ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्त्री पुरुष नपुंसक । आकारसे भेदात्मक । टकराते हैं आंगिक । विकार भारसे ॥ ५१ ॥ वर्षाकाल है जैसे गगनमें । फैलता नव मेघके रूपमें । वैसे आकार-मात्र अज्ञानमें । फैलता जाता ॥ ५२ ॥ शाखाओंका है फिर अंगभार । झुकके उलझता परस्पर । और-गुण क्षोभका है समीर । छूटता तब ॥ ५३ ॥ ऊर्ध्वमूलका फट जाना— आता है तब भयंकर । गुण क्षोभका बवंडर । जिससे तीन स्थान पर । फटता ऊर्ध्वमूल ॥ ५४ ॥ जब ऐसा रजका समीर । बहता है जब धनुर्धर । मनुष्य जाति शाखा अपार । बढती हैं ॥ ५५ ॥ न ऊर्ध्व या अधमें उसके । मध्यमें लगती हैं तनेके । टेडी शाख फूटते उसके । वर्णकी चार ॥ ५६ ॥ विधि-निषेधके सपल्लव । वेद-वाक्यके जो अभिनव । डुलकर उसके पल्लव । करते शोभा ॥ ५७ ॥ ऐहिक भोगके नामवंत । अर्थ-काम कर प्रसारित । बढ़ते हैं तीव्र विकसित । नव अंकुरोंसे ॥ ५८ ॥ संसारका जो वृद्धि लोभ । खडा करता शुभाशुभ । अनेकानेक कर्म-स्तंब । न जाने कितने ॥ ५९ ॥ पहलेका भोग-क्षय जब होता । साथ ही शुष्क देह जब गिरता । तथा विस्तारका प्रारंभ होता । नव देहका तब ॥ १६० ॥ तथा सुशोभित शब्दादिक । सहज रंगके आकर्षक । फूटते नित नये मोहक । विषय पल्लव ॥ ६१ ॥ वैसे रजो-वातसे प्रचंड । मनुष्य शाखाओंके झुंड । बढते, कहते जिसे रूढ । मानव लोक ॥ ६२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८४