ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु यहां अर्जुन । सोचेगा तेरा मन । काटनेका साधन । क्या है इसका ॥ २१० ॥ अंत तक है ब्रह्मका । ऊर्ध्व शाखायें उसका । औ' अरूपमें जिसका । ऊर्ध्व-मूल ॥ ११ ॥ स्थावरादिसे इसका तल । फैलाता जाता अनेक डाल । फिर दौड़ते दूसरे मूल । मनुष्य रूपमें ॥ १२ ॥ ऐसा गहरा और विस्तृत । कौन करेगा इसका अंत । ऐसा नहीं लाना क्षुद्र बात । अपने मनमें ॥ १३ ॥ इसको उखाडना कौनसी बात । इसमें आयास नहीं किंचित । बच्चोंको करने क्या भय-मुक्त । दूर भगाना क्या हौवेको ॥ १४ ॥ गंधर्व नगरोंको क्या गिराना । खरहेके सींगोंको क्या तोडनां । यदि होता है उसे तोड़ना । आकाश पुष्प ॥ १५ ॥ ऐसे है यह रूख । सत्य नहीं है देख । रहा क्या है जो निःशेष । करना उसे ॥ १६ ॥ हमने कहा जो इसका प्रकार । करते समय मूलका विस्तार । वंध्या संतति खेलती घरभर । वैसे ही है यह ॥ १७ ॥ होते ही जब जागृत । क्या रही स्वप्नकी बात । वैसे ही है वह पार्थ । पोला वृक्ष ॥ १८ ॥ अजी ! जैसे अब मैंने कहा था । इसका दृढ मूल यदि होता । तथा वैसा ही यदि यह होता । वास्तविक वृक्ष ॥ १९ ॥ तथा किस मायका संतान । कर सकते हैं उन्मूलन । अजी ! फूंकनेसे क्या गगन । उड़जायेगा ॥ २२० ॥ इसीलिये यहां धनंजया । यहां जिसका बखान किया । जैसे कूर्मिके घृतसे किया । आथित्य राजाका ॥ २१ ॥ अजी ! मृगजलका सरोवर । दूरसे ही दीखता सुन्दर । होता क्या मृग-जल सींचकर । फलोंका बाग ॥ २२ ॥ ५८९ पुरुषोत्तमयोग