भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 662, कुल 1172 में से

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मूल अज्ञान ही अस्तित्व हीन । उसका कार्य हो कैसे महान । तब संसार-वृक्षकी अर्जुन । कथा कैसी ॥ २३ ॥ इसका नहीं है अंत । यह कहना भी पार्थ । यह है यहां यथार्थ । एक रूपसे ॥ २४ ॥ जब तक नहीं जगता । निद्राका अंत नहीं होता । तब तक नहीं प्रकाशता । अंत न हो रातका ॥ २५ ॥ इसी प्रकार जान तू पार्थ । विवेक उठाता माथ । तब रहता अश्वत्थ । भव रूप ॥ २६ ॥ जब तक वायु शांत । रहता नहीं निश्चित । तब तक है अनंत । कहाता तरंग ॥ २७ ॥ जैसे होता सूर्यका अस्त । मृग-जल भास समाप्त । या बुझती है दीप-ज्योत । मिटता प्रकाश ॥ २८ ॥ वैसे मूल अविद्याको निगलता । ज्ञान जब है वह प्रकट होता । तभी संसार-वृक्षका अंत होता । अन्यथा नहीं ॥ २९ ॥ अनादि है इसका अर्थ । केवल शाब्दिक नहीं पार्थ । उपरोक्त दृष्टिसे यथार्थ । जानना यहां ॥ ३०• ॥ संसार-वृक्षका नहीं । स्वरूपका पता कहीं । तब आरंभ भी कहीं । होगा कैसे ॥ ३१ ॥ होता जो जहांसे उत्पन्न । वहां उसका आदि जान । नहीं जिसका जन्म-स्थान । कहां मूल ॥ ३२ ॥ अजी ! जिसका जन्म है नहीं । अस्तित्वका कहीं पता नहीं । तभी यह अनित्यत्वसे ही । है अनादि ॥ ३३ ॥ अजी ! जो है बांझिनीका पुत्र । उसका कहां है जन्म-पत्र । नभमें नीली माटी सर्वत्र । कहना कैसे ॥ ३४ ॥ आकाश-कुसुमका अर्जुन । डंटल तोडेगा कहो कौन । तभी यह भवद्रुम जान । कहना अनादि ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९०

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