भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 688, कुल 1172 में से

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विश्वंका होता है संपूर्ण अस्त । न होता आत्म-बोध प्रकाशित । ऐसी अज्ञान दशा मात्र पार्थ । अक्षर नामकी ॥ ८ ॥

  • “अजा” कहनेसे जन्म नहीं । अजन्माको मृत्यु कैसी कहीं । इसीलिये अक्षर सही । अज्ञान घन ॥ ९ ॥ जैसे सर्व कला रहित । चन्द्रमा जो मूल रूपित । दीखे अमावासके रात । वैसे ही यह ॥ ५१० ॥ होते ही सर्वोपाधि विनाश । लीन होती जहां जीव-दशा । फल पाकरके वृक्ष-दशा । बीजमें जैसे ॥ ११ ॥ वैसे उपाधि उपाहित । ये दोनों होते हैं विलुप्त । उसको कहते अव्यक्त । पांडुकुमार ॥ १२ ॥ जिसको है बीज भाव । वेदांतमें दिया नांव । उस पुरुषका ठाव । अक्षरका ॥ १३ ॥ जहांसे है अन्यथा ज्ञान । फैलकर जागृति स्वप्न । नानात्व-बुद्धिमें अर्जुन । घुसे हैं सब ॥ १४ ॥ जहांसे उठता जीवत्व । तथा उठाकर जो शिवत्व । इन दोनोंका जहां लयत्व । वह अक्षर पुरुष ॥ १५ ॥ तथा अक्षर पुरुष जनमें । खेलता है जागृति-स्वप्नमें । या दोनो अवस्थायें उनमें- । से प्रसवती हैं ॥ १६ ॥ जो है आज्ञानघन सुषुप्ति । ऐसी है उसकी प्रख्याति । इसे कहते ब्रह्म-प्राप्ति । यदि न्यून न होता ॥ १७ ॥ वास्तवमें यदि यह पार्था । स्वप्न-जागृतिमें नहीं आता । ब्रह्म-भाव ही कहा जाता । इसको ही ॥ १८ ॥ किंतु प्रकृति पुरुष ये दोनों । मेघ बन आये नभमें मानो । क्षेत्र-क्षत्रज्ञ ये स्वप्नमें दोनों। दीखते निद्रामें ॥ १९ ॥
  • अजामेकम् श्रुतिवचन— ज्ञानेश्वरी ६१६
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