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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

किंतु यहां अर्जुन । सोचेगा तेरा मन । काटनेका साधन । क्या है इसका ॥ २१० ॥ अंत तक है ब्रह्मका । ऊर्ध्व शाखायें उसका । औ' अरूपमें जिसका । ऊर्ध्व-मूल ॥ ११ ॥ स्थावरादिसे इसका तल । फैलाता जाता अनेक डाल । फिर दौड़ते दूसरे मूल । मनुष्य रूपमें ॥ १२ ॥ ऐसा गहरा और विस्तृत । कौन करेगा इसका अंत । ऐसा नहीं लाना क्षुद्र बात । अपने मनमें ॥ १३ ॥ इसको उखाडना कौनसी बात । इसमें आयास नहीं किंचित । बच्चोंको करने क्या भय-मुक्त । दूर भगाना क्या हौवेको ॥ १४ ॥ गंधर्व नगरोंको क्या गिराना । खरहेके सींगोंको क्या तोडनां । यदि होता है उसे तोड़ना । आकाश पुष्प ॥ १५ ॥ ऐसे है यह रूख । सत्य नहीं है देख । रहा क्या है जो निःशेष । करना उसे ॥ १६ ॥ हमने कहा जो इसका प्रकार । करते समय मूलका विस्तार । वंध्या संतति खेलती घरभर । वैसे ही है यह ॥ १७ ॥ होते ही जब जागृत । क्या रही स्वप्नकी बात । वैसे ही है वह पार्थ । पोला वृक्ष ॥ १८ ॥ अजी ! जैसे अब मैंने कहा था । इसका दृढ मूल यदि होता । तथा वैसा ही यदि यह होता । वास्तविक वृक्ष ॥ १९ ॥ तथा किस मायका संतान । कर सकते हैं उन्मूलन । अजी ! फूंकनेसे क्या गगन । उड़जायेगा ॥ २२० ॥ इसीलिये यहां धनंजया । यहां जिसका बखान किया । जैसे कूर्मिके घृतसे किया । आथित्य राजाका ॥ २१ ॥ अजी ! मृगजलका सरोवर । दूरसे ही दीखता सुन्दर । होता क्या मृग-जल सींचकर । फलोंका बाग ॥ २२ ॥ ५८९ पुरुषोत्तमयोग

मूल अज्ञान ही अस्तित्व हीन । उसका कार्य हो कैसे महान । तब संसार-वृक्षकी अर्जुन । कथा कैसी ॥ २३ ॥ इसका नहीं है अंत । यह कहना भी पार्थ । यह है यहां यथार्थ । एक रूपसे ॥ २४ ॥ जब तक नहीं जगता । निद्राका अंत नहीं होता । तब तक नहीं प्रकाशता । अंत न हो रातका ॥ २५ ॥ इसी प्रकार जान तू पार्थ । विवेक उठाता माथ । तब रहता अश्वत्थ । भव रूप ॥ २६ ॥ जब तक वायु शांत । रहता नहीं निश्चित । तब तक है अनंत । कहाता तरंग ॥ २७ ॥ जैसे होता सूर्यका अस्त । मृग-जल भास समाप्त । या बुझती है दीप-ज्योत । मिटता प्रकाश ॥ २८ ॥ वैसे मूल अविद्याको निगलता । ज्ञान जब है वह प्रकट होता । तभी संसार-वृक्षका अंत होता । अन्यथा नहीं ॥ २९ ॥ अनादि है इसका अर्थ । केवल शाब्दिक नहीं पार्थ । उपरोक्त दृष्टिसे यथार्थ । जानना यहां ॥ ३०• ॥ संसार-वृक्षका नहीं । स्वरूपका पता कहीं । तब आरंभ भी कहीं । होगा कैसे ॥ ३१ ॥ होता जो जहांसे उत्पन्न । वहां उसका आदि जान । नहीं जिसका जन्म-स्थान । कहां मूल ॥ ३२ ॥ अजी ! जिसका जन्म है नहीं । अस्तित्वका कहीं पता नहीं । तभी यह अनित्यत्वसे ही । है अनादि ॥ ३३ ॥ अजी ! जो है बांझिनीका पुत्र । उसका कहां है जन्म-पत्र । नभमें नीली माटी सर्वत्र । कहना कैसे ॥ ३४ ॥ आकाश-कुसुमका अर्जुन । डंटल तोडेगा कहो कौन । तभी यह भवद्रुम जान । कहना अनादि ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९०

