भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 659

शिष्ट आगम विधान । विविध याग वितान । ऐसे पल्लव अर्जुन । बढ़ते जाते ॥ ८९ ॥ अनेक गुच्छ ऐसे यम-दमके । लगते हैं जब तप टहनीके । तथा आलिंगन करते उसके । वैराग्यकी टहनियां ॥ ९० ॥ विशिष्ट व्रतोंकी जो शाख । तीक्ष्ण धैर्यांकुरमें देख । जन्म-वेगसे ऊर्ध्वमुख । उठते जाते ॥ ९१ ॥ करते पल्लव वेद-गर्जन । सद्विद्याओंका घोष महान । जब बहता है वायु अर्जुन । सात्विकताका ॥ ९२ ॥ अन्य अनेक ऊर्ध्व शाखाओंका विवेचन- वहां धर्म-शाखाओंमें विस्तृत । जन्म-शाखा जो सरल दर्शित । उसमें स्वर्गादिक फलयुक्त । शाखा फैलती अनेक ॥ ९३ ॥ फिर उपरति रक्त-वर्ण । उसमें शाखा नित नवीन । बढती लहराके अर्जुन । धर्म-मोक्षकी ॥ ९४ ॥ फिर रवि-चंद्रादि ग्रह-वर । पितर ऋषि आदि विद्याधर । फूटती नाना शाखा चहूं ओर । विस्तार पूर्वक ॥ ९५ ॥ इससे भी ऊंचाई पर । इंद्रादि शाख श्रेष्ठतर । फलादिसे जो भर कर । बढती अनेक ॥ ९६ ॥ इसके ऊपर भी है शाख । तप-ज्ञानसे बढी है देख । अत्रि मरीचि कश्यपादिक । ऊर्ध्व हैं अति ॥ ९७ ॥ उत्तरोत्तर उस प्रकार । ऊर्ध्व-शाखाओंका है प्रसार । छोटे मूलमें बड़ा अपार । फळता जाता ॥ ९८ ॥ ऊर्ध्व-शाखाओंके अग्रपर । आता फल भार धनुर्धर । ब्रह्मेश जैसे महा अंकुर । फूटते नुकीले ॥ ९९ ॥ फूलोंके अति भारसे । झुकता है ऊपरसे । तथा लगता मूलसे । जैसे हो मूलमें ॥ २०० ॥ वैसे भी प्रकृत जो रुख । फल-भारसे लदी शाख । झुककर आती है देख । जडके पास ॥ १ ॥ ५८७ पुरुषोत्तमयोग