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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

तेजकी वह महा-रास । सर्व-भूतात्मक निवास । चंद्र-सूर्यका भी मानस । उजलाता है ॥ १२॥ तभी चंद्र सूर्य हैं स्फुलिंग । उस प्रकाशके हैं अंग । सभी तेज हैं उसके भाग । जो है तेजस्वी ॥ १३ ॥ तथा होते ही जिसका उदय । लोपता विश्व सह चंद्र-सूर्य । जैसे होते ही सूर्यका उदय । लोपते चंद्र तारा ॥ १४ ॥ अथवा आते ही जागृति काल । मिटता है स्वप्न-राज्य विशाल । तथा नहीं रहता मृग-जल । सूर्यास्तमें जैसे ॥ १५ ॥ उस तत्वके पास । नहीं कोई आभास । परम धाम खास । मेरा वह ॥ १६ ॥ जो जो कोई वहां गये । लौट कर नहीं आये । सागरमें मिल गये । स्रोत जैसे ॥ १७ ॥ अथवा नमकका कुंजर । डूब गया लवण सागर । कभी न आयेगा लौटकर । उसी भांति ॥ १८ ॥ या पहुंची जो अंतराल । नहीं लौटती अग्नि-ज्वाल । तप्त लोहेपे पड़ा जल । न लौटता जैसे ॥ १९ ॥ वैसे मुझसे हुवा मिलन । ज्ञानाग्निमें शुध्द जो अर्जुन । नहीं होगा पुनरागमन । उसका कभी ॥ ३२० ॥ ब्रह्म लीन हो कर जो नहीं लौटते वे मूलतः अभिन्न है या भिन्न ?-- कहता प्रज्ञा-भूमि-पति पार्थ । जी जी प्रसाद किंतु एक बात । विनय करता हूं देना चित्त । कृपा पूर्वक ॥ २१ ॥ प्रभुसे जो स्वयं एक होते । तथा लौटकर नहीं आते । वे प्रभुसे हैं अभिन्न होते । अथवा भिन्न ॥ २२ ॥ यदि भिन्न ही है अनादि सिध्द । तो नहीं आते यह असंबध्द । सुमनमें जाकर ही षट्पद । सुमन होगा कैसे ? ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ५९८

अजी ! लक्ष्यसे जो भिन्न ऐसे । बाण लक्ष्य स्पर्श कर जैसे । लौटकर आते ही हैं जैसे । आयेंगे ही ॥ २४ ॥ या वे तू ही है स्वभावसे । किसको मिलना किससे । अपनेको आप शस्त्रोंसे । कैसे चितेरें ॥ २५ ॥ यदि हैं तुझसे अभिन्न जीव । तेरा ही संयोग वियोग देव । नहीं कहा जाता है अवयव । शरीरसे जैसे ॥ २६ ॥ तथा जो सदा भिन्न हैं तुझसे । नहीं मिल सकते कभी वैसे । फिर लौटते हैं या नहीं वहांसे । यह बात है व्यर्थ ॥ २७ ॥ तब तेरा रूप देख कर । नहीं आते हैं जो लौट कर । वह कौन कह कृपा कर । विश्वतोमुख देव ॥ २८ ॥ वह संदेह जो अर्जुनका । सुन शिरोमणि सर्वज्ञका । तुष्ट हुवा अपने शिष्यका । बोध देख कर ॥ २९ ॥ कहते हैं तब महामते । मुझे पाकर जो न लौटते । उनमें दोनों भांतिके होते । भिन्न औ' अभिन्न ॥ ३० ॥ जीव मुझसे अभिन्न भिन्न हैं- देखा तो यदि गहराईसे । मैं हूं वे समरसैक्यसे । तथा देखे तो ऐसे या वैसे । मुझसे भिन्न ॥ ३१ ॥ जैसे पानीसे भिन्न सकल । दीखते हैं उठते कलोल । नहीं तो तरंग केवल । पानी ही पानी ॥ ३२ ॥ अथवा स्वर्णसे हैं भिन्न । दीखते हैं सब भूषण । किंतु वह स्वर्ण ही स्वर्ण । संपूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ वैसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे । अभिन्न सदा हैं मुझसे । भिन्नता दीखती जिससे । वह है अज्ञान ॥ ३४ ॥ देखें यदि आत्म-दृष्टिसे । मुझे छोड़ दूसरा कैसे । भिन्नाभिन्न व्यवहारसे । जानेगा जो ॥ ३५ ॥ ५९९ पुरुषोत्तमयोग