जैसे घटका अनास्तित्व । किये बिना ही अस्तित्व । जैसे जान तू अनादित्व । इस वृक्षका ॥ ३६ ॥ अर्जुन देख तू यही । इसका आद्यंत नहीं । मध्यका भास जो वही । मात्र है भास ॥ ३७ ॥ ब्रह्म-गिरिसे निकलता । तथा समुद्रसे न मिलता । किंतु मध्यमें है भास होता । मृगांबुका जैसा ॥ ३८ ॥ अजी ! आद्यंतकी नहीं बात । तथा कहो नहीं होता पार्थ । किंतु अनस्तित्वसे प्रतीत । होते है यह ॥ ३९ ॥ जैसे अनेक रंगोंसे युक्त । इंद्र-धनुष होता दर्शित । वैसे होता है यह प्रतीत । अज्ञानीको ॥ २४० ॥ स्थितिकालमें यह फंसाता । ज्ञानीकी आंखोंमें भरता । कफनी पहन कर आता । बहुरूपी जैसे ॥ ४१ ॥ नहीं होते हुए अर्जुन । नीलिमा दिखाता गगन । वह भी क्षणभर मान । वैसे ही ॥ ४२ ॥ स्वप्नके वस्तु अनसक्त । यदि मान लिये वे सत्त । वैसे आभास यहां पार्थ । मिलता क्षणिक ॥ ४३ ॥ देखनेमें दीखता है सुंदर । पकडने जाता जब वानर । नहीं मिलता जैसे धनुर्धर । जलका बिंब ॥ ४४ ॥ तरंग-भंग होता न्यून । विद्युद्गति अल्प अर्जुन । इससे तीव्र-गति जान । इसके भासकी ॥ ४५ ॥ मारुत जैसे ग्रीष्मांतका । न जानते आगे पीछेका । इसी भांति इस वृक्षका । नहीं स्थैर्य ॥ ४६ ॥ नहीं इसका सृष्टि स्थिति लय । वैसे ही रूप नहीं धनंजय । तब इसका उन्मूलन कार्य । कठिन कैसे ॥ ४७ ॥ ५९१ पुरुषोत्तमयोग

आत्म-ज्ञानका ले करवाळ— अपना ही अज्ञानका बल । लेके हुवा यह दृढ-मूल । आत्म-ज्ञानका ले करवाळ । तोडना इसे ॥ ४८ ॥ ज्ञान छोड करके एक । करनेसे उपाय देख । उलझेगा तू अधिक । इसी वृक्षमें ॥ ४९ ॥ फिर कितने शाखसे शाखको । उछलेगा अध और ऊर्ध्वको । तभी काट तू अज्ञान मूलको । सम्यक्-ज्ञानसे ॥ २५० ॥ वैसे ही डोरका विषधर । मारने किया लठियोंका ढेर । उससे होगा केवल भार । व्यर्थका जो ॥ ५१ ॥ तैरने गंगा मृग-जलकी । दौड-धूप की नांव लानेकी । औ' लगाई नालेमें डुबकी । जो था यथार्थ ॥ ५२ ॥ अस्तित्व हीन जो संसार । नाशने किये श्रम घोर । तथा उसीमें धनुर्धर । गया आप ॥ ५३ ॥ जैसे नाशने स्वप्नका भय । जगना उपाय धनंजय । अज्ञान मूलका है उपाय । ज्ञान खड्ग ॥ ५४ ॥ लीलासे यदि उसको चलाना । तब वैराग्यका नित्य-नूतन । करना अभंग बल-साधना । बुद्धिको पार्थ ॥ ५५ ॥ होता वैराग्यका उत्थान । तब त्रिवर्ग है जान । मानो श्वानका वमन । लगता वह ॥ ५६ ॥ यहां तक है अर्जुन । वस्तु-जातमें संपूर्ण । अरुचि उभार मान । वैराग्यका हो ॥ ५७ ॥ फिर देहाहंताका म्यान । उतार करके तत्क्षण । प्रत्यग्बुद्धि करमें जान । धरना वह ॥ ५८ ॥ फिर वह विवेक सानपे धरना । 'ब्रह्म हूं' यह बोध तीव्र करना । फिर उसी एक बोधसे है घिसना । पूर्ण रूपसे ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९२

फिर निश्चयका मुष्टि-बल । देखना एक दो बार तौल । तब उसे धरना निश्चल । मनन तक ॥ २६० ॥ अपनेसे जब हथियार । निज-ध्याससे एक होकर । न रहेगा दौडने दूसरा । अपनेसे आगे ॥ ६१ ॥ आत्म-ज्ञानकी जो तलवार । अद्वयानुभव फैलाकर । न रहेगा भव-तरुवर । कहीं भी कभी ॥ ६२ ॥ शरदागमनका समीर । करता जैसे स्वच्छ अंबर । या उदित हो रवि अंधार । निगलता जैसे ॥ ६३ ॥ अथवा होते ही जागृत । होता जैसे स्वप्नका अंत । स्वबोध धारसे अश्वत्थ । कहीं रहता नहीं ॥ ६४ ॥ तब ऊर्ध्व या अधका मूल । नीचेका भी तब शाखा-जाल । न दीखता जैसे मृगजल । चांदनीमें वैसे ॥ ६५ ॥ इस प्रकार तू धनुधर । आत्म-ज्ञानकी ले तलवार । तोडकर यह तरुवर । ऊर्ध्वमूलका ॥ ६६ ॥ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥ फिर अपनेमें अपना रूप आप देखना- फिर "इदं"का संबंध नहीं होता । "अहंत्व"के बिन जो प्रसिद्ध होता । यह अपना ही रूप है देखता । आप ही आप ॥ ६७ ॥ ढूंढे वही जो पद है महान पीछे जहांसे मुडना न होता । विलीन होना उस रूपमें ही प्रवृत्ति निकली जहां अनादि ॥ ४ ॥ ५९३ पुरुषोत्तमयोग (75)

