भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 660

जहांसे इसका विस्तार । प्रारंभ हुवा धनुर्धर । मिलता है वही आकार । ज्ञान-योगसे ॥ २ ॥ इसीलिये सुन ब्रह्मेशके । बाद बढ़ना नहीं जीवके । वहांसे ऊपर है जिसके । ब्रह्मही केवल ॥ ३ ॥ इस भांति धनंजया । ब्रह्मादिक टहनियां । ऊर्ध्व-मूल जो है माया । उससे नहीं तुलती ॥ ४ ॥ और भी ऊपर जो शाख । जिसके नाम सनकादिक । फल-मूलमें न आती देख । भरी है ब्रह्ममें ॥ ५ ॥ ऐसे मनुष्यसे जानना पार्थ । ऊर्ध्वमें हैं जो ब्रह्मादिक पात । बढ़ जाती इसकी शाखा-जात । सविस्तर ऊंची ॥ ६ ॥ ऊर्ध्वके हैं जो ब्रह्मादि । मनुष्य उसके आदि । इसीलिये कहा आदि । मूल इसके ॥ ७ ॥ ऐसा तुझे अलौकिक । दिखाया है ऊर्ध्व शाख । कह यह भव रूख । ऊर्ध्वमूल ॥ ८ ॥ संसार वृक्ष उन्मूलन कैसे करना— तथा आदिका भी है जो मूल । उत्पत्ति सह कहा सकल । अब सुनो करना उन्मूल । कैसे यह ॥ ९ ॥ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥ न रूप इसका दीखे किसीको न मूल है या न तना न शाखा । विरक्तिका ले कर तीव्र शस्त्र काटें इसे जो दृढ-मूल वृक्ष ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५८८