भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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सोऽहम् भाव है अस्त होता । कहनेवाला कोई न होता । दृष्टत्व सह जाना है पार्थ । जाना दृश्य भी ॥ ४२ ॥ बिंब तथा है प्रतिबिंबकी । न ले सकते प्रभा बीचकी । कहना नहीं प्रभा कहांकी । ऐसे कभी ॥ ४३ ॥ घ्राण तथा पुष्पके मध्य । सुवास रहता है हृद्य । आंखोंसे दीखना असाध्य । उसे ना कहना ॥ ४४ ॥ वैसे दृश्यादृश्य दोनों मिटता । फिर क्या है यह कौन कहता । इसी अनुभवसे है देखता । वह जो रूप ॥ ४५ ॥ वह है प्रकाश बिन प्रकाश । ईशितव्यके बिना है जो ईश । अपनेसे भरता अवकाश । आप ही सारा ॥ ४६ ॥ नादसे जो सुनना नाद । स्वादसे है चखना स्वाद । अनुभवना जो आनंद । आनंदसे ही ॥ ४७ ॥ सुख ही जहां सुख पाता । तेजसे है तेज मिलता । शून्य भी जहां डूब जाता । महाशून्यमें ॥ ४८ ॥ पूर्णताका जो परिणाम । पुरुष वह सर्वोत्तम । विश्रांतिका भी है विश्राम । जहां लेता विश्रांति ॥ ४९ ॥ विकार पर भी जो रहता । ग्रासको ग्रासकर पूर्णता । बहुतसे जो बहुत होता । बहुत गुना ॥ ५५० ॥ चैतन्य विश्वाकार कैसे दीखता है ?— जो अज्ञानीके प्रति । रजतकी प्रतीति । चांदी न होके शुक्ति । करती जैसे ॥ ५१ ॥ अथवा जो अलंकार रूपमें । न छिपके सोना छिपता उसमें । विश्व न होकर भी वैसे विश्वमें । वह है विश्वाधार ॥ ५२ ॥ अथवा जैसे जल तरंग । पानीसे रहता है अभंग । वैसे प्रतीत करता जग । वह है प्रकाश ॥ ५३ ॥ ६१९ पुरुषोत्तमयोग