किंतु दर्पणका ले आधार । तथा एकका दूसरा कर । रूप देखते हैं जो गंवार । वैसा नहीं यह ॥ ६८ ॥ यह ऐसे देखना है अर्जुन । कूंआ खोदनेसे पूर्व झरना । रहता है आप भरा हो पूर्ण । अपनेमें जैसे ॥ ६९ ॥ अथवा सूखने पर अंभ । निज-बिंबमें ही प्रतिबिंब । अथवा मिल जाता है नभ । घटाभावमें ॥ २७० ॥ अग्निका इंधनांश समाप्त होत । अग्नि जैसेमूल रूपमें लौटता । वैसे ही अपनेको देखना होता । आप ही स्वयं ॥ ७१ ॥ जिह्वाको अपना ही रस चखना । दृष्टिको अपना ही रूप देखना । वैसे उसका निरीक्षण करना । अपनेको ही ॥ ७२ ॥ या प्रकाशसे प्रकाशका मिलना । गगनमें गगनका है चढ़ना । अथवा पानीसे पानीकी भरना । अपनी गोद ॥ ७३ ॥ अपनेको आप लक्षित । करता है जब अद्वैत । वह ऐसे होता है पार्थ । कहता हूं मैं ॥ ७४ ॥ न देखते ही जो देखना । कुछ न जानते ही जानना । महापद जो है अर्जुन । आदि पुरुषका ॥ ७५ ॥ वहां भी उपाधिका ले आधार । होती वर्णनमें श्रुति तैयार । नाम रूपका गडबड फिर । करती है व्यर्थकी ॥ ७६ ॥ संसार स्वर्गसे जो उकता कर । मुमुक्षुके ज्ञान योगका आधार । जहां जाने निकले पांडुकुमार । प्रतिज्ञा-पूर्वक ॥ ७७ ॥ करते हैं संसारके आगे दौड़ । वे वीत-राग पुरुष कर होड । पीछे डालते ब्रह्म-लोकको गाड । अतिक्रमण कर ॥ ७८ ॥ अहंकार आदि जो भाव । तज कर अपना सर्व । आज्ञा-पत्र लेते पांडव । मूल गृहका ॥ ७९ ॥ आत्म विषयमें जो अज्ञान । लाया बड़ा संसारका ज्ञान । न था जो उसने दिया स्थान । मैं तू पनको ॥ २८० ॥ ज्ञानेश्वरी ५९४

अहांसे इतना धनुर्धर । होता विश्व-क्रमका विस्तार । व्यर्थ अभिष्ठ जिस प्रकार । होता निर्दैवीका ॥ ८१ ॥ कैसे वह रूप देखना । अपनेमें आप अपना । हिमसे है हिम जमना । हिम-रूपमें ॥ ८२ ॥ और एक जो उसका । लक्षण है जाननेका । उससे पुनर्जन्मका । होता है अंत ॥ ८३ ॥ किंतु उससे मिलते जैसे । भरकर सर्वत्र ज्ञानसे । महा-प्रलयमें नीर जैसे । भरा रहता है ॥ ८४ ॥ निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥ वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको प्राप्त करते हैं— जिस पुरुषका मन । छोड़ गये मोह मान । वर्षांतमें जैसे घन । आकाशको ॥ ८५ ॥ जो है अकिंचन निष्ठुर । उससे ऊबता है घर । वैसे ही उसको विकार । तज जाते हैं ॥ ८६ ॥ उखडता फला हुवा केल । वैसे आत्म-लाभसे प्रबल । क्रिया कलाप होते उन्मूल । अपने आप ॥ ८७ ॥ वृक्ष है जब जलता । पक्षी-गण उड़ जाता । वैसे उसको तजता । विकल्प सारा ॥ ८८ ॥ जो मान मोहासह संग-दोष उखाड निष्काम अध्यात्म निष्ठ । निर्द्वन्द्व जो हो सुख दुःख मुक्त वे प्राज्ञ पाते वह नित्य धाम ॥ ५ ॥ ५९५ पुरुषोत्तमयोग

