ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 687, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंवहां है आत्म-रूपसे पूर्णता । इसीलिये है पुरुषता । फिर वह देह-पुरमें सोता । पुरुष-नाम ॥ ९६ ॥ तथा क्षरत्वका जो व्यर्थ । उसपे आक्षेप है पार्थ । यह है उपाधि-ग्रथित । इसीलिये ॥ ९७ ॥ बहते पानीके साथ जैसे । चंद्रबिंब उछळता वैसे । उपाधिके विकारमें ऐसे । दीखता वह ॥ ९८ ॥ या बहता पानी जब सूखता । बिंबित चंद्रमा भी है लोपता । वैसे उपाधि-नाशमें लोपता । उपाधि-धारी ॥ ९९ ॥ ऐसे उपाधिके ही कारण । क्षणिकत्व जुडता है जान । उपाधि नाशके ही कारण । क्षर यह नाम ॥ ५०० ॥ ऐसे जीव चैतन्य संपूर्ण । है यह क्षर-पुरुष जान । अब मैं अक्षरका वर्णन । करूंगा स्पष्ट ॥ १ ॥ अक्षर पुरुषका वर्णन— अक्षर यह दूसरा । पुरुष है धनुर्धर । मध्यस्थ है गिरिवर । मेरु सामान ॥ २ ॥ यह पृथ्वी पाताळ स्वर्गमें । न होता विभाजित तीनोमें । वैसे यह ज्ञान अज्ञानमें । पड़ता नहीं ॥ ३ ॥ यहां न यथार्थ ज्ञानमें एकत्व । या विपरीत ज्ञानमें अनेकत्व । ऐसे केवळ अज्ञान ही जो तत्व । वही यह रूप ॥ ४ ॥ धूलत्व संपूर्ण मिटता । किंतु घटादि नहीं होता । जैसा मृत्तिका पिंड होता । ऐसा मध्यस्थ जो ॥ ५ ॥ सूख जानेपे सागर । नहीं तरंग नहीं नीर । ऐसी यह अनाकार - । दशा जान ॥ ६ ॥ जागृति नहीं जहां अर्जुन । तथा प्रारंभ न होता स्वप्न । इस भांति तम-घन जान । इसका रूप ॥ ७ ॥ ६१५ पुरुषोत्तमयोग