ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे रजका समीर । रुकते ही बहता घोर । तमोगुणका बवंडर । उसी समय ॥ ६३ ॥ तभी यही मनुष्य शाख । नीचे नीचे वासना देख । फैलती है शाखोपशाख । कुकर्मकी जो ॥ ६४ ॥ अप्रवृत्तिसे जो चिन्हित । निकलते डंटल पार्थ । उसमें लगते हैं सार्थ । प्रमादके ॥ ६५ ॥ बोलते निषेध-नियम । मंत्र जो हैं ऋक्-यजु-साम । गाते वही पात अकर्म । सम्मुख आके ॥ ६६ ॥ प्रतिपादन अभिचार । मंत्र-तंत्र जो पर-भार । करते उसका प्रसार । वासना लता ॥ ६७ ॥ तब तब होते बलिष्ठ । अकर्मादि जड़ अनिष्ट । तथा बढ़ते शाख पुष्ट । जन्मकी आगे ॥ ६८ ॥ चांडालादि वहां निकृष्ट । दोष-योनिके दंड पुष्ट । फैलाता जन कर्म-भ्रष्ट । जाल भ्रमका ॥ ६९ ॥ उसे पशु-पक्षी सूकर । व्याघ्र वृश्चिकादि विषार । टेडे शाखाओंका विस्तार । होता है जैसे ॥ १७० ॥ ऐसी जो शाखायें पांडव । सर्वांगमें नित्य ही नव नव । देती हैं नरकानुभव । फलका तो ॥ ७१ ॥ हिंसा रति वहां प्रमुख । कुकर्म-संघ ही है सुख । निषिद्ध कर्मांकुर चोख । बढ़ते जन्मोंसे ॥ ७२ ॥ ऐसे होते हैं तरु-तृण । लोह लोष्ट औ' पाषाण । इस शाखके ऐसे जान । लगते फल ॥ ७३ ॥ अर्जुन ! यह तू सुन । मनुष्यसे जो है निम्न । वृद्धि स्थिर तक जान । शाखाओंकी ॥ ७४ ॥ तभी मनुष्य-रूपी डाल । तलेकी शाखाओंका मूल । आगे फैलता वही मूल । संसार-तरुका ॥ ७५ ॥ (74) ५८५ पुरुषोत्तमयोग