जैसे सकल दोष ऋण । अंकुरती पृथ्वी अर्जुन । उस भेद बुद्धिका भान । नहीं होता उसे ॥ ८९ ॥ जब सूर्यका उदय होता । रातका अस्तित्व न रहता। वैसे देहाहंकार भागता । अविद्या सह ॥ २९० ॥ जैसे जीवको आयुष्य हीन । छोडता शरीर उसी क्षण । वैसे तजता द्वैत अर्जुन । उस पुरुषको ॥ ९१ ॥ पारसको लोहेका अकाल होता । रविसे कभी अंधार न मिलता । द्वैत-बुद्धिका दर्शन नहीं होता । उसको कभी ॥ ९२ ॥ अजी ! सुख दुःखका आकार । द्वंद्व होते देहमें गोचर । उसके सन्मुख धनुर्धर । नहीं होते कभी ॥ ९३ ॥ स्वप्नका राज्य या मरण । हर्ष या शोकका कारण । न होता जागृतिमें जान । उसी भांति ॥ ९४ ॥ वैसे सुख दुःख रूप । द्वंद्व जो पुण्य औ' पाप । न घेरते उसे साप । गरुड़को जैसे ॥ ९५ ॥ तथा अनात्म-वर्ग नीर । छोड़ आत्म-रसका क्षीर । करता है जो स-विचार । राज हंस-सा ॥ ९६ ॥ वर्षा कर जैसे पृथ्वीपर । अपने ही रसको भास्कर । खींचता रश्मियां फैलाकर । अपने ही बिंबमें ॥ ९७ ॥ आत्म-भ्रांतिके लिये ही वैसे । बिखुरे वस्तु सभी ओरसे । एकत्र किये ज्ञान दृष्टिसे । अखंड जो ॥ ९८ ॥ तथा निर्णयमें आत्माका । विवेक डूबता उनका । प्रवाह डूबता गंगाका । सिंधुमें जैसे ॥ ९९ ॥ या होनेसे आप संपूर्ण । न रहा आशाका कारण । न करता इच्छा गगन । परे जानेकी ॥ ३०० ॥ जैसे हैं अग्निका डोंगर । न लेता बीज अंकुर । उसके मनमें विकार । न आते वैसे ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९६

निकलते ही मंदराचल । हुवा क्षीर-सागर निश्चल । उसमें कामोर्मियोंका उबाल । नहीं होता ॥ २ ॥ षोडश कलायुत चंद्र-पूर्ण । न दीखे किसी ओरसे अपूर्ण । वैसे अपेक्षाका न्यून उत्पन्न । न होता उसमें ॥ ३ ॥ निरूपका कैसे करूं वर्णन । आंधीमें नहीं टिकता रजकण । वैसे नहीं आते विषय अर्जुन । उसके सम्मुख ॥ ४ ॥ एवं जिन्होंने किये ऐसे । यज्ञ ज्ञानाख्य हुताशसे । यहां वे मिलते हैं वैसे । मानो स्वर्णमें स्वर्ण ॥ ५ ॥ मेरा वह परम पद— वहां कहा तो कहां । पूछेगा यदि यहां । न पहुंचता जहां । नाशका नाम ॥ ६ ॥ दृश्यत्वसे जो देखा जाता । या ज्ञेयत्वसे जाना जाता । अमुक ऐसे कहा जाता । ऐसा नहीं जो ॥ ७ ॥ न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥ किंतु जो दीपके प्रकाशसे । या चन्द्राग्निके प्रकाशनेसे । अधिक क्या कहूं मैं इससे । न प्रकाशता सूर्यसे भी ॥ ८ ॥ ऐसे प्रकाशसे जो दीखता । उससे वह नहीं दीखता । जिससे विश्व दर्शित होता । उससे वह लोप ॥ ९ ॥ खोता जब शुक्तिापन । भासता रजतपन । या लोपसे सर्पपन । दीखता डोरा ॥ ३१० ॥ श्रेष्ठ जो चंद्र-सूर्यादिक । बडे हैं प्रकाश दायक । उसके अंधारमें देख । प्रकाशते हैं ॥ ११ ॥ प्रकाशता नहीं सूर्य उसको अग्नि चंद्र भी । न लौटता वहां जाके मेरा उत्तम धाम जो ॥ ६ ॥ ५९७ पुरुषोत्तमयोग

