भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे ऊर्ध्वका जो पार्थ । आदि मूल देखा जाता । आदिसे ये हैं मध्यस्थ । शाखायें सब ॥ ७६ ॥ किंतु तामस सात्विक । सुकृत दुष्कृतात्मक । फैल जाती हैं जो शाख । अध-ऊर्ध्वकी ॥ ७७ ॥ तथा वेद-त्रयके हैं पान । अन्यत्र न लगते अर्जुन । मनुष्य बिन अन्य विधान । नहीं उसका ॥ ७८ ॥ इसलिये मनुष्यका तन । ऊर्ध्व-मूलकी शाखा है मान । इस कर्म-वृद्धिके कारण । वही मूल ॥ ७९ ॥ फैलती शाखायें जब वृक्षोंमें । जड़ जाती हैं गहरी पृथ्वीमें । जड़ गड़ी जाती हैं जैसे पृथ्वीमें । वृक्ष फैलता ऊपर ॥ १८० ॥ उसी भांति है यह शरीर । कर्मके साथ देह संसार । देह है तब तक व्यापर । चलता रहता ॥ ८१ ॥ तब है मनुष्य देह पार्थ । इसकी जड़ कहना सार्थ । यहां यह बोलना यथार्थ । श्रीकृष्णका जो ॥ ८२ ॥ फिर है तमका दारुण । रुक जाता जब तूफान । सत्वका छूटता सत्राण । चंड मारुत ॥ ८३ ॥ उस समय यह मनुष्याकार । जड़में छूटता सुगंध अंकुर । उसमें फूटते मुकुल अपार । नव नव कोंपल ॥ ८४ ॥ विकसित ज्ञानके कारण । प्रज्ञा-कुशलताके जो तीक्ष्ण । अंकुर फूटते प्रति-क्षण । फैलते हुए ॥ ८५ ॥ बुध्दिके शाखोपशाख । स्फूर्तिंसे बलसे नेक । प्रकाशसे सविवेक । खिलते हैं ॥ ८६ ॥ मेधा-रससे वहां भरपूर । आस्था-पल्लवसे खिले सुंदर । सरल निकलते हैं अंकुर । सद्वृत्तिके ॥ ८७ ॥ सदाचारके तब अनेक । कोमल कोंपल सुवासिक । गूंजते हैं सदा वेद घोष । उन पल्लवोंसे ॥ ८८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८६