ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 689, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहने दो यह अधो शाख । संसार रूप जो यह रूख । उसका यह मूल-पुरुष । जो है अक्षर ॥ ५२० ॥ यह पुरुष क्यों कहलाता । अपने पूर्णत्वमें होता । तथा मायापुरीमें है सोता । इससे ही ॥ २१ ॥ और है विश्वका आना जाना । विपरीत ज्ञानका रूप माना । इसने है जिसको नहीं जाना । यह है सुषुप्ति ॥ २२ ॥ तभी यह स्वभावता । क्षरना नहीं जानता । तथा नाश नहीं होता । ज्ञानके बिन ॥ २३ ॥ इसीलिये यह अक्षर । वेदोंमें पांडुकुमार । वेदांत प्रसिद्ध डोंगर । हुवा सिद्धांत ॥ २४ ॥ ऐसे जीव कार्य कारण । जिसे माया संग लक्षण । अक्षर पुरुष है जान । चैतन्य जो ॥ २५ ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥ तीसरे पुरुषोत्तमका विवेचन— अब जो अन्यथा ज्ञानकी । अवस्थायें हैं दो-जनकी । खो जाती है वह निद्राकी । अज्ञान-स्थितिमें ॥ २६ ॥ वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान भी कीर्तिमुख होता । जैसे काष्ठ जलाकर स्वयं जलता । वह्नी आप ॥ २७ ॥ ऐसे वह अज्ञान ले गया ज्ञान । पर-तत्व दे गया आप अर्जुन । जाननेके बिना रहा ऐसे ज्ञान । केवल मात्र ॥ २८ ॥ कहाता परमात्मा जो तीजा पुरुष उत्तम । विश्व-पोषक विश्वात्मा है विश्वेश्वरं अव्यय ॥ १७ ॥ (78) ६१७ पुरुषोत्तमयोग