सारा ही आकाश निगलकर । व्याप्त होता ब्रह्मांड भास्कर । तब कहां प्रति-बिंब और । कहां रश्मि-जाल ॥ ३६ ॥ अथवा कल्पांतमें भरा नीर । उसमें कैसे ओघ धनुर्धर । कैसे होंगे मुझमें अविकार । अंशादि तब ॥ ३७ ॥ किंतु जैसे ओघके कारण । ऋजु नीर दीखे वक्र बन । रविको भिन्न पन अर्जुन । आता नीरमें ॥ ३८ ॥ गगन वर्तुल या चौकोर । कैसे मिलेगा पांडुकुमार । घट मठसे घिर आकार । दीखेगा वैसे ॥ ३९ ॥ अजी ! निद्राका ले आधार । स्वप्नमें राजा बनकर । अकेलेसे ही जग भर । होता राज्य ॥ ४० ॥ या मिलनेसे कस हीन । शुध्द स्वर्ण जैसे अर्जुन । कसमें उतरता निम्न । वैसे मैं स्वमायामें ॥ ४१ ॥ उससे फैलता है अज्ञान । कोऽहं भावका उठता प्रश्न । विचारके कहता मन । मैं देह हूं ऐसे ॥ ४२ ॥ ममैकांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥ शरीर है जितना आत्मज्ञान भी है अपना— ऐसे शरीर है जितना । आत्म-ज्ञान भी आपना । जिससे है अनुभवना । मेरा अल्पांश ॥ ४३ ॥ वायु संयोगसे है सागर । उमडता ले तरंगाकार । वह समुद्रांश धनुर्धर । दीखता अल्प ॥ ४४ ॥ वैसे जडको चेतना देता । देहाहंता प्रकट करता । मैं जीव हूं ऐसा भास होता । जीव लोकका ॥ ४५ ॥ जगमें अंश मेरा ही हुआ जीव सनातन । खींचता है प्रकृतीसे मन औ' पांच इंद्रियां ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६००

किंतु जो जीवका बोध देता । हलनल प्रकट करता । तभी वह शब्द अर्थ देता । लोकमें जीव ॥ ४६ ॥ जन्मना तथा मरना । इसको सच मानना । मेरा संसार कहना । यह जीवलोक ॥ ४७ ॥ ऐसे जीवलोकमें अर्जुन । करता मेरा अवलोकन । जैसे चन्द्रमा नीरमें जान । जो उदकातीत ॥ ४८ ॥ जैसे कभी कोई स्फटिक । केशर पर पड देख । प्रकट होता लाल देख । किंतु न होता लाल ॥ ४९ ॥ वैसे अनादिपन नहीं टूटता । अकर्तापन मेरा नहीं भंगता । किंतु कर्ता भोक्ता ऐसा भासता । यह भ्रम है जान ॥ ३५० ॥ या आत्मा है जो निर्विकार । प्रकृतिसे हो एकाकार । प्रकृतिके धर्मानुसार । देखता अपनेमें ॥ ५१ ॥ मन सह सभी इंद्रिय । करते प्रकृतिका कार्य । उन्हें अपना धनंजय । होना प्रवृत्त ॥ ५२ ॥ स्वप्नमें जैसे कोई परिव्राजक । आप अपना कुटुंब होके देख । भागदौड़ करता मोह मूलक । जैसे वैसे भी ॥ ५३ ॥ वैसे है अपनी ही विस्मृति । आत्मा आप ही होता प्रकृति । उसीको मान सुभद्रापति । भजता उसीको ॥ ५४ ॥ मन रथ पर चढ़कर । श्रवण द्वारसे हो बाहर । शब्द-काननमें भयंकर । घुसता है वह ॥ ५५ ॥ वैसे ही प्रकृतिकी रास । त्वचाके हाथमें दे खास । स्पर्श-द्वारसे है प्रवास । करता वनमें ॥ ५६ ॥ अजी ! कभी किसी अवसर । नेत्र-द्वारसे पड़ बाहर । चढ़ता है रूपका डोंगर । स्वैर-भावसे ॥ ५७ ॥ वैसे ही रसनाका पथ । चलकरके वह पार्थ । रस भरने उदरार्थ । लगता वह ॥ ५८ ॥ ६०१ पुरुषोत्तमयोग (76)

अथवा पथ कर घ्राण । देहेश करता गमन । फिर जो गंधके दारुण । अरण्य लांघता ॥ ५९ ॥ ऐसे वह इंद्रिय नायक । करके मनको सहायक । शोधते जाता है शब्दादिक । विषय सारे ॥ ३६० ॥ शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥ जाते समय जीव इंद्रियोंके साथ जाता है— किंतु ऐसे कर्ता भोक्ता । जिवन-रूप दीखता । जैसे तनमें करता । यह प्रवेश ॥ ६१ ॥ अजी! कोई विलासी तथा धनिक । जाना जाता है उसी समय देख । बसता है जब वह हो स्थाइक । राजधानीमें ॥ ६२ ॥ वैसे बढ़ता कर्तृत्व अहंकार । विषयेंद्रिय-तांडव धनुर्धर । जाना जाता है तभी पाता शरीर । जब यह जीव ॥ ६३ ॥ अथवा छोड़ता है शरीर । तब इंद्रियां निकाल कर । अपने ही साथ धनुर्धर । ले जाता है ॥ ६४ ॥ जैसे अपमानित अथिति । ले जाता है सुकृत-संपत्ति । या ले जाता है गुड्डेकी गति । सूत्र-तंतू ॥ ६५ ॥ अथवा प्रकाश अस्तमान । ले जाता है सबका दर्शन । अथवा है सुगंध पवन । ले जाता जैसे ॥ ६६ ॥ वैसे मन सह इंद्रियां । देह-राज है धनंजय । शरीर तजते समय । ले जाता है ॥ ६७ ॥ जैसे पुष्पादिसे वायु ले जाता गंध खींचके । वैसे लेकर ये ईश छोड़ता धरता तन ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०२

