लिया होता देख । किंतु रहने दे जो लौकिक । इसमें क्या अर्थ ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८०
इसीलिये यहां प्रस्तुत । यह है अलौकिक ग्रंथ । यहां क्षणिकत्वको अश्वत्थ । कहा गया है ॥ १७ ॥ यह और ही है एक विध । अव्ययत्वमें अति प्रसिद्ध । इसका प्रकार अंतर्सिद्ध । है इस भांति ॥ १८ ॥ जैसे मेघ-मुख एक ओर । सुखाते रहते हैं सागर । तथा नदियां दूसरी ओर । भरती रहतीं ॥ १९ ॥ जिससे न चढता न उतरता । सदा एकसा भरा पूरा रहता । किंतु जब तक सम योग होता । मेघ-नदियोंका ॥ १२० ॥ वैसे इस वृक्षका होता जान । उस गतिका तर्क नहीं होना । तभी लोगोंका अव्यय कहना । इसको यथार्थ ॥ २१ ॥ जैसे दान-शील मनुष्य । करता दानसे संचय । वैसे व्ययसे है अव्यय । यह वृक्ष ॥ २२ ॥ अथवा रथका चक्र जैसे । चलता अतिशय वेगसे । दीखता भूमिमें धंसा ऐसे । उसी प्रकार ॥ २३ ॥ वैसे ही तीव्र गतिसे कालकी । गिरती भूत शाखामें जिसकी । वहां फूटती असंख्य इसकी । कोंपल नित्य ॥ २४ ॥ ऐसे गलते जाते कितने । नये फूटते जाते कितने । न जाने आते जाते कितने । सावनके बादलसे ॥ २५ ॥ कल्पांतमें होते नष्ट भ्रष्ट । कल्पारंभमें होते हैं जो सृष्ट । और होते हैं अनेक विश्व-दृष्ट । धनंजय ॥ २६ ॥ प्रचंड संहार-वातसे प्रलयके । झड़ते छिलके जब इस वृक्षके । फूटते नव-अंकुर कर्मांरंभके । करोडोंमें ॥ २७ ॥ मन्वंतर सरकता मनुके नंतर । बढ़ते जाते अनेक वंश वंश पर । मानो बढता है ईख कांड कांड कर । वैसे ही यह वृक्ष ॥ २८ ॥ कलियुगांतमें सूखा छिलका । चार युगोंका झड़ता इसका । तब बढ़ता है कृत-युगका । नूतन मोटा ॥ २९ ॥ ५८१ पुरुषोत्तमयोग
जैसे वर्ष पर वर्ष बीतता । एक दूसरेका मूल बनता । वैसे दिवस आता और जाता । जानते नहीं ॥ १३० ॥ जैसे वायुकी लहर आना । उसका जोड़ नहीं समझना । वैसे डालोंका झड़ना बढ़ना । समझता नहीं ॥ ३१ ॥ गिरता जब एक देहांकुर । फूटते सहस्र शरीरांकुर । तब दीखता भव तरुवर । अव्यय ऐसा ॥ ३२ ॥ पानी बहता जब तीव्र गतिसे । वैसे ही आता है अधिक पीछेसे । तभी उस स्रोतको अनंत ऐसे । मानते लोग ॥ ३३ ॥ या जितनेमें पलक झपकती । करोड़ों लहरें उठ गिरती । जिससे है दृष्टि अनुभवती । तरंग है नित्य ॥ ३४ ॥ या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर । जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ३५ ॥ लट्टू घूमता है तीव्र गतिसे । लगता है चिपक बैठा भूमिसे । इसका वेगातिशय होता वैसे । भ्रमका कारण ॥ ३६ ॥ अंधारमें अति वेगसे । अग्नि-काष्ठको घुमानेसे । सहज ही दीखता जैसे । चक्राकार ॥ ३७ ॥ यह संसार-वृक्ष ऐसा । नासता बढता सहसा । न देख लोक पागल-सा । मानता अव्यय ॥ ३८ ॥ किंतु जो इसका वेग देखता । इसके क्षणिकत्वको देखता । करोड़ों बार यह होता जाता । क्षण भरमें जो ॥ ३९ ॥ अज्ञानके बिन नहीं मूल । इसका अस्तित्व नकल । यह वृक्ष अति क्षीण-छाल । देखा जिसने ॥ १४० ॥ उसे मानता मैं सर्वज्ञ । वह है वंदनीय प्राज्ञ । ब्रह्म-सिद्धांतका है सूज्ञ । धनुर्धर ॥ ४१ ॥ योग-मात्र जो सकल । मिला है उसको ही फल । उसके बलसे केवल । जीता ज्ञान ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८२
