ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 690, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंवही है जो उत्तम पुरुष । तीसरा क्यों इसका निष्कर्ष । उन दोनोंसे भिन्न है देख । यह अंतिम ॥ २९ ॥ सुषुप्ति और स्वप्न । उससे भिन्न अर्जुन । जागृति जैसे जान । बोधकी जो ॥ ५३० ॥ किरण अथवा होता मृगजळ । उससे भिन्न जैसे सूर्य-मंडल । वैसे ही भिन्न यह अति बहुल । उत्तम पुरुष ॥ ३१ ॥ जैसे काष्ठमें काष्ठसे भिन्न । भरा रहता अग्नि अर्जुन । वैसे क्षर-अक्षरसे भिन्न । रहता है यह ॥ ३२ ॥ अपनी सीमाओंको निगलकर । नदी नदोंको एक करता नीर । पूर्णत्वमें उठता एक होकर । कल्पांतका उदधि ॥ ३३ ॥ वैसे स्वप्न या नहीं सुषुप्ति । नहीं रहती वहां जागृति । जैसे निगलता दिन-राति । कल्पांतका तेज ॥ ३४ ॥ फिर नहीं एकत्व या द्वैत । है या नहीं जानता है पार्थ । प्रतीति लोप हुई हो दीप्त । रहा नहीं कुछ ॥ ३५ ॥ इस प्रकार जो कुछ है । वही उत्तम-पुरुष है । इसीको सब कहते हैं । परमात्मा ॥ ३६ ॥ वह भी यहां लय नहीं होके । बोलना जीवत्वमें ही रहके । बोलना किनारेमें ही बैठके । डूबे हुएकी बातें ॥ ३७ ॥ वैसे विवेक तट पर । कहते खडा रहकर । पैल तीरकी धनुर्धर । बातें वेद ॥ ३८ ॥ तभी पुरुष क्षराक्षर । दोनों देखके इस और । इसके कहते हैं पर- । आत्म-रूप ॥ ३९ ॥ यहां है इस प्रकार । परमात्म शब्द पर । सुनाते हैं धनुर्धर । पुरुषोत्तम ॥ ५४० ॥ वैसे हे मौनसे ही बोलना । न जाननेसे वहां जानना । तथा न होनेसे ही है होना । वह तत्व ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६१८