तेजकी वह महा-रास । सर्व-भूतात्मक निवास । चंद्र-सूर्यका भी मानस । उजलाता है ॥ १२॥ तभी चंद्र सूर्य हैं स्फुलिंग । उस प्रकाशके हैं अंग । सभी तेज हैं उसके भाग । जो है तेजस्वी ॥ १३ ॥ तथा होते ही जिसका उदय । लोपता विश्व सह चंद्र-सूर्य । जैसे होते ही सूर्यका उदय । लोपते चंद्र तारा ॥ १४ ॥ अथवा आते ही जागृति काल । मिटता है स्वप्न-राज्य विशाल । तथा नहीं रहता मृग-जल । सूर्यास्तमें जैसे ॥ १५ ॥ उस तत्वके पास । नहीं कोई आभास । परम धाम खास । मेरा वह ॥ १६ ॥ जो जो कोई वहां गये । लौट कर नहीं आये । सागरमें मिल गये । स्रोत जैसे ॥ १७ ॥ अथवा नमकका कुंजर । डूब गया लवण सागर । कभी न आयेगा लौटकर । उसी भांति ॥ १८ ॥ या पहुंची जो अंतराल । नहीं लौटती अग्नि-ज्वाल । तप्त लोहेपे पड़ा जल । न लौटता जैसे ॥ १९ ॥ वैसे मुझसे हुवा मिलन । ज्ञानाग्निमें शुध्द जो अर्जुन । नहीं होगा पुनरागमन । उसका कभी ॥ ३२० ॥ ब्रह्म लीन हो कर जो नहीं लौटते वे मूलतः अभिन्न है या भिन्न ?-- कहता प्रज्ञा-भूमि-पति पार्थ । जी जी प्रसाद किंतु एक बात । विनय करता हूं देना चित्त । कृपा पूर्वक ॥ २१ ॥ प्रभुसे जो स्वयं एक होते । तथा लौटकर नहीं आते । वे प्रभुसे हैं अभिन्न होते । अथवा भिन्न ॥ २२ ॥ यदि भिन्न ही है अनादि सिध्द । तो नहीं आते यह असंबध्द । सुमनमें जाकर ही षट्पद । सुमन होगा कैसे ? ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९८

अजी ! लक्ष्यसे जो भिन्न ऐसे । बाण लक्ष्य स्पर्श कर जैसे । लौटकर आते ही हैं जैसे । आयेंगे ही ॥ २४ ॥ या वे तू ही है स्वभावसे । किसको मिलना किससे । अपनेको आप शस्त्रोंसे । कैसे चितेरें ॥ २५ ॥ यदि हैं तुझसे अभिन्न जीव । तेरा ही संयोग वियोग देव । नहीं कहा जाता है अवयव । शरीरसे जैसे ॥ २६ ॥ तथा जो सदा भिन्न हैं तुझसे । नहीं मिल सकते कभी वैसे । फिर लौटते हैं या नहीं वहांसे । यह बात है व्यर्थ ॥ २७ ॥ तब तेरा रूप देख कर । नहीं आते हैं जो लौट कर । वह कौन कह कृपा कर । विश्वतोमुख देव ॥ २८ ॥ वह संदेह जो अर्जुनका । सुन शिरोमणि सर्वज्ञका । तुष्ट हुवा अपने शिष्यका । बोध देख कर ॥ २९ ॥ कहते हैं तब महामते । मुझे पाकर जो न लौटते । उनमें दोनों भांतिके होते । भिन्न औ' अभिन्न ॥ ३० ॥ जीव मुझसे अभिन्न भिन्न हैं- देखा तो यदि गहराईसे । मैं हूं वे समरसैक्यसे । तथा देखे तो ऐसे या वैसे । मुझसे भिन्न ॥ ३१ ॥ जैसे पानीसे भिन्न सकल । दीखते हैं उठते कलोल । नहीं तो तरंग केवल । पानी ही पानी ॥ ३२ ॥ अथवा स्वर्णसे हैं भिन्न । दीखते हैं सब भूषण । किंतु वह स्वर्ण ही स्वर्ण । संपूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ वैसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे । अभिन्न सदा हैं मुझसे । भिन्नता दीखती जिससे । वह है अज्ञान ॥ ३४ ॥ देखें यदि आत्म-दृष्टिसे । मुझे छोड़ दूसरा कैसे । भिन्नाभिन्न व्यवहारसे । जानेगा जो ॥ ३५ ॥ ५९९ पुरुषोत्तमयोग

सारा ही आकाश निगलकर । व्याप्त होता ब्रह्मांड भास्कर । तब कहां प्रति-बिंब और । कहां रश्मि-जाल ॥ ३६ ॥ अथवा कल्पांतमें भरा नीर । उसमें कैसे ओघ धनुर्धर । कैसे होंगे मुझमें अविकार । अंशादि तब ॥ ३७ ॥ किंतु जैसे ओघके कारण । ऋजु नीर दीखे वक्र बन । रविको भिन्न पन अर्जुन । आता नीरमें ॥ ३८ ॥ गगन वर्तुल या चौकोर । कैसे मिलेगा पांडुकुमार । घट मठसे घिर आकार । दीखेगा वैसे ॥ ३९ ॥ अजी ! निद्राका ले आधार । स्वप्नमें राजा बनकर । अकेलेसे ही जग भर । होता राज्य ॥ ४० ॥ या मिलनेसे कस हीन । शुध्द स्वर्ण जैसे अर्जुन । कसमें उतरता निम्न । वैसे मैं स्वमायामें ॥ ४१ ॥ उससे फैलता है अज्ञान । कोऽहं भावका उठता प्रश्न । विचारके कहता मन । मैं देह हूं ऐसे ॥ ४२ ॥ ममैकांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥ शरीर है जितना आत्मज्ञान भी है अपना— ऐसे शरीर है जितना । आत्म-ज्ञान भी आपना । जिससे है अनुभवना । मेरा अल्पांश ॥ ४३ ॥ वायु संयोगसे है सागर । उमडता ले तरंगाकार । वह समुद्रांश धनुर्धर । दीखता अल्प ॥ ४४ ॥ वैसे जडको चेतना देता । देहाहंता प्रकट करता । मैं जीव हूं ऐसा भास होता । जीव लोकका ॥ ४५ ॥ जगमें अंश मेरा ही हुआ जीव सनातन । खींचता है प्रकृतीसे मन औ' पांच इंद्रियां ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६००