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥ यहां अथवा स्वर्गमें फिर । लेता जिस देहका आधार । करता है वैसा ही विस्तार । मन-इंद्रियोंका ॥ ६८ ॥ जैसे बुझते ही ज्योति । ले जाती अपनी दीप्ति । फिर जब है जलती । वैसा ही प्रकाश ॥ ६९ ॥ किंतु ऐसे है जो परिवर्तन । करते अविवेकीके नयन । जानते इतना तो अर्जुन । सामान्य बात ॥ ३७० ॥ आत्मा है जो शरीरमें आया । उसीने विषय भोग किया । या वही शरीर छोड़ गया । इतना जानते ॥ ७१ ॥ वैसे आना तथा जाना । करना है या भोगना । देहका कार्य है माना । उसने आत्माका ॥ ७२ ॥ उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥ यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥ योगी आत्म-धर्म आत्मामें तथा देह-धर्म देहमें देखता है— किंतु छोटासा देह उत्पन्न । तथा देख उसमें चेतन । या उसमें देख आंदोलन । कहते वह आया ॥ ७३ ॥ श्रोत्र जिह्वा त्वचा चक्षु घ्राण औ' साथ हो मन । आधार इनका लेके सारे विषय भोगता ॥ ९ ॥ तजता धरता देह भोगता गुण-युक्त जो । न देखते इसे मूढ देखते ज्ञान चक्षु ही ॥ १० ॥ यत्नसे देखते योगी इसको हियमें बसे । चित्त-हीन अशुद्धात्मा यत्नसे भी न देखते ॥ ११ ॥ ६०३ पुरुषोत्तमयोग

वैसे ही इंद्रियां उसके साथ । करती अपना व्यापार पार्थ । उसको कहते लोग यथार्थ । मोगना ऐसे ॥ ७४ ॥ भोग-क्षीणसे पीछे स्वाभाविक । शरीर गिरता है यह देख । वह गयारे गया ऐसे चीख-। कहते हैं बंसे ॥ ७५ ॥ जैसे देखके वृक्ष हिलता । कहते हैं पवन बहता । किंतु जहां वृक्ष नहीं होता । नहीं क्या पवन ॥ ७६ ॥ या रखकर सम्मुख दर्पण । उसमें कर अपना दर्शन । भासता आप हुवा है उत्पन्न । उससे पूर्व नहीं क्या ॥ ७७ ॥ या परे हटाके दर्पण । अपना लोप हुवा मान । आप नहीं ऐसे अर्जुन । ऐसा मानना क्या ॥ ७८ ॥ शब्द है जैसे आकाशका । किंतु माना जाता मेघका । या चंद्रके वेग अभ्रका । करता आरोप ॥ ७९ ॥ वैसे शरीरका आवगमन । निर्विकार आत्मापे आरोपण । करते हैं वे भ्रमसे अर्जुन । निश्चय-पूर्वक ॥ ३८० ॥ आत्मामें यहां आत्म-धर्म । तथा देहमें देह-धर्म । जानते जो इसका मर्म । वे हैं दूसरे ही ॥ ८१ ॥ ज्ञानसे हैं जिसके नयन । देखते हैं आत्म भेदके तन । मेघ-भेदमैं सूर्य-कीरण । ग्रीष्ममें जैसे ॥ ८२ ॥ वैसे ही कर विवेक विस्तार । ज्ञानियोंकी बुद्धि होती है स्थिर । देखते आत्माको वैसे ही धीर । इस भांतिसे ॥ ८३ ॥ जैसे तारागणसे भरा गगन । जलमें पडा है दीखता अर्जुन । किंतु नहीं पडा टूटके गगन । यह जानते वैसे ॥ ८४ ॥ गगनके स्थानपे है गगन । यह केवळ है आभास जान । वैसे हैं आत्म-शरीर भिन्न । मानते हैं वे ॥ ८५ ॥ कलकल बहते पानीमें चंचल । दिखती है चांदनीकी जो हलचल । चांदनी होती चंद्रके साथ निश्चल । जानके देखते हैं ॥ ८६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०४