कौन करें उसका वर्णन । भव-द्रुमको अनित्य मान । चलता है पुरुष अर्जुन । इस भांति ॥ ४३ ॥ अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥ इस भव-द्रुमका फैलाव -- फिर यह प्रपंच रूप । अधः शाखा जो पादप । बढता जाता परंतप । ऊर्ध्वशाख हो ॥ ४४ ॥ तथा नीचे फैले जो डाल । उसमें फूटते हैं मूल । उस मूलमें फूटे वेल । पल्लवादिक ॥ ४५ ॥ अजी ! हमने पीछे ऐसे । उपक्रममें कहा जैसे । उसीको सहज रूपसे । कहते अब ॥ ४६ ॥ बद्धमूल है जो अज्ञानसे । महदादिकके शासनसे । बडे वेद-पर्ण फूटनेसे । फैला है अपार ॥ ४७ ॥ पहले इससे स्वेदज । जारज उद्भिज मणिज । मूळसे ही जो महाभुज । उठते चार ॥ ४८ ॥ इस एकेकसे अंकुर । फूटके अनेक प्रकार । जीवोंकी शाख बढ़ाकर । होते चौरासी लाख ॥ ४९ ॥ बढ़ते हैं खंड सरल । नाना सृष्टिकी डाल डाल । टेढी मेढी फूटती डाल । अनेक जातिकी ॥ १५० ॥ ऊंचे तले शाख विस्तार होता औ' भोग पत्ते गुण-पुष्ठ होते । नये नये मूल फूले तले जो नृलोकमें कर्म-निबन्ध कारी ॥ २ ॥ ५८३ पुरुषोत्तमयोग
स्त्री पुरुष नपुंसक । आकारसे भेदात्मक । टकराते हैं आंगिक । विकार भारसे ॥ ५१ ॥ वर्षाकाल है जैसे गगनमें । फैलता नव मेघके रूपमें । वैसे आकार-मात्र अज्ञानमें । फैलता जाता ॥ ५२ ॥ शाखाओंका है फिर अंगभार । झुकके उलझता परस्पर । और-गुण क्षोभका है समीर । छूटता तब ॥ ५३ ॥ ऊर्ध्वमूलका फट जाना— आता है तब भयंकर । गुण क्षोभका बवंडर । जिससे तीन स्थान पर । फटता ऊर्ध्वमूल ॥ ५४ ॥ जब ऐसा रजका समीर । बहता है जब धनुर्धर । मनुष्य जाति शाखा अपार । बढती हैं ॥ ५५ ॥ न ऊर्ध्व या अधमें उसके । मध्यमें लगती हैं तनेके । टेडी शाख फूटते उसके । वर्णकी चार ॥ ५६ ॥ विधि-निषेधके सपल्लव । वेद-वाक्यके जो अभिनव । डुलकर उसके पल्लव । करते शोभा ॥ ५७ ॥ ऐहिक भोगके नामवंत । अर्थ-काम कर प्रसारित । बढ़ते हैं तीव्र विकसित । नव अंकुरोंसे ॥ ५८ ॥ संसारका जो वृद्धि लोभ । खडा करता शुभाशुभ । अनेकानेक कर्म-स्तंब । न जाने कितने ॥ ५९ ॥ पहलेका भोग-क्षय जब होता । साथ ही शुष्क देह जब गिरता । तथा विस्तारका प्रारंभ होता । नव देहका तब ॥ १६० ॥ तथा सुशोभित शब्दादिक । सहज रंगके आकर्षक । फूटते नित नये मोहक । विषय पल्लव ॥ ६१ ॥ वैसे रजो-वातसे प्रचंड । मनुष्य शाखाओंके झुंड । बढते, कहते जिसे रूढ । मानव लोक ॥ ६२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८४
वैसे रजका समीर । रुकते ही बहता घोर । तमोगुणका बवंडर । उसी समय ॥ ६३ ॥ तभी यही मनुष्य शाख । नीचे नीचे वासना देख । फैलती है शाखोपशाख । कुकर्मकी जो ॥ ६४ ॥ अप्रवृत्तिसे जो चिन्हित । निकलते डंटल पार्थ । उसमें लगते हैं सार्थ । प्रमादके ॥ ६५ ॥ बोलते निषेध-नियम । मंत्र जो हैं ऋक्-यजु-साम । गाते वही पात अकर्म । सम्मुख आके ॥ ६६ ॥ प्रतिपादन अभिचार । मंत्र-तंत्र जो पर-भार । करते उसका प्रसार । वासना लता ॥ ६७ ॥ तब तब होते बलिष्ठ । अकर्मादि जड़ अनिष्ट । तथा बढ़ते शाख पुष्ट । जन्मकी आगे ॥ ६८ ॥ चांडालादि वहां निकृष्ट । दोष-योनिके दंड पुष्ट । फैलाता जन कर्म-भ्रष्ट । जाल भ्रमका ॥ ६९ ॥ उसे पशु-पक्षी सूकर । व्याघ्र वृश्चिकादि विषार । टेडे शाखाओंका विस्तार । होता है जैसे ॥ १७० ॥ ऐसी जो शाखायें पांडव । सर्वांगमें नित्य ही नव नव । देती हैं नरकानुभव । फलका तो ॥ ७१ ॥ हिंसा रति वहां प्रमुख । कुकर्म-संघ ही है सुख । निषिद्ध कर्मांकुर चोख । बढ़ते जन्मोंसे ॥ ७२ ॥ ऐसे होते हैं तरु-तृण । लोह लोष्ट औ' पाषाण । इस शाखके ऐसे जान । लगते फल ॥ ७३ ॥ अर्जुन ! यह तू सुन । मनुष्यसे जो है निम्न । वृद्धि स्थिर तक जान । शाखाओंकी ॥ ७४ ॥ तभी मनुष्य-रूपी डाल । तलेकी शाखाओंका मूल । आगे फैलता वही मूल । संसार-तरुका ॥ ७५ ॥ (74) ५८५ पुरुषोत्तमयोग