किंतु जो जीवका बोध देता । हलनल प्रकट करता । तभी वह शब्द अर्थ देता । लोकमें जीव ॥ ४६ ॥ जन्मना तथा मरना । इसको सच मानना । मेरा संसार कहना । यह जीवलोक ॥ ४७ ॥ ऐसे जीवलोकमें अर्जुन । करता मेरा अवलोकन । जैसे चन्द्रमा नीरमें जान । जो उदकातीत ॥ ४८ ॥ जैसे कभी कोई स्फटिक । केशर पर पड देख । प्रकट होता लाल देख । किंतु न होता लाल ॥ ४९ ॥ वैसे अनादिपन नहीं टूटता । अकर्तापन मेरा नहीं भंगता । किंतु कर्ता भोक्ता ऐसा भासता । यह भ्रम है जान ॥ ३५० ॥ या आत्मा है जो निर्विकार । प्रकृतिसे हो एकाकार । प्रकृतिके धर्मानुसार । देखता अपनेमें ॥ ५१ ॥ मन सह सभी इंद्रिय । करते प्रकृतिका कार्य । उन्हें अपना धनंजय । होना प्रवृत्त ॥ ५२ ॥ स्वप्नमें जैसे कोई परिव्राजक । आप अपना कुटुंब होके देख । भागदौड़ करता मोह मूलक । जैसे वैसे भी ॥ ५३ ॥ वैसे है अपनी ही विस्मृति । आत्मा आप ही होता प्रकृति । उसीको मान सुभद्रापति । भजता उसीको ॥ ५४ ॥ मन रथ पर चढ़कर । श्रवण द्वारसे हो बाहर । शब्द-काननमें भयंकर । घुसता है वह ॥ ५५ ॥ वैसे ही प्रकृतिकी रास । त्वचाके हाथमें दे खास । स्पर्श-द्वारसे है प्रवास । करता वनमें ॥ ५६ ॥ अजी ! कभी किसी अवसर । नेत्र-द्वारसे पड़ बाहर । चढ़ता है रूपका डोंगर । स्वैर-भावसे ॥ ५७ ॥ वैसे ही रसनाका पथ । चलकरके वह पार्थ । रस भरने उदरार्थ । लगता वह ॥ ५८ ॥ ६०१ पुरुषोत्तमयोग (76)

अथवा पथ कर घ्राण । देहेश करता गमन । फिर जो गंधके दारुण । अरण्य लांघता ॥ ५९ ॥ ऐसे वह इंद्रिय नायक । करके मनको सहायक । शोधते जाता है शब्दादिक । विषय सारे ॥ ३६० ॥ शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥ जाते समय जीव इंद्रियोंके साथ जाता है— किंतु ऐसे कर्ता भोक्ता । जिवन-रूप दीखता । जैसे तनमें करता । यह प्रवेश ॥ ६१ ॥ अजी! कोई विलासी तथा धनिक । जाना जाता है उसी समय देख । बसता है जब वह हो स्थाइक । राजधानीमें ॥ ६२ ॥ वैसे बढ़ता कर्तृत्व अहंकार । विषयेंद्रिय-तांडव धनुर्धर । जाना जाता है तभी पाता शरीर । जब यह जीव ॥ ६३ ॥ अथवा छोड़ता है शरीर । तब इंद्रियां निकाल कर । अपने ही साथ धनुर्धर । ले जाता है ॥ ६४ ॥ जैसे अपमानित अथिति । ले जाता है सुकृत-संपत्ति । या ले जाता है गुड्डेकी गति । सूत्र-तंतू ॥ ६५ ॥ अथवा प्रकाश अस्तमान । ले जाता है सबका दर्शन । अथवा है सुगंध पवन । ले जाता जैसे ॥ ६६ ॥ वैसे मन सह इंद्रियां । देह-राज है धनंजय । शरीर तजते समय । ले जाता है ॥ ६७ ॥ जैसे पुष्पादिसे वायु ले जाता गंध खींचके । वैसे लेकर ये ईश छोड़ता धरता तन ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०२