या डबरा ही भरता सूखता । सूर्य जैसेका वैसा है रहता । वैसे ही शरीर आता औ' जाता । देखते हैं ऐसे ॥ ८७ ॥ घट मठ बनाये । वैसे ही तोड़ दिये । आकाश रह गये । सदा अखंड ॥ ८८ ॥ वैसे अखंड आत्म-सत्ता । तन है जो आता जाता । अज्ञान-दृष्टिसे कल्पित । जानते हैं ज्ञानी ॥ ८९ ॥ चैतन्य न बढ़ता न घटता । वह कर्म न करता कराता । ऐसे आत्म-ज्ञानसे है जानता । शुद्ध-रूपसे ॥ ३९० ॥ तथा स्वाधीन होगा संपूर्ण ज्ञान । प्रज्ञा परमाणुका अंतदर्शन । सकल शास्त्रोंका रहस्य अर्जुन । किसी समय ॥ ९१ ॥ किंतु है ऐसी इसकी उत्पत्ति । मनमें न रही यदि विरक्ति । होती कभी सर्वात्मकी प्राप्ति । विद्वत्तासे ॥ ९२ ॥ मुखमें भरा है सदैव ज्ञान । अंतःकरणमें विषयोंका स्थान । इससे न होगी प्राप्ति अर्जुन । मेरी कभी ॥ ९३ ॥ करनेसे ग्रंथ पठन । टूटेगा भव-बंधन । करनेसे ग्रंथ स्पर्शन । होगा क्या पाठ ? ॥ ९४ ॥ आंखमें पट्टी बांधकर । नाकसे मोति सूंघकर । समझेगा क्या धनुर्धर । उसका मूल्य ॥ ९५ ॥ वैसे चित्तमें अहंताका स्थान । जिह्वा पर शास्त्र संपूर्ण । इससे नहीं होगा मेरा ज्ञान । करोड़ों जन्मोंमें ॥ ९६ ॥ मैं अकेला सबमें भरा हुवा हूं— एक हूं मैं सबमें व्याप्त । भूतमात्रमें हूं समस्त । कहता हूं मैं यही बात । स्पष्ट रूपसे ॥ ९७ ॥ ६०५ पुरुषोत्तमयोग

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥ वैसे सूर्य सह जो संपूर्ण । विश्वकी रचना है अर्जुन । प्रकाश वह मेरा ही जान । आद्यंत है जो ॥ ९८ ॥ जल सोखकर लेता सविता । जलांश जो बादमें है रहता । चंद्रमें रहती है जो पांडुसुता । जोस्ना वह मेरी ॥ ९९ ॥ तथा दहन पचन सिद्धि । करता रहता निरवधि । हुताग्नै वह तेजोवृद्धि । जान मेरी ही ॥ ४०० ॥ गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥ प्रवेश किया मैंने भूतलमें । तभी यह महासिंधु जलमें । नहीं पिघला है युग-युगमें । मृत्तिका पिंड ॥ १ ॥ तथा भूत ही स-चराचर । धरा है धरतीने अपार । पृथ्वी-तलमें प्रवेश कर । उसको धरा मैंने ॥ २ ॥ गगनमें मैं पांडुसुत । चंद्रके रूपसे अमृत । भरा हुवा मैं स्वचलित । बना सरोवर ॥ ३ ॥ वहांसे निकलते रश्मिकर । उनको धरकर मैं अपार । सभी वनस्पतियोंका आगर । भरता रहता मैं ॥ ४ ॥ इससे सस्यादिक सकल । करते धान्यादिका सुकाल । तथा अन्नादिसे प्रतिपाल । करता सबका ॥ ५ ॥ सकल जन जीवनका जीवन 'वैश्वानर' मैं हूं— ऐसे उत्पन्न किया हुवा अन्न । जिस भांति करके मैं दीपन । जिससे जीवका हो समाधान । करता हूं ऐसे ॥ ६ ॥ सूर्यमें जलता तेज विश्वको है प्रकाशता । चंद्रमें अग्निमें वैसे मेरा ही तेज जान तू ॥ १२ ॥ धृतिके बलसे भूत धरता मैं धरा बना । पोसता वनस्पतीको रससे भर सोम मैं ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०६

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार । जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥ धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन । पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥ शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध । किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥ ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन । औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥ कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा । विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥ संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? - किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन । तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥ अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे । किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥ यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय ! अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥ मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान । जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥ जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक । भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥ वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा । पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥ ५०७ पुरुषोत्तमयोग

या एक सूर्य जैसे अर्जुन । लोक चेष्टासे होकर भिन्न । उपयोग होता अनुदिन । देखता है तू ॥ १७ ॥ नाना बीज धर्मानुरूप । वृक्ष-रस बनता आप । वैसे बदलता स्वरूप । जीवमें मेरा ॥ १८ ॥ जैसे नीलमणिका हार । सर्पत्व लेता भयंकर । सुखद होता निरंतर । जब दूसरेको ॥ १९ ॥ अथवा जैसे स्वातीका उदक । सीपमें मोति औ, व्यालमें विष । वैसे सु ज्ञानियोंको मैं हूं सुख । दुख अज्ञानियोंको ॥ ४२० ॥ सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥ सबके हृदयमें जो आत्म-स्फुरण है वह मैं हूं— वैसे ही होती हृदय मध्यमें । अमुक हूं ऐसी उर्मी सभमें । वह स्फुरण जो दिन रातमें । होता मैं हूँ ॥ २१ ॥ किंतु संत संगमें होता । या योग-ज्ञानमें बैठता । गुरु-चरण उपासता । वैराग्यसे ॥ २२ ॥ ऐसे ही सत्कर्ममें नित । अज्ञान नष्ट होता पार्थ । उसका होता अहं स्थित । आत्म-रूपमें ॥ २३ ॥ वे अपने आपको देख । पाते मुझ आत्मामें सुख । मेरे बिन भिन्न न देख । कभी कहीं ॥ २४ ॥ सर्वान्तरोंमें करता निवास देता स्मृति ज्ञान विवेक मैं ही । मैं ही अकेला चिर वेद-वेद्य वेदज्ञ मैं वेद रहस्य कर्ता ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६०८

