भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तेजकी वह महा-रास । सर्व-भूतात्मक निवास । चंद्र-सूर्यका भी मानस । उजलाता है ॥ १२॥ तभी चंद्र सूर्य हैं स्फुलिंग । उस प्रकाशके हैं अंग । सभी तेज हैं उसके भाग । जो है तेजस्वी ॥ १३ ॥ तथा होते ही जिसका उदय । लोपता विश्व सह चंद्र-सूर्य । जैसे होते ही सूर्यका उदय । लोपते चंद्र तारा ॥ १४ ॥ अथवा आते ही जागृति काल । मिटता है स्वप्न-राज्य विशाल । तथा नहीं रहता मृग-जल । सूर्यास्तमें जैसे ॥ १५ ॥ उस तत्वके पास । नहीं कोई आभास । परम धाम खास । मेरा वह ॥ १६ ॥ जो जो कोई वहां गये । लौट कर नहीं आये । सागरमें मिल गये । स्रोत जैसे ॥ १७ ॥ अथवा नमकका कुंजर । डूब गया लवण सागर । कभी न आयेगा लौटकर । उसी भांति ॥ १८ ॥ या पहुंची जो अंतराल । नहीं लौटती अग्नि-ज्वाल । तप्त लोहेपे पड़ा जल । न लौटता जैसे ॥ १९ ॥ वैसे मुझसे हुवा मिलन । ज्ञानाग्निमें शुध्द जो अर्जुन । नहीं होगा पुनरागमन । उसका कभी ॥ ३२० ॥ ब्रह्म लीन हो कर जो नहीं लौटते वे मूलतः अभिन्न है या भिन्न ?-- कहता प्रज्ञा-भूमि-पति पार्थ । जी जी प्रसाद किंतु एक बात । विनय करता हूं देना चित्त । कृपा पूर्वक ॥ २१ ॥ प्रभुसे जो स्वयं एक होते । तथा लौटकर नहीं आते । वे प्रभुसे हैं अभिन्न होते । अथवा भिन्न ॥ २२ ॥ यदि भिन्न ही है अनादि सिध्द । तो नहीं आते यह असंबध्द । सुमनमें जाकर ही षट्पद । सुमन होगा कैसे ? ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९८