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥ यहां अथवा स्वर्गमें फिर । लेता जिस देहका आधार । करता है वैसा ही विस्तार । मन-इंद्रियोंका ॥ ६८ ॥ जैसे बुझते ही ज्योति । ले जाती अपनी दीप्ति । फिर जब है जलती । वैसा ही प्रकाश ॥ ६९ ॥ किंतु ऐसे है जो परिवर्तन । करते अविवेकीके नयन । जानते इतना तो अर्जुन । सामान्य बात ॥ ३७० ॥ आत्मा है जो शरीरमें आया । उसीने विषय भोग किया । या वही शरीर छोड़ गया । इतना जानते ॥ ७१ ॥ वैसे आना तथा जाना । करना है या भोगना । देहका कार्य है माना । उसने आत्माका ॥ ७२ ॥ उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥ यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥ योगी आत्म-धर्म आत्मामें तथा देह-धर्म देहमें देखता है— किंतु छोटासा देह उत्पन्न । तथा देख उसमें चेतन । या उसमें देख आंदोलन । कहते वह आया ॥ ७३ ॥ श्रोत्र जिह्वा त्वचा चक्षु घ्राण औ' साथ हो मन । आधार इनका लेके सारे विषय भोगता ॥ ९ ॥ तजता धरता देह भोगता गुण-युक्त जो । न देखते इसे मूढ देखते ज्ञान चक्षु ही ॥ १० ॥ यत्नसे देखते योगी इसको हियमें बसे । चित्त-हीन अशुद्धात्मा यत्नसे भी न देखते ॥ ११ ॥ ६०३ पुरुषोत्तमयोग

वैसे ही इंद्रियां उसके साथ । करती अपना व्यापार पार्थ । उसको कहते लोग यथार्थ । मोगना ऐसे ॥ ७४ ॥ भोग-क्षीणसे पीछे स्वाभाविक । शरीर गिरता है यह देख । वह गयारे गया ऐसे चीख-। कहते हैं बंसे ॥ ७५ ॥ जैसे देखके वृक्ष हिलता । कहते हैं पवन बहता । किंतु जहां वृक्ष नहीं होता । नहीं क्या पवन ॥ ७६ ॥ या रखकर सम्मुख दर्पण । उसमें कर अपना दर्शन । भासता आप हुवा है उत्पन्न । उससे पूर्व नहीं क्या ॥ ७७ ॥ या परे हटाके दर्पण । अपना लोप हुवा मान । आप नहीं ऐसे अर्जुन । ऐसा मानना क्या ॥ ७८ ॥ शब्द है जैसे आकाशका । किंतु माना जाता मेघका । या चंद्रके वेग अभ्रका । करता आरोप ॥ ७९ ॥ वैसे शरीरका आवगमन । निर्विकार आत्मापे आरोपण । करते हैं वे भ्रमसे अर्जुन । निश्चय-पूर्वक ॥ ३८० ॥ आत्मामें यहां आत्म-धर्म । तथा देहमें देह-धर्म । जानते जो इसका मर्म । वे हैं दूसरे ही ॥ ८१ ॥ ज्ञानसे हैं जिसके नयन । देखते हैं आत्म भेदके तन । मेघ-भेदमैं सूर्य-कीरण । ग्रीष्ममें जैसे ॥ ८२ ॥ वैसे ही कर विवेक विस्तार । ज्ञानियोंकी बुद्धि होती है स्थिर । देखते आत्माको वैसे ही धीर । इस भांतिसे ॥ ८३ ॥ जैसे तारागणसे भरा गगन । जलमें पडा है दीखता अर्जुन । किंतु नहीं पडा टूटके गगन । यह जानते वैसे ॥ ८४ ॥ गगनके स्थानपे है गगन । यह केवळ है आभास जान । वैसे हैं आत्म-शरीर भिन्न । मानते हैं वे ॥ ८५ ॥ कलकल बहते पानीमें चंचल । दिखती है चांदनीकी जो हलचल । चांदनी होती चंद्रके साथ निश्चल । जानके देखते हैं ॥ ८६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०४

या डबरा ही भरता सूखता । सूर्य जैसेका वैसा है रहता । वैसे ही शरीर आता औ' जाता । देखते हैं ऐसे ॥ ८७ ॥ घट मठ बनाये । वैसे ही तोड़ दिये । आकाश रह गये । सदा अखंड ॥ ८८ ॥ वैसे अखंड आत्म-सत्ता । तन है जो आता जाता । अज्ञान-दृष्टिसे कल्पित । जानते हैं ज्ञानी ॥ ८९ ॥ चैतन्य न बढ़ता न घटता । वह कर्म न करता कराता । ऐसे आत्म-ज्ञानसे है जानता । शुद्ध-रूपसे ॥ ३९० ॥ तथा स्वाधीन होगा संपूर्ण ज्ञान । प्रज्ञा परमाणुका अंतदर्शन । सकल शास्त्रोंका रहस्य अर्जुन । किसी समय ॥ ९१ ॥ किंतु है ऐसी इसकी उत्पत्ति । मनमें न रही यदि विरक्ति । होती कभी सर्वात्मकी प्राप्ति । विद्वत्तासे ॥ ९२ ॥ मुखमें भरा है सदैव ज्ञान । अंतःकरणमें विषयोंका स्थान । इससे न होगी प्राप्ति अर्जुन । मेरी कभी ॥ ९३ ॥ करनेसे ग्रंथ पठन । टूटेगा भव-बंधन । करनेसे ग्रंथ स्पर्शन । होगा क्या पाठ ? ॥ ९४ ॥ आंखमें पट्टी बांधकर । नाकसे मोति सूंघकर । समझेगा क्या धनुर्धर । उसका मूल्य ॥ ९५ ॥ वैसे चित्तमें अहंताका स्थान । जिह्वा पर शास्त्र संपूर्ण । इससे नहीं होगा मेरा ज्ञान । करोड़ों जन्मोंमें ॥ ९६ ॥ मैं अकेला सबमें भरा हुवा हूं— एक हूं मैं सबमें व्याप्त । भूतमात्रमें हूं समस्त । कहता हूं मैं यही बात । स्पष्ट रूपसे ॥ ९७ ॥ ६०५ पुरुषोत्तमयोग