अजी ! होता है जब सूर्योदय । देखता जैसे सूर्यको ही सूर्य । वैसे मेरे ज्ञानका धनंजय । कारण मैं ही ॥ २५ ॥ सबके अज्ञानका कारण भी मैं— या शरीर सेवामें हो तत्पर । संसार गौरवको सुनकर । अहंकार देहमें डूबकर । रहा है जिनका ॥ २६ ॥ वे हैं स्वर्ग संसारार्थ । दौड़ते कर्ममें पार्थ । तथा होते हैं दुःखार्थ । मेरे ही कारण ॥ २७ ॥ यह होता भी है अर्जुन । मेरे कारण है अज्ञान । जागृत ही देखता स्वप्न । या निद्रा लेता ॥ २८ ॥ जिन बादलोंने सूर्यको छिपाया । उसी सूर्यसे बादल देखा गया । मेरे अज्ञानसे वैसे देख लिया । विषय जीवोंने ॥ २९ ॥ जैसे निद्रा या जागृतिका । प्रबोध कारण मूलका । वैसे ज्ञानाज्ञान जीवोंका । कारण मैं हूं ॥ ४३० ॥ जैसे सर्पत्वका कारण डोर । वह डोर ही मूल धनुर्धर । वैसे ज्ञानाज्ञानका व्यवहार । मुझसे होता ॥ ३१ ॥ तभी मैं. जैसे हूं वैसे । मुझको न जाननेसे । वेदके न जाननेसे । उसकी हुई शाखाएं ॥ ३२ ॥ तो भी वेदोंके शाखा-भेदसे । मैं ही एक जाना जाता वैसे । सभी ओरकी नदियां जैसे । मिलती सिंधुमें ॥ ३३ ॥ वैसे महा-सिद्धांतके पास पार्थ । श्रुतियां खो जाती हैं शब्द सहित । अथवा आकाशमें गंध सहित । वायु-लहरियां ॥ ३४ ॥ वैसे हैं समस्त श्रुतिजात । होते लजाकर जैसे शांत । उसका मैं करता यथार्थ । अर्थ प्रकट ॥ ३५ ॥ फिर श्रुति सह जो अशेष । विश्व खो जाता यहां निःशेष । वह निज ज्ञान भी विशेष । जानता मैं ही ॥ ३६ ॥ ६०९ पुरुषोत्तमयोग (77)

जैसे निद्रितको कर जागृत । तब न जानता स्वप्नका द्वैत । किंतु करना एकत्व प्रतीत । अपना ही जो ॥ ३७ ॥ वैसे अपना अद्वयपन । जानता हूं मैं द्वैतके बिन । उसका भी हूं बोध कारण । जाननेका मैं ही ॥ ३८ ॥ आगसे मिला कपूर । न राख न वैश्वानर । न रखता धनुर्धर । उसी भांति ॥ ३९ ॥ वैसे समूल अविद्या खाता । वह ज्ञान भी जो डूब जाता । जब नहीं ऐसा न रहता । तब है भी कैसे ॥ ४४०॥ मार्ग सह विश्व ले गया जो अर्जुन । उस चोरको पकड़ेगा कैसे कौन । ऐसी व्यवस्था है जो विशुद्ध तू जान । वह मैं हूँ ॥ ४१ ॥ ऐसी जो जड़ाजड़ व्याप्ति । कहता है कैवल्यपति । अपने रूपकी पूर्ति । निरुपाधिक मैं ॥ ४२ ॥ वह बोध है ऐसा संपूर्ण । बिंबित हुवा पार्थमें जान । नभके पूर्ण-चंद्रसमान । क्षीरार्णवमें ॥ ४३ ॥ या जैसे दर्पणमें बिंबत होता । उसके सम्मुख जो चित्र रहता । वैसे कृष्ण औ' पार्थ अनुभावता । एक ही बोध ॥ ४४ ॥ फिर भी है वह वस्तु-स्वभाव । बढ़ता जाता प्रिय अनुभव । तभी वह अनुभवका राव । कहता अर्जुन ॥ ४५ ॥ कहनेमें अब व्यापकत्व । कहगया निरुपाधिकत्व । प्रसंगवश स्वस्वरूपत्व । कहनेमें देव ॥ ४६ ॥ कहना वह एक बार । पूर्णरूपसे कृपाकर । श्रीकृष्ण यह सुनकर । कहता भला ॥ ४७ ॥ हमको भी पांडुसुता । इसको कहना भाता । किंतु ऐसा प्रश्न कर्ता । मिलता नहीं ॥ ४८ ॥ आज मनोरथका फल । मिला है तू यहां केवल । खुलकर यह सकल । पूछनेको ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१०

