ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! लक्ष्यसे जो भिन्न ऐसे । बाण लक्ष्य स्पर्श कर जैसे । लौटकर आते ही हैं जैसे । आयेंगे ही ॥ २४ ॥ या वे तू ही है स्वभावसे । किसको मिलना किससे । अपनेको आप शस्त्रोंसे । कैसे चितेरें ॥ २५ ॥ यदि हैं तुझसे अभिन्न जीव । तेरा ही संयोग वियोग देव । नहीं कहा जाता है अवयव । शरीरसे जैसे ॥ २६ ॥ तथा जो सदा भिन्न हैं तुझसे । नहीं मिल सकते कभी वैसे । फिर लौटते हैं या नहीं वहांसे । यह बात है व्यर्थ ॥ २७ ॥ तब तेरा रूप देख कर । नहीं आते हैं जो लौट कर । वह कौन कह कृपा कर । विश्वतोमुख देव ॥ २८ ॥ वह संदेह जो अर्जुनका । सुन शिरोमणि सर्वज्ञका । तुष्ट हुवा अपने शिष्यका । बोध देख कर ॥ २९ ॥ कहते हैं तब महामते । मुझे पाकर जो न लौटते । उनमें दोनों भांतिके होते । भिन्न औ' अभिन्न ॥ ३० ॥ जीव मुझसे अभिन्न भिन्न हैं- देखा तो यदि गहराईसे । मैं हूं वे समरसैक्यसे । तथा देखे तो ऐसे या वैसे । मुझसे भिन्न ॥ ३१ ॥ जैसे पानीसे भिन्न सकल । दीखते हैं उठते कलोल । नहीं तो तरंग केवल । पानी ही पानी ॥ ३२ ॥ अथवा स्वर्णसे हैं भिन्न । दीखते हैं सब भूषण । किंतु वह स्वर्ण ही स्वर्ण । संपूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ वैसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे । अभिन्न सदा हैं मुझसे । भिन्नता दीखती जिससे । वह है अज्ञान ॥ ३४ ॥ देखें यदि आत्म-दृष्टिसे । मुझे छोड़ दूसरा कैसे । भिन्नाभिन्न व्यवहारसे । जानेगा जो ॥ ३५ ॥ ५९९ पुरुषोत्तमयोग