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥ वैसे सूर्य सह जो संपूर्ण । विश्वकी रचना है अर्जुन । प्रकाश वह मेरा ही जान । आद्यंत है जो ॥ ९८ ॥ जल सोखकर लेता सविता । जलांश जो बादमें है रहता । चंद्रमें रहती है जो पांडुसुता । जोस्ना वह मेरी ॥ ९९ ॥ तथा दहन पचन सिद्धि । करता रहता निरवधि । हुताग्नै वह तेजोवृद्धि । जान मेरी ही ॥ ४०० ॥ गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥ प्रवेश किया मैंने भूतलमें । तभी यह महासिंधु जलमें । नहीं पिघला है युग-युगमें । मृत्तिका पिंड ॥ १ ॥ तथा भूत ही स-चराचर । धरा है धरतीने अपार । पृथ्वी-तलमें प्रवेश कर । उसको धरा मैंने ॥ २ ॥ गगनमें मैं पांडुसुत । चंद्रके रूपसे अमृत । भरा हुवा मैं स्वचलित । बना सरोवर ॥ ३ ॥ वहांसे निकलते रश्मिकर । उनको धरकर मैं अपार । सभी वनस्पतियोंका आगर । भरता रहता मैं ॥ ४ ॥ इससे सस्यादिक सकल । करते धान्यादिका सुकाल । तथा अन्नादिसे प्रतिपाल । करता सबका ॥ ५ ॥ सकल जन जीवनका जीवन 'वैश्वानर' मैं हूं— ऐसे उत्पन्न किया हुवा अन्न । जिस भांति करके मैं दीपन । जिससे जीवका हो समाधान । करता हूं ऐसे ॥ ६ ॥ सूर्यमें जलता तेज विश्वको है प्रकाशता । चंद्रमें अग्निमें वैसे मेरा ही तेज जान तू ॥ १२ ॥ धृतिके बलसे भूत धरता मैं धरा बना । पोसता वनस्पतीको रससे भर सोम मैं ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०६

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार । जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥ धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन । पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥ शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध । किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥ ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन । औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥ कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा । विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥ संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? - किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन । तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥ अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे । किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥ यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय ! अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥ मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान । जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥ जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक । भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥ वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा । पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥ ५०७ पुरुषोत्तमयोग

या एक सूर्य जैसे अर्जुन । लोक चेष्टासे होकर भिन्न । उपयोग होता अनुदिन । देखता है तू ॥ १७ ॥ नाना बीज धर्मानुरूप । वृक्ष-रस बनता आप । वैसे बदलता स्वरूप । जीवमें मेरा ॥ १८ ॥ जैसे नीलमणिका हार । सर्पत्व लेता भयंकर । सुखद होता निरंतर । जब दूसरेको ॥ १९ ॥ अथवा जैसे स्वातीका उदक । सीपमें मोति औ, व्यालमें विष । वैसे सु ज्ञानियोंको मैं हूं सुख । दुख अज्ञानियोंको ॥ ४२० ॥ सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ सबके हृदयमें जो आत्म-स्फुरण है वह मैं हूं— वैसे ही होती हृदय मध्यमें । अमुक हूं ऐसी उर्मी सभमें । वह स्फुरण जो दिन रातमें । होता मैं हूँ ॥ २१ ॥ किंतु संत संगमें होता । या योग-ज्ञानमें बैठता । गुरु-चरण उपासता । वैराग्यसे ॥ २२ ॥ ऐसे ही सत्कर्ममें नित । अज्ञान नष्ट होता पार्थ । उसका होता अहं स्थित । आत्म-रूपमें ॥ २३ ॥ वे अपने आपको देख । पाते मुझ आत्मामें सुख । मेरे बिन भिन्न न देख । कभी कहीं ॥ २४ ॥ सर्वान्तरोंमें करता निवास देता स्मृति ज्ञान विवेक मैं ही । मैं ही अकेला चिर वेद-वेद्य वेदज्ञ मैं वेद रहस्य कर्ता ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०८