द्वैत-गुरु-शिष्यसंवाद-से अद्वैतके पारका अनुभव— अद्वैतके पारका जो भोगना । वह भोग-सुख अनुभवना । पूछ कर देता है तू अर्जुन । मुझको मेरा ॥ ४५० ॥ सम्मुख होता है जब दर्पण । आप करता अपना दर्शन । वैसे शुद्ध संवादमें अर्जुन । शिरोमणि है तू ॥ ५१ ॥ तेरा अजानसे पूछना । हमको कहते बैठना । ऐसा नहीं इसे जानना । सखा मेरे ॥ ५२ ॥ ऐसा कह दिया आलिंगन । कृपा-दृष्टिसे अवलोकन । फिर किया हरिने कथन । अर्जुनसे क्या ॥ ५३ ॥ जैसे दो होंठोंसे एक बोलना । दो ही चरणसे एक चलना । वैसे दोनोंका पूछना कहना । तेरा मेरा ॥ ५४ ॥ ऐसे हम तुम यहां । देखना एक ही जहां । पूछना कहना यहां । दोनों एक ॥ ५५ ॥ लुब्ध हुये देव मोहसे । अर्जुनके आलिंगनसे । फिर कहते संकोचसे । यह नहीं उचित ॥ ५६ ॥ इक्षुदंड रसकी भेली । नासती लवणसे भली । संवाद-सुख क्रीडा भली । नासेगी जैसे ॥ ५७ ॥ अजी पहलेसे हममें नहीं । नर-नारायणमें द्वैत कहीं । लीन हो अब मेरा मुझमें ही । यह आयेगा ॥ ५८ ॥ इस सोचसे अकस्मात । श्रीकृष्ण कहता है पार्थ । तूने प्रश्न किया उचित । वह कैसा ॥ ५९ ॥ अर्जुन या कृष्णमें लीन । लौट कर आया वह सुन । अपना ही किया हुवा प्रश्न । अब सम्मुख ॥ ४६० ॥ यहां गद्गद हो बोलता । अर्जुन जी ! जी ! कहता । निरुपाधिक जो होता । अपना कह ॥ ६१ ॥ ६११ पुरुषोत्तमयोग

शार्गधर सुन बोला तब । वही कहने लिये अब । कहने लगा जो दोनों भाग । अपनी उपाधिके ॥ ६२ ॥ भगवानकी उपाधिकता— पूछा था निरुपाधिक । कहता है उपाधिक । ऐसा प्रश्न स्वाभाविक । उठेगा यहां ॥ ६३ ॥ अजी ! छासको अलग करना । कहा जाता मक्खन निकालना । हीन कस धातु सब जलना । स्वर्ण-शुद्धि ॥ ६४ ॥ या काईको दूर करना । विशुध्द जलको पा लेना । तथा बादलोंका हटना । आकाश शुध्द ॥ ६५ ॥ ऊपरसे ढका चोकर । फटकके किया तो दूर । शुध्द अनाजका स्वीकार । होता आप ॥ ६६ ॥ वैसे उपाधि उपाहित । विचारनेसे व्यवस्थित । किसीसे न पूछते ज्ञात । होता निरुपाधिक ॥ ६७ ॥ जिस भांति मौन रहकर । बाला प्यारसे सकुचाकर । पति नाम शब्द मारकर । कहती वैसे ॥ ६८ ॥ जो है न कहने जैसा । कहना पडा है ऐसा । तभी उपाधिसे वैसा । कहता श्रीहरी ॥ ६९ ॥ प्रतिपदाकी चंद्ररेखा । दिखाना हो तो वृक्ष-शाखा । दिखाते वैसे उपाधिका । करते वर्णन ॥ ४७० ॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥ पुरुष लोकमें है दो क्षर तथैव अक्षर । क्षर हैं सब ये भूत अक्षर स्थिर है वह ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१२

