भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अथवा माला हाथमें लेनेसे । सर्पाभास भय मिटता जैसे । मेरे पुरुषोत्तमत्व-बोधसे । जगाभाससे छूटता ॥ ६१ ॥ अलंकार सोनेका है जो जानता । अलंकारके मोहमें नहीं आता । उसी भांति मुझको जो है जानता । छूटता भिन्नत्व ॥ ६२ ॥ फिर सर्वत्र सच्चिदानंद । कहता मैं एक स्वयं सिध्द । अपनेमें अन्य कोई भेद । नहीं जानता ॥ ६३ ॥ उसीसे है सब जाना । अल्प है यह कहना । उसके लिये तू जान । नहीं रहा द्वैत ॥ ६४ ॥ इसलिये मेरा भजन । वही एक योग्य है जान । गगन जैसा अलिंगन । करता गगनका ॥ ६५ ॥ जैसे क्षीर-सागरको भोजन । दे सकता क्षीर-सागर बन । या अमृत होकर ही मिलन । अमृतसे जैसे ॥ ६६ ॥ मिलानेसे सुवर्ण शुध्द । मिलता है सुवर्ण शुध्द । वैसे मैं बनकर सिध्द । मेरी भक्ति ॥ ६७ ॥ अजी ! सिंधु रूप यह नहीं होती । गंगा सिंधुसे कहो कैसे मिलती । इसीलिये मैं न बनकर भक्ति- । में कैसा प्रवेश ॥ ६८ ॥ इसीलिये हे सभी प्रकार । कल्लोल अनन्य है सागर । ऐसे मुझसे हे धनुर्धर । भजता है जो ॥ ६९ ॥ जैसे सूर्य और प्रभा । एक रूप और लोभ । वैसे ही योग्यता लाभ । उस भजनका ॥ ६७० ॥ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुध्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥ ऐसा गूढ कहा शास्त्र निष्पाप तुझसे यह । इसको जानके धीर होते हैं कृत कृत्य ही ॥ २० ॥ ६२१ पुरुषोत्तमयोग

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