भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अपने संकोच विकास । आप ही कारण वीरेश । जलमें चन्द्र होता जैसा । स्वयं आप ॥ ५४ ॥ वैसे विश्वात्ममें जो कुछ होता । विश्व-लोपसे कहीं नहीं जाता । जैसे रात दिनमें नहीं होता । दो प्रकारका सूर्य ॥ ५५ ॥ वैसे कहीं किसी ओरसे । कम नहीं होता किसीसे । सदैव रहता है वैसे । अपना-सा वह ॥ ५६ ॥ यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥ पुरुषोत्तमका विवेचन— अपनेसे ही जो अर्जुन । प्रकाशता आप है जान । क्या कहूँ उसके समान । नहीं अन्य ॥ ५७ ॥ वह हूँ मैं निरुपाधिक । क्षराक्षरोत्तम हूँ एक । इसीलिये वेद और लोक । कहते पुरुषोत्तम ॥ ५८ ॥ यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥ ऐसा जो मैं पुरुषोत्तम । जानना मुझे प्रियोत्तम । उदय होते ही उत्तम । ज्ञान सूर्य ॥ ५९ ॥ होते ही जागृतिका ज्ञान । मिट जाता है जैसे स्वप्न । स्फुरता उसे त्रिभुवन । सारा व्यर्थ ॥ ५६० ॥ मैं क्षराक्षरसे भी जो भिन्न हूं और उत्तम । इससे वेद लोगोंने कहा है पुरुषोत्तम ॥ १८ ॥ हटाके मोहको दूर जाने मैं पुरुषोत्तम । मुझको भजते हैं वे सर्वज्ञ सर्व-भावसे ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६२०