क्षराक्षर पुरुष विचार— श्री कृष्णने फिर बात की । इस संसार नगरकी । बसति है दो पुरुषोंकी । केवल मात्र ॥ ७१ ॥ गगनमें जैसे संपूर्ण । बसते हैं रात औ, दिन । संसार नगरमें मान । वैसे ये दो हैं ॥ ७२ ॥ तीसरा भी एक पुरुष रहता । वह इनका नाम नहीं सहता गांव सह वह इन्हे निगलता । होता जब प्रकट ॥ ७३ ॥ रहने दो तीसरेकी वार्ता । सुनो अब इन दोकी कथा । इस संसार ग्राममें पार्था । बसने आये जो ॥ ७४ ॥ एक है अंधा पगला लूला । दूजा सर्वांग पूर्ण है भला । ग्राम-गुणोंसे संग केवल । हुवा उनका ॥ ७५ ॥ उनमें है एक क्षर । दूसरा जो है अक्षर । दोनोंसे यह संसार । भरा है ठसाठस ॥ ७६ ॥ सुन अब क्षर है कौन । अक्षरका क्या लक्षण । अभिप्राय यह संपूर्ण । कहूंगा तुझको ॥ ७७ ॥ जहां है महदकार । वहांसे हे धनुर्धर । यहां है जो तृणांकुर । वहां तक ॥ ७८ ॥ जो है बड़ा या थोर । चलता या है स्थिर । या जो होता गोचर । मन-बुद्धिसे ॥ ७९ ॥ जो कुछ पंच-भूतसे बनता । नाम-रूपमें आकर फंसता । तथा टकसालसे निकलता । गुणत्रयोंकी ॥ ४८० ॥ शिक्का जो है भूताकृतिका । बनाया जाता जो स्वर्णका । बनता है वह कालका । द्यूत-बीज ॥ ८१ ॥ जानना ही जो विपरीत । तथा जो कुछ होता ज्ञान । वह प्रति-क्षण समाप्त । होता बनके ॥ ८२ ॥ ६१३ पुरुषोत्तमयोग

निकाल कर भ्रांतिका नग । खड़ा किया है सृष्टिका अंग । पहचाना जाता है जो जग । इस नामसे ॥ ८३ ॥ जो अष्टधा भिन्न ऐसे । दिखाया सातमें जैसे । क्षेत्र-द्वारा छत्तीससे । दिखाया है जो ॥ ८४ ॥ पिछला कहना कितना । इसीमें कहा है अर्जुन । वृक्षाकार रूप कारण । प्रस्तुत यहां ॥ ८५ ॥ यह सब है जो साकार । देह-कल्पनासे नगर । बन गया तदनुसार । चैतन्य आप ॥ ८६ ॥ जैसे कूपमें बन आप ही बिंब । सिंह करता प्रतिबिंबसे क्षोभ । फिर उसी क्षेत्रसे है समारंभ । करता कूदनेका ॥ ८७ ॥ या सलिलमें पूर्वका जो होता । व्योम पर व्योम प्रतिबिंबित । वैसे अद्वैत होकर भोगता । द्वैत आप ॥ ८८ ॥ अर्जुन ! जो इस प्रकार । पुर कल्पनासे साकार । करता आत्मा निद्रा घोर । विस्मृतिकी वहां ॥ ८९ ॥ स्वप्नमें शय्या देख जैसे । स्वप्नमें सो जाते हैं वैसे । नगरमें शयन ऐसे । होता आत्माका ॥ ४९० ॥ फिर वह निद्रा मदमें । सुखी या दुखी माननेमें । अहंकारकी समाधिमें । बकता जाता ॥ ९१ ॥ यह जनक या यह माता । यह पुत्र वित्त तथा कांता । मैं काला गोरा हीन या शास्ता । मेरा है यह सब ॥ ९२ ॥ ऐसे स्वप्नाश्व पर हो सवार । दौड़ता जो स्वर्ग और संसार । उस जीवका नाम धनुर्धर । है क्षर पुरुष ॥ ९३ ॥ अब तू सुन यह पार्थ । क्षेत्रज्ञ है जो कहलाता । या जिसको जीव कहता । सारा विश्व ॥ ९४ ॥ अपना रूप जो भूल जाता । सर्व-भूतत्व अनुसरता । वह चैतन्य है कहलाता । क्षर पुरुष ॥ ९५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१४

वहां है आत्म-रूपसे पूर्णता । इसीलिये है पुरुषता । फिर वह देह-पुरमें सोता । पुरुष-नाम ॥ ९६ ॥ तथा क्षरत्वका जो व्यर्थ । उसपे आक्षेप है पार्थ । यह है उपाधि-ग्रथित । इसीलिये ॥ ९७ ॥ बहते पानीके साथ जैसे । चंद्रबिंब उछळता वैसे । उपाधिके विकारमें ऐसे । दीखता वह ॥ ९८ ॥ या बहता पानी जब सूखता । बिंबित चंद्रमा भी है लोपता । वैसे उपाधि-नाशमें लोपता । उपाधि-धारी ॥ ९९ ॥ ऐसे उपाधिके ही कारण । क्षणिकत्व जुडता है जान । उपाधि नाशके ही कारण । क्षर यह नाम ॥ ५०० ॥ ऐसे जीव चैतन्य संपूर्ण । है यह क्षर-पुरुष जान । अब मैं अक्षरका वर्णन । करूंगा स्पष्ट ॥ १ ॥ अक्षर पुरुषका वर्णन— अक्षर यह दूसरा । पुरुष है धनुर्धर । मध्यस्थ है गिरिवर । मेरु सामान ॥ २ ॥ यह पृथ्वी पाताळ स्वर्गमें । न होता विभाजित तीनोमें । वैसे यह ज्ञान अज्ञानमें । पड़ता नहीं ॥ ३ ॥ यहां न यथार्थ ज्ञानमें एकत्व । या विपरीत ज्ञानमें अनेकत्व । ऐसे केवळ अज्ञान ही जो तत्व । वही यह रूप ॥ ४ ॥ धूलत्व संपूर्ण मिटता । किंतु घटादि नहीं होता । जैसा मृत्तिका पिंड होता । ऐसा मध्यस्थ जो ॥ ५ ॥ सूख जानेपे सागर । नहीं तरंग नहीं नीर । ऐसी यह अनाकार - । दशा जान ॥ ६ ॥ जागृति नहीं जहां अर्जुन । तथा प्रारंभ न होता स्वप्न । इस भांति तम-घन जान । इसका रूप ॥ ७ ॥ ६१५ पुरुषोत्तमयोग

विश्वंका होता है संपूर्ण अस्त । न होता आत्म-बोध प्रकाशित । ऐसी अज्ञान दशा मात्र पार्थ । अक्षर नामकी ॥ ८ ॥

  • “अजा” कहनेसे जन्म नहीं । अजन्माको मृत्यु कैसी कहीं । इसीलिये अक्षर सही । अज्ञान घन ॥ ९ ॥ जैसे सर्व कला रहित । चन्द्रमा जो मूल रूपित । दीखे अमावासके रात । वैसे ही यह ॥ ५१० ॥ होते ही सर्वोपाधि विनाश । लीन होती जहां जीव-दशा । फल पाकरके वृक्ष-दशा । बीजमें जैसे ॥ ११ ॥ वैसे उपाधि उपाहित । ये दोनों होते हैं विलुप्त । उसको कहते अव्यक्त । पांडुकुमार ॥ १२ ॥ जिसको है बीज भाव । वेदांतमें दिया नांव । उस पुरुषका ठाव । अक्षरका ॥ १३ ॥ जहांसे है अन्यथा ज्ञान । फैलकर जागृति स्वप्न । नानात्व-बुद्धिमें अर्जुन । घुसे हैं सब ॥ १४ ॥ जहांसे उठता जीवत्व । तथा उठाकर जो शिवत्व । इन दोनोंका जहां लयत्व । वह अक्षर पुरुष ॥ १५ ॥ तथा अक्षर पुरुष जनमें । खेलता है जागृति-स्वप्नमें । या दोनो अवस्थायें उनमें- । से प्रसवती हैं ॥ १६ ॥ जो है आज्ञानघन सुषुप्ति । ऐसी है उसकी प्रख्याति । इसे कहते ब्रह्म-प्राप्ति । यदि न्यून न होता ॥ १७ ॥ वास्तवमें यदि यह पार्था । स्वप्न-जागृतिमें नहीं आता । ब्रह्म-भाव ही कहा जाता । इसको ही ॥ १८ ॥ किंतु प्रकृति पुरुष ये दोनों । मेघ बन आये नभमें मानो । क्षेत्र-क्षत्रज्ञ ये स्वप्नमें दोनों। दीखते निद्रामें ॥ १९ ॥
  • अजामेकम् श्रुतिवचन— ज्ञानेश्वरी ६१६

रहने दो यह अधो शाख । संसार रूप जो यह रूख । उसका यह मूल-पुरुष । जो है अक्षर ॥ ५२० ॥ यह पुरुष क्यों कहलाता । अपने पूर्णत्वमें होता । तथा मायापुरीमें है सोता । इससे ही ॥ २१ ॥ और है विश्वका आना जाना । विपरीत ज्ञानका रूप माना । इसने है जिसको नहीं जाना । यह है सुषुप्ति ॥ २२ ॥ तभी यह स्वभावता । क्षरना नहीं जानता । तथा नाश नहीं होता । ज्ञानके बिन ॥ २३ ॥ इसीलिये यह अक्षर । वेदोंमें पांडुकुमार । वेदांत प्रसिद्ध डोंगर । हुवा सिद्धांत ॥ २४ ॥ ऐसे जीव कार्य कारण । जिसे माया संग लक्षण । अक्षर पुरुष है जान । चैतन्य जो ॥ २५ ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥ तीसरे पुरुषोत्तमका विवेचन— अब जो अन्यथा ज्ञानकी । अवस्थायें हैं दो-जनकी । खो जाती है वह निद्राकी । अज्ञान-स्थितिमें ॥ २६ ॥ वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान भी कीर्तिमुख होता । जैसे काष्ठ जलाकर स्वयं जलता । वह्नी आप ॥ २७ ॥ ऐसे वह अज्ञान ले गया ज्ञान । पर-तत्व दे गया आप अर्जुन । जाननेके बिना रहा ऐसे ज्ञान । केवल मात्र ॥ २८ ॥ कहाता परमात्मा जो तीजा पुरुष उत्तम । विश्व-पोषक विश्वात्मा है विश्वेश्वरं अव्यय ॥ १७ ॥ (78) ६१७ पुरुषोत्तमयोग